💥 सत्य। (रेपब्लिशेड)

VIKRANT RAJLIWAL WRITING POETRY, SHAYRI, STORY, ARTICLES, BLOG’S AND WEBSITE’S

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JANUARY 14, 2020 #repost #share

💥 सत्य।

by Voice Of Vikrant Rajliwal ( My Writing, My Blogs & My Voice).In Anecdote, Article , लेख।, अध्यात्मितकता, दास्तान, विचार, शिक्षा, Blog, Education, Feelings, Information, Spirituality, Thought.Leave a Commenton 💥 सत्य।

आज की मेरी यह पोस्ट उन मासूम बच्चों एव नवयुवकों को समर्पित है; जो आज भी किसी ना किसी हानिकारक व्यसन की चपेट में फंस कर, अपने जीवन को बर्बाद किए जा रहे है या जो अब किसी हानिकारन व्यसन का सेवन तो नही कर रहे, परन्तु उन्हें अपने जीवन मे प्रगति करने के लिए कुछ दिशा निर्देश नही प्राप्त हो रहे है।

मैं विक्रांत राजलीवाल भी अपने बच्चपन में 14 से 16 वर्ष की आयु में अज्ञानवश कई हानिकारक व्यसन का सेवन कर लिया था। एवं 16 वर्ष की आयु में मैने अपने पिताजी से सहायता मांगी और उन्हें अपनी वास्तविक मनोस्थिति से अवगत करवाया; तदोपरांत कई वेद, हकीमों, तांत्रिकों और हस्पताल के इलाज से थक हार कर अंत मे मुझ को नारकोटिक्स एनॉनिमस के कार्यक्रम से जुड़ने का एक अवसर प्राप्त हुआ। परंतु इसे किस्मत की अनहोनी कहे यह भाग्य का लेखा कि मुझ को नारकोटिक्स एनॉनिमस का कार्यक्रम एक बंधक अवस्ता में प्राप्त हुआ एवं जहाँ आप के प्रत्येक मनोभवो को आपकी चाल या वहाँ से मुक्ति हेतु कोई घिनोनी सजिक के रूप में ही देखा जाता है। जो आपके सकरात्मक एहसास को इस प्रकार से कुचल देता है कि जैसे आपका स्वयं का कोई वजूद ही ना हु। और आपको ऐसा एहसास होता है मानो सरेराह आपके मासूम व्यक्त्विक का बलात्कार किया जा रहा हु और आपकी सहायता हेतु कोई भी ईमानदार व्यक्तित्व वहाँ उपस्थित ना हु। उस समय मेरे साथ वहाँ समाज के छठे हुए अपराधि जो अपने गुनाह की सजा जेल कारावास के रूप में कठोर दंड भुगत चुके थे। के मध्य प्राप्त हुआ। जिनमे से अधिकतर मेरी ही हम उम्र के 17 से 19 वर्ष के हु थे।

मैंने वहाँ डिस्चार्ज प्राप्त किया एवं 13 महीनों तक उनके साथ जुड़ा रहा। तदोपरांत मैंने सोचा कि अब पढ़ाई करनी चाहिए। जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने मुझ को घर जाने की इजाजत रद्द कर दी। उस स्थिति में भय के मारे मैं उनके ऑफिस से भागा, और तुरन्त पकड़ा भी गया। जिसके दंड स्वरूप मुझ को पुनः एक अंदर रस्सियो से बांध कर डाल दिया गया। और भी कई प्रकार की यातना झेलने के उपरांत। जिसमे सबसे घातक थी रस्सियों के मध्य बंधक अवस्था मे एक अन्य साइको पेशेंट के जरिए बिजली की तारो से करंट लगाने का एक घिनोना प्रयास को अंजाम देना। उस अवस्था में मेरी समीप के एक मित्र में उसको पकड़ कर मेरी जान बचाई। खैर ऐसे ही बहुत यातनाओं को फेस कर के मेरा पुनः डिस्चार्ज हुआ।

अब जिस स्थिति मैं था उस स्थिति में दो मार्ग मेरे समुख थे प्रथम क्रोध वश पुनः नशा करते हुए जीवन को बर्बाद कर दु या स्वयं को साक्षर कर के स्वयं के स्वप्न IAS की परीक्षा को उतरीं करने का एक कठोर एवं जटिल मार्ग पर चलने की हिम्मत दिखा सकु। जिससे मुझ में वह समर्थ आ सके कि मैं भविष्य में कई मासूम बच्चों एव नवयुवकों की सहायता प्रदान कर सकूँ। तो मैंने द्वितीय मार्ग को चुना एवं 10वी से ग्रेजुएशन तक साक्षर होने एवं ज्ञान अर्जित करने के लिए मेने प्रयास किया। इसी दौरान मेने एक वर्षीय कम्प्यूटर कार्यक्रम के साथ ताइपिंग भी सीखी। कोचिंग करि। एवं असिस्टेंट कमंडेड से लेखक IAS तक कि परीक्षा को फेस करा। अंततः सरस्वती माँ की कृपा हुई और वर्ष 2016 में सामाजिक एवं मानवता की भवनाओं से प्रेरित अपनी प्रथम काव्य एवं कविताओं की पुस्तक प्रकाशित हुई। और वर्ष 2017 में मैने अपना प्रथम ब्लॉग बनाया और अपने ब्लॉग के साथ सोशल मीडिया पर भी लिखता रहा हु। और अब सक्रिय हु।

अंत में मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि…

🕊️ ए मासूम परिंदों देखेगा यह सम्पूर्ण संसार तुम्हारी अनन्त उड़ान को। मसल कर रख दु हर विपरीत परिस्थितियों एव हालातो को; कि दिखा सकूँ जो अकेले ही चलते चले जाने की हिम्मत तो मान जो कारवाँ हमें ना मिल सका उसे तुम अवश्य पा जाओंगे, उसे तुम अवश्य पा जाओंगे हा उसे तुम अवश्य पा जाओंगे।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक सत्य।

दिल्ली विश्विद्यालय के फेकल्टी ऑफ लॉ में वर्ष 2018 के दौरान वार्षिक खेल महोत्सव में काव्य एवं नज़म का सुनाते हुए।
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मकर संक्रांति की आप सभी शुभचिंतकों एवं महानुभवों को आपके मित्र विक्रांत राजलीवाल की ओर से हार्दिक बधाइयां। Congratulations to all your well wishers and great people of Makar Sankranti on behalf of Vikrant Rajliwal.

💥 सत्य।

आज की मेरी यह पोस्ट उन मासूम बच्चों एव नवयुवकों को समर्पित है; जो आज भी किसी ना किसी हानिकारक व्यसन की चपेट में फंस कर, अपने जीवन को बर्बाद किए जा रहे है या जो अब किसी हानिकारन व्यसन का सेवन तो नही कर रहे, परन्तु उन्हें अपने जीवन मे प्रगति करने के लिए कुछ दिशा निर्देश नही प्राप्त हो रहे है।

मैं विक्रांत राजलीवाल भी अपने बच्चपन में 14 से 16 वर्ष की आयु में अज्ञानवश कई हानिकारक व्यसन का सेवन कर लिया था। एवं 16 वर्ष की आयु में मैने अपने पिताजी से सहायता मांगी और उन्हें अपनी वास्तविक मनोस्थिति से अवगत करवाया; तदोपरांत कई वेद, हकीमों, तांत्रिकों और हस्पताल के इलाज से थक हार कर अंत मे मुझ को नारकोटिक्स एनॉनिमस के कार्यक्रम से जुड़ने का एक अवसर प्राप्त हुआ। परंतु इसे किस्मत की अनहोनी कहे यह भाग्य का लेखा कि मुझ को नारकोटिक्स एनॉनिमस का कार्यक्रम एक बंधक अवस्ता में प्राप्त हुआ एवं जहाँ आप के प्रत्येक मनोभवो को आपकी चाल या वहाँ से मुक्ति हेतु कोई घिनोनी सजिक के रूप में ही देखा जाता है। जो आपके सकरात्मक एहसास को इस प्रकार से कुचल देता है कि जैसे आपका स्वयं का कोई वजूद ही ना हु। और आपको ऐसा एहसास होता है मानो सरेराह आपके मासूम व्यक्त्विक का बलात्कार किया जा रहा हु और आपकी सहायता हेतु कोई भी ईमानदार व्यक्तित्व वहाँ उपस्थित ना हु। उस समय मेरे साथ वहाँ समाज के छठे हुए अपराधि जो अपने गुनाह की सजा जेल कारावास के रूप में कठोर दंड भुगत चुके थे। के मध्य प्राप्त हुआ। जिनमे से अधिकतर मेरी ही हम उम्र के 17 से 19 वर्ष के हु थे।

मैंने वहाँ डिस्चार्ज प्राप्त किया एवं 13 महीनों तक उनके साथ जुड़ा रहा। तदोपरांत मैंने सोचा कि अब पढ़ाई करनी चाहिए। जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने मुझ को घर जाने की इजाजत रद्द कर दी। उस स्थिति में भय के मारे मैं उनके ऑफिस से भागा, और तुरन्त पकड़ा भी गया। जिसके दंड स्वरूप मुझ को पुनः एक अंदर रस्सियो से बांध कर डाल दिया गया। और भी कई प्रकार की यातना झेलने के उपरांत। जिसमे सबसे घातक थी रस्सियों के मध्य बंधक अवस्था मे एक अन्य साइको पेशेंट के जरिए बिजली की तारो से करंट लगाने का एक घिनोना प्रयास को अंजाम देना। उस अवस्था में मेरी समीप के एक मित्र में उसको पकड़ कर मेरी जान बचाई। खैर ऐसे ही बहुत यातनाओं को फेस कर के मेरा पुनः डिस्चार्ज हुआ।

अब जिस स्थिति मैं था उस स्थिति में दो मार्ग मेरे समुख थे प्रथम क्रोध वश पुनः नशा करते हुए जीवन को बर्बाद कर दु या स्वयं को साक्षर कर के स्वयं के स्वप्न IAS की परीक्षा को उतरीं करने का एक कठोर एवं जटिल मार्ग पर चलने की हिम्मत दिखा सकु। जिससे मुझ में वह समर्थ आ सके कि मैं भविष्य में कई मासूम बच्चों एव नवयुवकों की सहायता प्रदान कर सकूँ। तो मैंने द्वितीय मार्ग को चुना एवं 10वी से ग्रेजुएशन तक साक्षर होने एवं ज्ञान अर्जित करने के लिए मेने प्रयास किया। इसी दौरान मेने एक वर्षीय कम्प्यूटर कार्यक्रम के साथ ताइपिंग भी सीखी। कोचिंग करि। एवं असिस्टेंट कमंडेड से लेखक IAS तक कि परीक्षा को फेस करा। अंततः सरस्वती माँ की कृपा हुई और वर्ष 2016 में सामाजिक एवं मानवता की भवनाओं से प्रेरित अपनी प्रथम काव्य एवं कविताओं की पुस्तक प्रकाशित हुई। और वर्ष 2017 में मैने अपना प्रथम ब्लॉग बनाया और अपने ब्लॉग के साथ सोशल मीडिया पर भी लिखता रहा हु। और अब सक्रिय हु।

अंत में मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि…

🕊️ ए मासूम परिंदों देखेगा यह सम्पूर्ण संसार तुम्हारी अनन्त उड़ान को। मसल कर रख दु हर विपरीत परिस्थितियों एव हालातो को; कि दिखा सकूँ जो अकेले ही चलते चले जाने की हिम्मत तो मान जो कारवाँ हमें ना मिल सका उसे तुम अवश्य पा जाओंगे, उसे तुम अवश्य पा जाओंगे हा उसे तुम अवश्य पा जाओंगे।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक सत्य।

दिल्ली विश्विद्यालय के फेकल्टी ऑफ लॉ के वार्षिक खेल महोत्सव के दौरान काव्य पाठन करते हुए।

🌹 टूटा गुलाब, बिखुड़ी जो पंखुड़ियां; हर जख्म महोब्बत के नासूर हो गए।
याद में एक सितमगर कि ए दोस्त; हम जीते जी ही जो फ़ना हो गए।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

💗
हम तुम्हें ना पा सकें और तुम हर बार हमारे मासूम एहसासों का कत्ल करते गए।

नही एतबार अब हमें ख़ुद के एहसासों पर शायद, फक्त यकीं एहसासों पर तुमरे हम जो करते गए।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

मेरा एक Your qoute पर लिखा गया एक दर्द।

🙏 लोहड़ी के हर्षोल्लास के त्यौहार की आप अभी ह्र्दयज़ीज़ों को आपके अपने मित्र विक्रांत राजलीवाल की ओर से हार्दिक बधाइयां। 💖💖

🙏 Hearty congratulations to your hearty friend Vikrant Rajaliwal on the occasion of the festival of joy of Lohri. 💖💖

एक सूचना।

🌅 सुप्रभात मित्रों शीघ्र ही आपको मेरी ब्लॉग वेबसाइट पर प्रकाशित मेरी रचनाओँ एवं कहानी के संग्रह के साथ ही ; मेरी प्रथम विस्तृत कहानी पाठन हेतु उपलब्ध करवा दी जाएगी।

जिसके शीर्षक से आपको शीघ्र ही सूचित कर दिया जाएगा। कृपया अपना अनोमोल प्रेम स्वरुप आशीर्वाद प्रदान कीजिए।

कवि शायर एवं कहानीकार विक्रांत राजलीवाल।

👥 टूटता यकीं।

जब आपको बार बार खुद अपने आप को अपने रिश्तों का एहसास करवाना पड़े। कि वह मेरा मित्र है, वह मेरे पिता जी, वह मेरी माया जी, या अरे हा वह मेरी पत्नी और बच्चे ही है। तो समझ जाना वह ड़ोर जिसे यकीन कहते है रिश्तों पर, कहि खो सा गया है।

🕯️ टूट गई ड़ोर ए ज़िंदगानी, एहसास यह यू ही अचानक से तो नही।

खाई है हर बार शिखस्त खुद करके यकीन, एहसासों पर अपने जख्मी।।

ये हालात जो बर्बाद से मालूम होते है वो यू ही अचानक से तो नही।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

खामोश एहसास।

भूतकालीन जीवन के कर्मों पर लगा कलंक; अपने जिस्म में बहते हुए लहू के आखरी कतरो से भी जब मिटा ना सके। हर बढ़ते कदम से खुद को जब हम और भी तन्हा महसूस करते गए।। हर आँसू बेमाने और ये ज़िंदगी, ये साँसे, ये धड़कती हर धड़कने इल्जाम कोई बेहूदा सा सिद्ध होने लगे।

आज दिल और रात स्वयं को सुधार के मार्ग पर किसी प्रकार स्थिर रखते हुए। जिंदगी के प्रत्येक क्षण सत्य का सामना करते हुए। गैरो की क्या बात करू खुद अपनो से झूझते हुए। अनजान चेहरों के समक्ष, अंजान माहौल में अपने जीवन पर लगे कलंक को धोते हुए। जब हिम्मत टूट जाती है। जिन्दगी खुद जिन्दगी को ठोकर मारने पर विवश हो जाती है। तब भी स्वयं को किसी प्रकार से सम्भालते हुए।

ऐसे निर्मोही कठोर मार्ग पर सत्य को थामे हुए; साक्षरता को अपना एक मित्र, और अपनी रचनाओं को अपना जीवन मानते हुए। चले जा रहा हु; हर कदम से स्वयं के समीप और अपनो से दूर हुए जा रहा हु। आदत नही अपना दुख बयां करने की फिर भी हर इल्जाम को बेदर्द जिंदगी के ख़ामोशी से सहता जा रहा हु। हा मैं एक रचनाकार हु जो अपनी कलम से अपने जीवन के कलंक को मिटाने का एक असफल प्रत्यन करते हुए बस जीवन को जिए जा रहा हु; हा बस जिए जा रहा हु; हा बस जिए जा रहा हु।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

🌹 सुलगते एहसास।

ना जिन्हें दिन को है सकूँ साँसों में; ना रातों को है आराम।

हम है वो जो रहते है हर लम्हा लेकर धधकती धड़कनों में सुलगता एक अंगार।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

🕯️🏷️एहसास।/🕯️🏷️ My Feeling's.

आज किसी ने पूछा कि क्या आप शायरी के कार्यक्रम के लिए प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्पर्क के इच्छुक है तो हम आपकी भेंट करवा सकते है?

तो मैंने अत्यंत ही सरल शब्दों में उत्तर दिया कि जी शुक्रिया परन्तु साहित्य के मसले में मैं किसी किंग से कम स्वयं को नही समझता हूं। यस आई एम ए किंग ऑफ़ एक्सप्रेस मय ओं फीलिंग्स थ्रो मय पोएट्री 📝।

इससे अलग मैं चपड़ासी भी हु, क्लर्क भी हु, ग्रेजुएट हु, वन ईयर कम्प्यूटर कोर्स किया है। टाइपिंग जानता हूं। जीवन में कड़ा संघर्ष करने के उपरांत, 17 वर्ष की उम्र में पुनर्वास का कठोर दंड भुगतने के उपरांत, जीवन के प्रत्येक क्षण सत्य का सामना करते हुए। 10वी से दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक, कम्प्यूटर कोर्स, टाइपिंग सिख सका हु। हा मै एक मामूली आदमी के समान कार्य करता हु।

परन्तु यहाँ साहित्य का विषय आता है तो मै विकाऊ नही, आई एम ए किंग। मैं स्वयं के लिए लिखता हूं, गाता हु, रिकार्ड करता हु। अपनी सेल्फ पब्लिश्ड किताब प्रकाशित करवाता हु। क्यों? क्योंकि ई आम नॉट फ़ॉर सेल।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल।

Today someone asked if you are willing to contact prestigious institutions for the program of poetry, then we can meet you?

So I replied in very simple words, thank you, but in the matter of literature, I do not think of myself as less than a king. Yes I’m a King of Express May On Feelings Through My Poetry.

Apart from this, I am a peon, a clerk and a graduate, have done one year computer course. I know typing After struggling hard in life, at the age of 17, after facing the harsh punishment of rehabilitation, facing the truth every moment of life. I graduated from Delhi University from 10th, computer course, learned typing. Yes, I act like a modest man.

But here comes the subject of literature, so I am not sold, Yes, I MA King of my literature. I write for myself, sing, record. I get my self published book published. Why? Because I am not for sale.

Thank you.

Vikrant Rajliwal.