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भोंडा। (एक कहानी जो दिल को छु जाए) पुनः प्रकाशित with रिकॉर्डिड वीडियो।

भोंडा। (एक कहानी जो दिल को छू जाए) with Recorded video YouTube link! Mentioned in below

Posted byVoice Of Vikrant Rajliwal ( My Writing, My Blogs & My Voice)October 2, 2019Posted inAnecdote, Art of Drama, कहानियां, काव्य, किस्सा, दास्तान, नाटक, शिक्षा, Blog, Dastan, Education, Feelings, Gazal , ग़ज़ल, Nazam, Painful poetry, Poetry, Sad shayari, Song, StoryTags:कहानी, काव्य, किस्सा, दास्ताँ, नज़म, भोंडा।, राजलीवाल, विक्रांत, Bhonda, Dastan, Rajliwal, Story, VikrantEditभोंडा। (एक कहानी जो दिल को छू जाए)

नमस्कार प्रिय पाठकों, आज अपनी एक अत्यंत ही दिलचस्प और भावनात्मक प्रेम कहानी “भोंडा।” का आपकी अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रथम प्रकाशन करते हुए, मुझ को अत्यधिक हर्ष एवं रोमांच की अनुभूति प्राप्त हो रही है। भोंडा केवल एक कहानी ही भी है बल्कि यह स्वयं के भीतर एक ऐसे भावनात्मक एहसासों को, संजोए हुए है जिसको लिखते समय मैं स्वयं अत्यधिक भावुक हो गया था।

अब आपका अधिक समय ना लेते हुए मैं यानी कि आपका अपना मित्र इतना ही कहना चाहूंगा कि “भोंडा सिर्फ एक कहानी ही नही है अपितु यह एक ऐसे सत्य को दर्शाती है जिसे अक्सर बहुत से युवाओं ने अनादि काल से विभिन्न प्रकार से महसूस किया है और ना जाने कब तक वह भोंडा के ही भांति उन एहसासो को महसूस करते रहेंगे।”

आशा करता हु आपको मेरी यह कहानी बल्कि अब यह कहना अधिक उचित होगा कि आपको आपकी अपनी यह कहानी “भोंडा।” अवश्य पसन्द आएगी।

विक्रांत राजलीवाल।

(अब प्रस्तुत है “भोंडा।” का प्रथम प्रकाशन।)

भोंडा। (एक कहानी जो दिल को छू जाए)

यह किस्सा है बहुत ही ख़ास, नही है कोई वाक्या साधारण सा या आम। सदियों से भी पुराना एक किस्सा है ये महान। सुनाया था नानी ने मेरी, जो थी बचपन से ही मेरे जीवन की ज्योति एक जान। हर एक वाक्या दिलचस्प इस किस्से का आज भी है यू का त्युं मुझ को जो याद।

याद है कि…

यह किस्सा उस जमाने का है जब आज की दुनिया की तरह तड़क और भड़क नही हुआ करती थी। इसका मतलब यह नही की, उस जमाने में कोई तड़क और भड़क हुआ ही नही करती थी। मेरे कहना का तातपर्य यह है कि उस जमाने की तड़क और भड़क आज के जमाने से बेहद भिन्न प्रकार की हुआ करती थी। वह जमाना था साहब, जब दुनिया में राजा और महाराजाओ का, एक छत्र शाशन हुआ करता था। ऐसा ही एक तड़कता और भड़कता राज शाही राज्य था हैरान गंज। हैरान गंज राज्य अपने नाम के अनुरूप ही, अत्यधिक सुंदर प्राकृतिक दृश्यों से सुशोभित होकर, समस्त जग को हैरान किए हुए था। हैरान गंज राज्य का मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य देख कर, हर एक व्यक्ति की आँखे, आचार्य से चकाचोंध हुए बिना, नही रह पाती थी। ऐसा था वह राज्यों में राज्य, राज शाही हैरान गंज। बहुत ही शाही और भव्य था राज्य हैरान गंज। भव्य आलीशान भवन, साफ-सुधरी, चौड़ी-चौड़ी, सड़के, सुंदर बाग बग़ीचे एवं नगर के एक ओर से छल छल, कल कल करके बहती हुई हैरान गंज की मशहूर गुलाबी दरिया।

एक ओर राज शाही हैरान गंज भव्यता और ऐश्वर्य का एक जीता जागता प्रतीक था। तो वही दूसरी ओर नगर से कुछ दूरी पर, एक सुनसान से कोने पर, जहा हैरान गंज राज्य की सिमा समाप्त होती थी। एक सुनसान सी मलिन बस्ती भी सब को हैरान किए हुए थी। वैसे तो हैरान गंज की उस शाही भव्यता से, उस मलिन बस्ती का दूर दूर तक, कुछ भी सम्बन्ध नही था। फिर भी थी तो वह भी हैरान गंज राज्य का ही एक अटूट हिस्सा। यहाँ आप यह विचार कर रहे होंगे कि इस मलिन बस्ती में कौन रहता होगा? तो यहाँ मैं आपको बता दु की इस मलिन बस्ती में रहने वाले लोग भी कुछ आम नही थे क्यों कि उनके बिना शायद हैरान गंज राज्य की अर्थव्यवस्था का पहिया ही जाम हो जाए। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हु क्योंकि इस मलिन बस्ती में रहते थे कुछ हाथ के कारीगर, मजदूर और सेवक स्तर के, वह कामगार और मजदूर वर्ग के व्यक्ति जो हैरान गंज के, सुख सम्पन व्यक्तियों की रात और दिन ख़िदमत करते थे। उनकी झूठन उठाते थे और खाते भी थे। इन्ही कुछ दरिद्र मजदूरों में हरिहर नाम का एक मोची भी अपनी एक छोटी सी टूटी फूटी झोपड़ी में अपने 12 वर्षीय पुत्र भोंडा के साथ निवास करता था। भोंडा! जी हां भोंडा, अत्यंत ही सुंदर बालक था भोंडा। स्वर्ण के समान उज्वल रंग रूप और कृष्ण कन्हिया के समान कजरारे कंटीले श्याम नयन। उसके उन नीले रंग के सुंदर श्याम नयनो को देख कर, हर कोई यही कहता था कि अवश्य ही भोंडा के शरीर मे किसी राज शाही परिवार के वंशज का ही लहू दौड़ता होगा? अन्यथा कहा काला कलूटा हरिहर दरिद्र मोचि और कहा यह स्वर्ण के समान सुंदर सजीला बालक भोंडा। ऐसी भयंकर दरिद्रता में भी क्या गज़ब का आकर्षण रखता था अपना भोंडा। वैसे तो हर कोई ही भोंडा को अत्यंत ही प्रेम और दुलार करता था। परन्तु हरिहर मोचि को फिर भी रात और दिन भोंडा की ही चिंता सताए रहती थी। बिन माँ का बालक जो था बेचारा भोंडा।

एक रोज़ की बात है उस रोज़ भी सूरज अन्य दिनों के समान ही पूर्व से ही उदय हुआ था। परन्तु आज यह क्या हुआ? उस दिन अचानक ही नीले आसमां का रंग बदल कर, लाल लहू के समान हो गया और बिजली की तेज गर्ज के साथ मूसलाधार वर्षा ने सम्पूर्ण हैरान गंज राज्य को हैरान कर दिया था। अकस्मात से बदलते हुए इस भयंकर मौसम को देख कर, भोंडा अत्यंत ही भयभीत होते हुए, अपने उस टूटे से झोंपड़े में एक ओर को, कोने में दुबक कर बैठ गया और अपने पिता हरिहर मोचि के काम से वापस आने की प्रतीक्षा करने लगा। वही दूसरी ओर भोंडा का वृद्ध पिता हरिहर मोचि उस मूसलाधार वर्षा में किसी प्रकार से भीगते-भगाते हुए, अपने झोंपड़े तक पहुच जाता है। एवं अपने पुत्र भोंडा को एक आवाज लगाते हुए कहता है कि “भोंडा अरे ओ भोंडा। कहा है तू जल्दी से दरवाजा खोल, देख मैं हु तेरा बापू।” अपने बापू की आवाज़ सुनते ही, अपने झोंपड़े के भीतर एक कोने में दुबके हुए, भयभीत भोंडा को अब कुछ हौसला सा प्राप्त होता है। और वह फुर्ती से दौड़ कर, अपने उस टूटे फूटे से झोंपड़े का वह टूटा सा द्वार खोल देता है। भोंडा के द्वारा वह बन्द द्वार खोलते ही, इस भयंकर मौसम की मूसलाधार वर्षा की मार से पूरी तरह भीग चुका वृद्ध हरिहर मोचि, तुरन्त ही अपनी टूटी खटिया को पकड़ कर उस पर इस प्रकार से पसर जाता है कि मानो, अब वह उस टूटी खटिया पर से कभी उठेगा ही नही।

अपनी पिता ही ऐसी विकट स्थिति को देख कर, भोंडा कुछ घबरा जाता है और अपने वृद्ध पिता हरिहर की उस टूटी खटिया के समीप पहुच कर आहिस्ता से कहता है कि “पिता जी, पिता जी। आप ठीक तो है ना!” भोंडा के कई बार पुकारने पर भी जब हरिहर कोई जबाब नही देता, तो भोंडा भय के मारे तीव्र स्वर से रूदन करने लगता है। इस प्रकार से रोते-रोते, वह उस टूटी खटिया के समीप बैठे हुए ही, वही पर थक कर, भूखे पेट ही सो जाता है। अगले दिन प्रातः काल जब भोंडा की निंद्रा टूटती है। तो वह देखता है कि उसका पिता हरिहर मोचि, अब भी उसी विकट अवस्था में निस्तेज सा, अपनी टूटी खटिया पर बेसुध सा पड़ा हुआ है। कुछ देर अपने पिता को एकचित्त देखने के उपरांत, भोंडा आहिस्ता आहिस्ता अपने पिता के समीप पहुच जाता है। एवं आहिस्ता से एक आवाज़ लगा कर, अपने पिता को पुकारता है। परन्तु अब भी हरिहर, भोंडा की किसी भी पुकार का, जब कोई भी उत्तर नही देता। तब भोंडा पुनः जोर जोर से रोने और बिलखने लगता है। रात्रि के उस भयंकर तूफान के उपरांत, भोंडा के रोने एवं बिलखने का वह अत्यंत ही तीव्र स्वर, प्रातः कालीन शांत वातावरण में दूर तक गूँज उठता है। भोंडा के रुदन का वह तीव्र स्वर सुनकर, आस पास के बहुत से दरिद्र मजदूर जैसे कि बिसना लौहार, काटू नाई और खोटा कुम्हार आदि! उसके उस टूटे-फूटे से झोंपड़े के बाहर एकत्रित हो जाते है। और सभी एक साथ एक स्वर से आवाज लगते है कि “अरे भोंडा! क्या हो गया? क्यों सुबह-सुबह, गला फाड़ कर रो रहा है? हरिहर, ओ हरिहर, कहा हो भाई?” अपने पड़ोसियों की आवाज सुन कर भोंडा अचानक ही अपना रोना बन्द कर देता है। और फुर्ती के साथ, अपने झोपड़े से बाहर निकलते हुए अत्यंत ही दुखी होते हुए कहता है कि देखना काका बापू कुछ बोलता ही नही है। मैं कब से उसको पुकार लगा रहा हु और वह है कि सुनता ही नही है। कुछ बोलता ही नही है। भोंडा के मुख से यह सुनते ही झोपड़े के बाहर एकत्रित सभी मजदूर वर्ग के वह व्यक्ति, उसकी उस टूटी-फूटी सी झोपड़ी के भीतर प्रवेश कर जाते है और हरिहर के समीप पहुँच कर उस को उठाने का प्रयत्न करते है। परंतु हरिहर अब भी पहले की ही भांति निस्तेज सा अपनी आंखों को मूंदे वैसे ही निस्तेज सा पड़ा रहा। तब काटू नाई, जिसे नव्ज़ देखने का ज्ञान भी प्राप्त था। वह हरिहर की नव्ज़ देखता है और तुरन्त ही उसको ज्ञात हो जाता है कि हरिहर अब इस नश्वर संसार को छोड़ कर, स्वर्ग को सिधार चुका है। हरिहर की मृत्यु के बारे में जानकर काटू नाई एक दृष्टि चारों ओर घुमा कर देखता है। और अंत मैं उसकी नज़र भोंडा पर आ कर टिक जाती है। बहुत समय तक वह कुछ भावुक ह्रदय से भोंडा को देखता रहा। इस दौरान वह अब भी अपने बाए हाथ में मृत हरिहर की उस बेजान सी नव्ज़ को थामे हुए था! जो अब अपना दम तोड़ चुकी थी। तभी बिसना लौहार कुछ कह उठता है कि क्या हुआ काटू! तुम इस प्रकार से शांत क्यों हो गए हु? आखिर क्या बात है कुछ तो कहो। तब काटू अपनी उस ह्रदय को चीरती हुई चुपी को तोड़ते हुए सब को बताता है कि “हरिहर अब नही रहा। वह इस नश्वर संसार और हम सभी को छोड़ कर, स्वर्ग सिधार चुका है।” यह सुनते ही उस टूटे झोंपड़े में उपस्थित सभी व्यक्तियों पर जैसे कोई बिजली सी चोंध कर गिर जाती है। यह सुनते ही 12 वर्षीय बालक भोंडा दहाड़े मार मार कर, रोने और बिलखने लगता है। भोंडा को इस प्रकार से रोते और बिलखते हुए देख कर बिसना लौहार, काटू नाई और खोटा कुम्हार का ह्रदय, भोंडा की उस अत्यंत ही असहनीय पीड़ा से पीड़ित होते हुए फटने सा लगता है। तभी बिसना लौहार आगे को बढ़ते हुए, अत्यंत ही दुखी स्वर से रोते हुए भोंडा को चुप कराने का एक प्रयास करता है। परन्तु सब व्यर्थ सिद्ध हो जाता है। उस दिन भोंडा इस कठोर संसार मे एक दम से तन्हा और बेबस सा हो जाता है।

भोंडा को मृत हरिहर के समीप छोड़ कर बिसना, काटू और खोटा उनके उस टूटे-फूटे, झोपड़े से बाहर निकल जाते है। और भोंडा वही पर उसी अत्यंत ही भावुक अवस्था में बहुत समय तक तन्हा रोता और बिलखता रहा। तभी खोटा कुम्हार की एक आवाज़ आती है “भोंडा, बेटा भोंडा, अब शांत भी हो जाऊ, देखो अब तुमारे पिता जी का अंतिम संस्कार भी करना है।” इतना कहते हुए खोटा कुछ आगे को बढ़ते हुए भोंडा के सर पर अपना ममताभरा हाथ रख कर उसको चुप कराता है। तब आस पड़ोस के सभी जानकर दरिद्र मजदूर, भोंडा के मृत पिता हरिहर की अर्थी को कंधा दे कर, समीप के एक खाली मैदान में फूंक आते है। अब तो जैसे भोंडा के ऊपर वास्तव में कोई बिजली सी चोंध कर गिर जाती है। कुछ ही क्षणों के उपरांत, उस को इस बात का एहसास भी हो जाता है कि इस भरे संसार मे अब वह कितना अकेला और लाचार हो गया है। उस रात्रि को भोंडा के काटू काका दो सुखी रोटी और एक सूखे अचार की डली भोंडा को खाने के लिए दे देते है। जिसको खाने के उपरांत, भोंडा ना जाने कब डरा हुआ सा, सहमा हुआ सा, निंद्रा को प्राप्त हो जाता है। इस बात का उसको भी कोई एहसास ना हो सका। अगले दिन तड़के सवेरे ही भोंडा अचानक से घबरा कर अपनी निंद्रा तोड़ कर, उठ बैठ जाता है। फिर सर्वप्रथम उसकी दृष्टि अपने समीप की उस टूटी खटिया पर पड़ती है! जिस पर कल तक उसका मृत पिता हरिहर विश्राम किया करता था। परन्तु आज वह बिल्कुल रिक्त थी। जिसे देख कर भोंडा पुनः कुछ भावुक हो जाता है। और ना चाहते हुए भी उसके दोनों नयनो से अश्रु की धारा फुट कर बहने लगती है। ऐसी ही दुखद मनोवस्था से, वह अपने मृत पिता की जीवित स्मृतियों के साथ, वही उस टूटी खटिया के सिरहाने बैठ कर अत्यंत ही दुखद अवस्था में रोने लगता है। भोंडा को वहाँ बैठे-बैठे, सुबह से साँझ हो जाती है और फिर रात्रि। और वह अब भी ठीक उसी स्थान पर, उसी प्रकार से भावुक अवस्था में बैठा हुआ है। लगभग अर्धरात्रि को भोंडा की नींद भूख की व्याकुलता के कारण टूटी जाती है। और वह अपने उस टूटे-फूटे, झोपड़े से बाहर निकल कर पड़ोस के झोपड़ों की ओर निहारने लगता है। जैसे कि अभी वहा से कोई उसके लिए भोजन की सजी थाली को लेकर आने वाला हो! परन्तु उस बिन माँ और बाप के बेसहारा अनाथ बालक “भोंडा” के लिए भोजन की थाली के साथ कोई ना आया और थक हार कर भोंडा पुनः अपने मृत पिता की उस टूटी खटिया के सिरहाने बैठ कर भीगें नयनों के साथ, एक अजीब से भावनात्मक मनोभावों सहित मूर्च्छा को प्राप्त हो जाता है।

अगली प्रातः भोंडा की वह मूर्च्छा स्वतः कुछ हल्की होती है। तदोपरांत वह अपने झोपड़े के एक कोने में रखे हुए, पानी के घड़े से एक हांडी जल के द्वारा अपने भूखे और प्यासे कंठ को तर करते हुए, अपने झोंपड़े से बाहर की ओर निकल जाता है। अपने झोपड़े से बाहर निकल कर वह अपने पड़ोस के काका बिरसा, काटू और खोटा के झोपड़ों के समीप आ कर बैठ जाता है। कुछ समय उपरांत जब सूरज पूरी तरह से उदय हो कर नीले आसमान पर छा जाता है। तब आस पड़ोस के कुछ अन्य झोपड़ों से कुछ अन्य दरिद्र मजदूर व्यक्ति बाहर निकलते है। जो भोंडा को इस प्रकार से वहाँ बैठा देख कर, सहज ही भोंडा के समीप आ कर, उससे उसका हाल चाल पूछते है। उनमे से एक दरिद्र मजदूर भीखू लकड़हारा, उसको खाने के लिए रात की कुछ सूखी रोटियां भी दे देता है। उन सुखी हुई रोटियों को खाते हुए, उन दरिद्रों के आभार स्वरूप, भोंडा की आँखों से अश्रु की धारा फुट कर बह निकलती है। फिर उसको पता चलता है कि उसके जानकर तीनो काका बिरसा, काटू और खाटु पड़ोस के एक शहर में एक बहुत ही मशहूर जलसे के दौरान, मजदूरी करने के लिए गए है। अब तो भोंडा के पैरों तले की जमीन ही खिसख जाती है। और वह पुनः अपने मृत पिता की उस टूटी खटिया के सिरहाने बैठ कर, अत्यंत ही दयनीय अवस्था में, एक ख़ामोशी के साथ, अपने आँसुओ को ना चाहते हुए भी बहाने लगता है।

इस प्रकार भोंडा को अपने मृत पिता की उस टूटी खटिया के सिरहाने भूख और प्यास से व्याकुल अवस्था में रोते और बिलखते हुए, एक अनजाने भय से भयभीत होते हुए, आज पूरे दो दिन और लगभग दो रात व्यतीत होने वाले है। भोंडा अब भी एक अजीब से विकृत मनोवस्था में, वही उस टूटी खटिया के सिरहाने, अर्धमूर्छित सा पड़ा हुआ है। सूरज अभी तक उदय नही हुआ है और आसमान में अभी भी बहुत से टिमटिमाते हुए तारे टिमटिमा रहे है। पूर्व प्रातः कालीन उस वातावरण में एक अजीब सी शांति, हर दिशा छाई हुई है। अरे यह क्या हुआ? मैंने ऐसा तो नही सोचा था। यह क्या गज़ब हो गया प्रभु? क्या यह अपना भोंडा है? अरे हा, यह तो अपना भोंडा ही है। तभी अकस्मात कुछ ऐसा घटित होता है जिसके बारे में मैंने भी कभी कुछ नही सोचा था कि कभी ऐसा भी कुछ घटित होगा? आज की सुबह वास्तव में कुछ अलग थी। नही, नही, बल्कि बहुत अलग थी। लगभग दो दिन और रात्रि से भूखा और प्यासा 11 या 12 वर्षीय बालक भोंडा अपने टूटे से झोंपड़े में अपने मृत पिता की टूटी खटिया के सिरहाने बैठे हुए बेसुध सा पड़ा हुआ था। फिर अकस्मात ही यह क्या घटित हुआ? अगली प्रातः सूर्य उगने से पूर्व ही, भोंडा एक झटके के साथ खड़ा हो जाता है। और अपने उस टूटे झोंपड़े से बाहर निकल कर पड़ोस के झोपड़े के समीप रखे हुए एक घड़े से कुछ जल ग्रहण करता है। भूख के मारे उसकी अंतड़िया अब भी अत्यंत ही व्याकुल थी।

आज दो दिनों से भूखा भोंडा कुछ अजीब सी मनोस्थिति में दिखाई दे रहा था। इस दयनीय अवस्था में वह पड़ोस के एक झोपड़े के समीप रखे घड़े से अपनी प्यास की तृप्ति कर पुनः अपने झोपड़े में प्रवेश कर जाता है। तदोपरांत वह चारो ओर एक अजीब सी बेचैनी के साथ कुछ देख रहा है। अकस्मात ही जैसे उसके शरीर मे कुछ बिजली सी कौंध जाती है। और वह फुर्ती से अपने मृत पिता की बांगी लाठी को अपने दाए हाथ मे थाम कर, अपने उस टूटे झोपड़े से बाहर को परस्थान कर जाता है। भोंडा तेज़, तेज़ कदमो के साथ, समीप की उसी श्मशान के मैदान की ओर चल देता है। जहाँ उसके मृत पिता हरिहर मोचि का अंतिम संस्कार सम्पन हुआ था। कुछ ही क्षणों के उपरांत भोंडा ठीक उसी स्थान पर खड़ा हुआ था। जहा उसके मृत पिता हरिहर की चिता को उसने अंतिम विदाई द्वारा मुखाग्नि दी थी। वहाँ पहुँच कर भोंडा इस प्रकार से देख रहा था कि मानो, उसके मृत पिता हरिहर की चिता अब भी वहा धधक रही हो।

शायद उसके व्यकुल ह्रदय में या उसके उन ख़ामोश एहसासों में किसी ख़ामोशी के साथ। कुछ क्षण उसी प्रकार से मौन अवस्था मे भोंडा वही खड़ा रहा। फिर अचानक ही उसकी दृष्टि अपने कदमो से कुछ दूरी पर स्थित एक मिट्टी के पुराने कटोरे पर टिक जाती है। वह कुछ क्षणों तक एकचित्त हो कर उसको देखता रहा। फिर अचानक ही वह उसे उठा कर अपने बाए हाथ मे थाम कर, शहर की ओर चल देता है। लगभग आधे घण्टे के उपरांत वह भव्य नगर हैरान गंज के बीचों बीच स्थित हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक पर अपने एक हाथ मे अपने मृत पिता हरिहर की बांगी लाठी और दूसरे हाथ मे श्मशान का वही टूटा फूटा सा पुराना कटोरा थामे हुए, अपने सुंदर श्याम नयनो को मूंदे खड़ा हो जाता है। उसी दिन से उस शाही राज्य हैरान गंज को, अपनी भव्यता में बढ़ोतरी करने के लिए, एक सुंदर, सजीला और श्याम नयन “भोंडा” नामक एक और भिखारी प्राप्त हो जाता है।

आज उस घटना को घटित हुए लगभग चार वर्ष हो चुके है। इन चार वर्षों के उपरांत वह अनाथ बालक 12 वर्षीय भोंडा, अब एक सन्दर सजीला नवयुवक हो गया है। नवयुवक भोंडा अब हैरान गंज का एक मशहूर व्यक्ति बन गया है। हैरान गंज राज्य का हर छोटा और बड़ा व्यक्ति उसको उसके नाम से जानता है। अब आप यही विचार कर रहे होंगे कि आखिरकार भोंडा ने इन चार वर्षों में ऐसा क्या कारनामा कर दिया, जो वह भव्य और शाही नगर हैरान गंज का एक मशहूर व्यक्ति बन गया। क्या वह कोई साहूकार या राजनेता तो नही बन गया? तो यहाँ मैं आपको सूचित कर दु कि भोंडा ना तो कोई धनी साहूकार या चालक राजनेता है। अपितू वह आज भी एक भिखारी के सम्मान ही हैरान गंज राज्य में धनी व्यक्तियोँ के द्वारा प्राप्त दान से ही अपना जीवन यापन करता है। फिर वह मशहूर व्यक्ति कैसे हो सकता है?

वैसे तो भोंडा आज भी भिक्षा के सहारे ही जीवन यापन करता है। फिर हर छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा व्यक्ति उसको उसको नाम से कैसे जान सकता है? इसके पीछे भी एक कारण है। प्रथम तो भोंडा का स्वर्ण के समान उज्ज्वल रंग रूप, उस पर उसके सुंदर श्याम नयन और इन सभी पर भारी भोंडा की वह सुरीली काठ की बाँसुरी का जादुई स्वर, जिसको वह भव्य हैरान गंज नगर के उस मशहूर फव्वारा चौक पर खड़े होकर, प्रतिदिन बिना किसी अवकाश के, अपनी काठ की बांसुरी में, अपने गुलाबी होठो से फूक कर प्रवाहित करते हुए, हर राहगीर को अपना ग़ुलाम बना देता है। भोंडा को देख कर कोई भी यह नही कह सकता कि यह एक भिखारी होगा। इसके विपरीत उसको देख कर एक राज शाही परिवार के शाही खून के वंशज की सी अनुभूति सहज ही प्राप्त हो जाती है।

हैरान गंज राज्य के प्रतिष्ठित व्यक्ति, प्रतिदिन भोंडा की उस सुरीली बांसुरी के, उन मंत्रमुग्ध कर देने वाले जादुई स्वरों को सुनने के लिए, खासतौर पर फव्वारा चौक पर आते है। एवं भोंडा को प्रतिदिन बहुत से शाही खाद्य प्रदार्थ एवं दक्षिणा सहज ही प्राप्त हो जाती है। कहने को तो भोंडा एक भिखारी ही था परन्तु एक अरसे से उसने किसी के सामने भीख के लिए अपने हाथ नही फैलाए। बल्कि अब तो वह इतना मशहूर हो गया था कि उसकी उस सुरीली बाँसुरी के उन जादुई स्वरों को सुन कर, राज शाही भव्य नगर हैरान गंज के सम्पन्न व्यक्ति बिना उसके कुछ कहे ही, उसके सामने बहुत सी वस्तुओं को दान या भेंट स्वरूप सहज ही रख देते है। भोंडा भी उनकी ओर कुछ खास ध्यान दिए बिना, एक मधुर मुस्कान के साथ, अपनी उस काठ की बांसुरी से, अपने मंत्रमुग्ध कर देने वाले जादुई स्वरों का जादू हर दिशा में प्रवाहित कर देता है। यदि आप भोंडा से पूछेंगे तो वह अपने आप को एक कलाकार ही कहेगा। आखिर ऐसा हो भी क्यों ना? भोंडा की उस काठ की बाँसुरी के वो मधुर स्वर एक बार भूले से भी कोई सुन ले, तो स्वप्न में भी भुलाए ना भूल पाए।

एक रोज़ नवयुवक भोंडा प्रतिदिन के समान ही प्रातः कालीन सूर्य के उदय होने से पूर्व ही अपनी निंद्रा तोड़ कर, उठ बैठता है। तदोपरांत वह स्नानादि से निर्वरित हो कर, अपने मृत पिता की वह बांगी लाठी, जिस पर अब उसने चमड़े का एक चमकदार पत्ता चडवा दिया था। अपने एक हाथ में थाम कर और अपनी कमर से अपनी काठ की बाँसुरी को बांध कर, वह श्मशान का अपना वही पुराना कटोरा, अपने दूसरे हाथ में थामे हुए, भव्य हैरान गंज की ओर प्रस्थान कर जाता है। परन्तु आज का दिन अन्य दिनों से कई मायनों में अगल था। आज भोंडा को स्थान, स्थान पर, भव्य सजावट का कार्य करते हुए मजदूर एवं रंग रोगन करते हुए कई स्थानीय कलाकार दिखाई दे रहे है। हर बढ़ते कदम से भोंडा को राज शाही के भव्य लश्कर मूल्यवान वस्तुओं और मूल्यवान साज़ो समान (नगर को सज़ाने हेतु मूल्यवान वस्तुएं) को लाते और ले जाते हुए दिखाई दे रहे है। आज से भव्य नगर हैरान गंज तक पहुँचने का मुख्य मार्ग, आम जनता के लिए, बंद कर दिया गया था। इसीलिए भोंडा को आज हैरान गंज राज्य के घने सुंदर वन से होकर, भव्य हैरान गंज राज्य तक पहुचने हेतु, मिलो मील चल कर जाना पड़ रहा था। सुंदर वन से गुजरते हुए, भोंडा यही विचार कर रहा था कि आज ऐसा क्या महत्वपूर्ण है? जो नगर तक पहुँचने वाले मुख्य मार्ग को इस प्रकार मूल्यवान वस्तुओं से सजाया जा रहा है। परन्तु वास्तविक आचर्य या वास्तविक हैरानी तो हैरान गंज पहुच कर भोंडा को होने वाली थी। भोंडा हैरान गंज पहुँचकर हैरान होता, उससे पहले एक आचर्य भोंडा को हैरान करने हेतु, हैरान गंज के सुंदर वन में बहुत ही शांति से उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

भोंडा ने अभी लगभग आधा ही मार्ग तय किया होगा की अचानक से, अपने विचारो में मगन भोंडा को राह के एक पत्थर द्वारा टकराने से जोरदार ठोकर लग जाती है। जिससे वह लुढ़कता हुआ एक खड़ी ढलान पर गिर जाता है। इस प्रकार से लुढ़कते हुए, वह एक ओर को धड़ाम से गिर जाता है। भोंडा अभी अपने घावों को सहला ही रहा था कि तभी उसकी दृष्टि समीप ही एक मिट्टी के छोटे से टीले पर पड़ जाती है। जिसकी ज़ोरदार रगड़ से भोंडा की कोहनी कुछ छिल सी गई थी। और भोंडा के इस प्रकार तीव्र गति से लुढ़कते के परिणाम स्वरूप, वह छोटा सा मिट्टी का टीला, कुछ तड़क कर टूट सा गया था। जिसे देख कर भोंडा के उन सुंदर श्याम नीले नयनो में अकस्मात ही एक चमक उतपन्न हो जाती है। भोंडा अब एकटक उस टूटे हुए टीले की ओर निहार रहा था। ना जाने कितने समय तक, वह यू ही अपने श्याम नयनो की उस अद्भुत चमक के साथ, उस तड़क कर टूटे हुए मिट्टी के टीले को देखता रहा? फिर अकस्मात ही वह हड़बड़ाहट पूर्वक इधर उधर देखने लगता है और फुर्ती के साथ उस टूटे हुए टीले को अपने मृत पिता की बांगी लाठी से तोड़ने लगता है। भोंडा अपने लगातार प्रचंड प्रहारों से कुछ ही क्षणों के उपरांत उस पुराने मिट्टी के टीले को, तोड़ कर खंड खंड करते हुए बिखर देता है। तभी उसकी दृष्टि के समक्ष होता है मिट्टी से ढका हुआ एक कटोरा। जिसके एक हिस्से से उभरती हुई एक दिव्य अलौकिक चमक से घायल भोंडा की आँखों मे भी एक दिव्य अलौकिक चमक उतपन्न हो गई थी। अब भोंडा बिना एक क्षण भी गवाए, उस मिट्टी से ढके वजनदार कटोरे को, अपने कुर्ते से साफ करना प्रारम्भ कर देता है। जिससे वह मिट्टी से ढका हुआ कटोरा, सम्पूर्ण रूप से साफ होकर, एक दिव्य चमक से चमचमा उठता है। उसी के साथ भोंडा को प्राप्त होता है रत्न जड़ित, एक चमचमाता हुआ स्वर्ण कटोरा।

उस रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे को देख कर, भोंडा को ना जाने क्या विचार आता है कि वह उसी क्षण तीव्र गति के साथ चलते हुए, अपने टूटे झोपड़े की दिशा की ओर वापस मुड़ जाता है। जिसको अब उस ने अत्यंत ही मजबूत मिट्टी के झोपड़ीनुमा मकान में परिवर्तित कर दिया था। भोंडा अब भी तीव्र गति से अपने कदमो के द्वारा चलता ही जा रहा है। फिर अकस्मात ही वह अपनी दिशा परिवर्तित कर समीप के मैदान की ओर मुड़ जाता है। आज भोंडा एक अजीब सी मनोस्थिति के साथ समीप के मैदान में ठीक उसी स्थान पर खड़ा हुआ है। जहाँ उसके मृत पिता हरिहर का कुछ वर्षों पूर्व अंतिम संस्कार किया गया था। भोंडा के उन शयम नयनो में अब भी एक दिव्य चमक थी। किसे मालूम कि वह उस रत्न जड़ित स्वर्ण के बने हुए कटोरे की थी या किसी अन्य मनोभाव से उतपन्न हुए मनोभावों का कोई प्रभाव था। भोंडा अकस्मात ही अत्यधिक भावुक हो जाता है और तीव्र स्वर से रुदन करते हुए बिलखते लगता है। ऐसे ही रीते और बिलखते हुए भोंडा उस स्थान की खुदाई करना प्रारम्भ कर देता है। जहाँ उसके मृत पिता हरिहर का अंतिम संस्कार सम्पन हुआ था। लगभग दस से पंद्रह मिनट की खुदाई के उपराँत भोंडा अपनी बगल से इसी शमशान के मैदान से पाप्त, अपना वही वर्षो पुराना कटोरा, निकाल कर, दृष्टि भर निहारते हुए, उसे उस गहरे गढ्ढे में दफना देता है। परन्तु वह अब भी ना जाने क्यों? उसी प्रकार से एक अजीब सी विकृत मनोस्थिति के साथ, तीव्र स्वर से रुदन करते हुए, बिलखता जा रहा है। ना जाने कितने समय तक भोंडा उसी अज़ीब सी विकृत मनोस्थिति में, वहाँ उस श्मशान के मैदान में, अपने मृत पिता को याद करते हुए, रोता और बिलखता रहा। अब लगभग अर्धरात्रि का समय हो गया था। और भोंडा अब भी वही उस शमशाम के मैदान ने उसी प्रकार से घुटने के बल बैठा हुआ मातम बना रहा था। भोंडा के समीप ही तीन अन्य मृत दरिद्र व्यक्तियों की चिता अब भी धड़कते हुए जल रही थी। तभी भोंडा अपने बाए हाथ से अपने बहते हुए अश्रुओं को पोछते हुए, एक गहरी श्वास को छोड़ते हुए, उठ कर खड़ा हो जाता है। कुछ क्षण भोंडा एक शांत भाव से मौन खड़े रहने के उपरांत, वापस अपने झोपड़े की ओर मुड़ने से पूर्व, वह एक बार उस स्थान की मिट्टी को छू कर, अपने माथे से लगा लेता है। जहाँ उसके मृत पिता हरिहर का अंतिम संस्कार हुआ था। और अब जहा श्मशान का वही वर्षो पुराना कटोरा भी दफ़न था। जो उसको यही से कुछ वर्ष पूर्व अपने पिता की मृत्योपरांत प्राप्त हुआ था।

आज की रात्रि वास्तव में अत्यधिक लम्बी और बेचैनी से भरी हुई, सिद्ध होने वाली थी। इधर भोंडा अपने झोपड़े में एक बेचैन सी अवस्था के साथ, तन्हा ना जाने किन विचारो में मग्न था। ऐसे ही विचारमग्न अवस्था में ना जाने कब, उसकी आँख लग गई और उसको एक गहरी निंद्रा ने अपने आगोश में ले लिया। इस का उसको एहसास भी नही हो पाया। अगली प्रातः भोंडा प्रतिदिन के समान ही सूर्य के उगने से पूर्व ही जाग जाता है। और समीप के घड़े से एक हांडी जल द्वारा अपने सूखे कंठ को तर कर देता है। तदोपरांत वह श्मशान की मिट्टी से ढके हुए अपने रत्न जड़ित स्वर्ण के कटोरे को उठा कर चूमता है। आज भोंडा के उन सुंदर श्याम नयनो में एक अजीब सा उत्साह दिखाई दे रहा है। बिना एक क्षण भी गवाए, भोंडा अपनी पतली कमर से अपनी काठ की बांसुरी को बांध कर, अपने मृत पिता हरिहर की उस बांगी लाठी को अपने दाए हाथ में थाम लेता है और बाए हाथ में श्मशान की मिट्टी से ढका हुआ, रत्न जड़ित सवर्ण कटोरा। आज भोंडा की चाल में एक अज़ीब सी तीव्रता थी। आज भी हैरान गंज तक पहुँचने वाले मुख्य द्वार को आम जनता के लिए बंद कर दिया गया था। इसीलिए भोंडा आज भी हैरान गंज के घने सुंदर वन से होता हुआ, मुख्य नगर तक पहुचने का प्रयास कर रहा है। परन्तु आज भोंडा के उत्साह में दोगुनी वृद्धि दिखाई दे रही है। प्रथम तो अपने रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे के की प्राप्ति से उत्पन्न उत्साह से, जो कल अनजाने ही श्मशान की मिट्टी से तरबदर हो, स्वंय ही लिप गया था। जिसकी मिट्टी भोंडा ने जान बुझ कर अभी तक नही हटाई थी। जिससे किसी को उसके रत्न जड़ित सवर्ण कटोरे के बारे में कोई सुराग ना प्राप्त हो सके। दूसरा उत्साह वृद्धि का विषय था भव्य नगर हैरान गंज के मुख्य मार्ग की भव्य साज़ सज्जा, जिसके विषय में विचार करते ही उसके ह्रदय की ध्वनियां, स्वयं ही तीव्र हो जाती थी। इस प्रकार अनेक प्रकार के मनोभावों से गुजरते हुए, कुछ ही क्षणों के उपरांत, भोंडा हैरान गंज के मुख्य मार्ग के समीप पहुच जाता है और सहज ही हैरान गंज शहर में प्रवेश भी कर जाता है।

आज भव्य हैरान गंज में स्थान स्थान पर भव्य साज़ो सजावट का कार्य तीव्र गति से सक्रिय था। जिसे देखने के उपरांत, हैरान गंज का हर एक व्यक्ति, अत्यधिक उत्साहित हो रहा था। भोंडा भी इस जगमगाहट से पूर्ण भव्य साज़ सजावट को देख कर अत्यधिक उत्साहित हो गया था। जो अभी पूर्ण भी ना हो पाई थी। बिना एक क्षण भी गवाए अति उत्साहित भोंडा, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक पर, अपने मृत पिता की बांगी लाठी को थामे, श्मशान की मिट्टी से ढ़के हुए, उस रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे के साथ खड़ा हो जाता है। हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक पर, अपना स्थान ग्रहण करने के उपरांत, भोंडा अपनी पतली कमर से काठ की बाँसुरी निकाल कर, एक मनोहरी धुन फूंकते हुए उसको हर दिशा में प्रवाहित कर देता है। अभी भोंडा ने अपनी काठ की बांसुरी को फूंकना प्रारम्भ ही किया था कि उसके इर्द गिर्द उसके प्रसंशकों की एक अच्छी खासी भीड़ एकत्रित हो जाती है। फिर क्या था देखते ही देखते, स्वादिष्ट पकवानों एवं कई हैरान गंजी टके (हैरान गंज की मुद्रा) उसको सहज ही प्राप्त हो जाते है। जिन्हें एकत्रित करने के उपरांत, वह अपने झोपड़े की ओर, मुड़ने ही वाला था कि तभी, उसके समीप ही बैठे हुए बिरजू पनवाड़ी ने उसको एक आवाज़ लगा कर रोक दिया। भोंडा के रुकते ही वह बहुत ही सहजतापूर्ण भाव द्वारा भोंडा से कहता है कि क्यों भाई भोंडा! चल दिए। आज फिर से तुमने अपनी काठ की बाँसुरी फूंकी और देखते ही देखते बहुत सी मूल्यवान वस्तुए एवं स्वादिष्ठ खाद्य प्रदार्थ तुम्हें सहज ही किसी पुरस्कार के समान प्राप्त हो गए। मैं कहता हूं कि जब तुम्हारा जादू हैरान गंज के इन सम्पन्न व्यक्तियो के सर माथे पर चढ़ कर बोलता है। तो तुम कुछ समय तक और क्यों नही! अपनी इस काठ की बांसुरी से उन्हें बाबला बना कर लूट लेते? बिरजू पनवाड़ी के मुँह से यह सुनते ही भोंडा कुछ मुस्कुरा कर कहता है कि नही भाई बिरजू, मनुष्य को जीतने की आवश्यकता हो उसको उतने ही पैर पसारने चाहिए। अन्यथा स्वार्थी मनुष्य ना घर के रहते है और ना ही गुलाबी दरिया (गुलाबी दरिया हैरान गंज राज्य की भव्यता को चार चांद लगती हुई हैरान गंज की एक मशहूर दरिया) के ग़ुलाबी घाट के। समझे कुछ या पुनः समझाओ।

यह सुन कर बिरजू सहज ही मुस्कुरा कर कहता है कि सत्य है भोंडा भाई, तुम सत्य ही कहते हो। तभी तो तुम कुछ ही वर्षो में इतने मशहूर हो गए हो, आज सैकड़ो व्यक्ति तुम को तुम्हारे नाम से जानते और मानते है। एक हम है कि जिसने सम्पूर्ण उम्र हैरान गंज के हर आम से लेकर खास व्यक्ति को पान और सुपारी खिलाते हुए, व्यतीत कर दी। पर ना तो हम तुम्हारे समान मशहूर हो सकें और ना ही तुम्हारे समान ऐसा उज्ज्वल व्यक्तित्व ही बना सके। ईष्वर तुम्हारे ऊपर अपनी कृप्या दृष्टि ऐसे ही बनाए रखें। बिरजू पनवाड़ी के मुँह से यह अनमोल वचन सुन कर, भोंडा अत्यंत ही हर्षोउत्साहित हो जाता है। इसी उत्साह में, वह बिरजू से, सहज ही पूछ बैठता है कि एक बात तो बताओ काका, आज कल हैरान गंज में ये इतनी साज़ सजावट किसलिए हो रही है? भोंडा के पूछने पर बिरजू के चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ जाती है। और वह कहता है कि भोंडा भाई (सम्मानपूर्वक) क्या तुम को नही पता? आज एक दशक के उपरांत पुनः हैरान गंज राज्य में एक राज शाही जलसे (कार्निवल) का आयोजन, राज शाही (हैरान गंज का शाही परिवार) की ओर से करवाया जा रहा है। ऐसा हो भी क्यों ना! कई दशक के उपरांत राज शाही परिवार में एक जीवित उत्तराधिकारी ने जो जन्म लिया है। बिरजू के द्वारा भोंडा को हैरान गंज की इस भव्य साज सजावट का सम्पूर्ण ब्यौरा प्राप्त हो जाता है।

कुछ क्षण रुक कर बिरजू पुनः भोंडा को कुछ बताता है कि अभी तुम देखना भोंडा, कुछ ही दिनो के उपरांत कैसे कई पड़ोसी राज्यो के रंग रंगीले कलाकार एवं फ़नकारों का यहा (हैरान गंज) मेला सा लग जाएगा। सुना है इस बार के भव्य जलसे में कई विदेशी सुंदरियां भी अपने अपने नृत्य का प्रदर्शन करने वाली है। भोंडा तुम स्वंय को जरा सम्भाल कर रखना, कहि कोई विदेशी सुंदरी तुम्हारा ह्रदय ही ना चुरा कर ले जाए। मैने सुना है बहुत ही गज़ब की सुंदरियां होती है वह विदेशी नृत्यांगनाए। अपने बिरजू काका के मुह से यह सुनते ही भोंडा कुछ शरमा सा जाता है। इस प्रकार से उसके उस स्वर्ण के समान उज्ज्वल मुख का रंग शर्मो हया से लाल और फिर कुछ कुछ गुलाबी, गुलाबी सा हो जाता है। अब तो भोंडा प्रतिदिन ही तड़के तलक स्नानादि से निर्वरित हो कर, अपनी हैसियत से कुछ अधिक ही साफ सुथरे कपडे पहन कर, अपने झोंपड़े से हैरान गंज को परस्थान कर जाता है। जैसे कि यह शाही जलसा उसी के लिए राजशाहियों ने आयोजित किया हो और वह विदेशी कलाकार भी उसी के लिए ही हैरान गंज में आने वाले है। धीरे धीरे सम्पूर्ण हैरान गंज पर इस भव्य जलसे का असर हावी होने लगता है। कई नवयुवकों ने तो अब दिन में तीन से चार बार दण्ड और बैठक लगानी प्रारंभ भी कर दी है। जिससे उन विदेशी कलाकारों को उनका वह ह्रष्ट पुष्ट शरीर किसी भी प्रकार से, कही से भी, तनिक भर भी कमजोर ना लगने पाए। खास तौर पर उन विदेशी, स्वर्ग की अप्सराओँ के समान सुंदर सुंदर नृत्यांगनाओं को। अब तो अपना भोंडा भी किसी बांके नवयुवक से कम ज्ञात नही पड़ता था। आज कल भोंडा ने कई नवीन प्रकार की मनोहरी बांसुरी की धुनों को फूंकना प्रारम्भ कर दिया था। जिससे उन विदेशी कलाकारों को भी स्मरण रहे कि हैरान गंज राज्य में भी ऐसे कई कलाकार निवास करते है जो उनसे किसी भी प्रकार कम नही है। भीतर ही भीतर भोंडा को भी, उन विदेशी, स्वर्ग की अप्सराओं के समान, सुंदर सुंदर नृत्यांगनाओं के समक्ष, अपनी बाँसुरी के उन नवीन स्वरों को सुना कर, उन्हें अपनी और आकर्षित करने की एक धुन सी सवार थी। इसी कारण से अब वह सुबह से सांझ तक, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारे चौक से हिलता भी ना था। कहा तो केवल कुछ घण्टो के एक प्रयास मात्र से अनेक वस्तुओं की प्राप्ति और आत्मसंतुष्टि का ज्ञान देने वाला भोंडा, स्वयं भी आत्मसन्तुष्ट ही रहता था। और कहा अब सुबह से सांझ तक, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक से अपनी उस सुंदर काठ की बांसुरी से, वह नवीन नवीन स्वरों का रियाज़ करता है। खैर आज कल तो हर एक बालक, नोजवान, युवा और वृद्ध व्यक्ति को एक ही धुन सवार थी कि यह भव्य जलसा कब प्रारम्भ होगा? और इस स्वर्ग के समान सुंदर साज़ सजावट के बीच वह विदेशी कलाकार कब आएंगे? खास तौर पर वह स्वर्ग की अप्सराओं के समान सुंदर सुंदर नृत्यांगए (विदेशी सुंदर नृत्यांगए) जो अपने मदमस्त यौवन से हर किसी को अपना दास बनाने की एक क्षमता रखती है।

सत्य है आज कल हैरान गंज में एक नवीन ऊर्जा का प्रवाह देखने को प्राप्त हो रहा था। हर एक व्यक्ति, बच्चे से वृद्ध तक, हर किसी के मुख पर एक अज़ीब सी उतेजना देखने को प्राप्त हो रही थी। ऐसा हो भी क्यों ना? आज कई दशकों वर्ष उपरांत एक बार पुनः राज शाही ने एक भव्य जलसे का आयोजन जो किया था। कई नवयुवको एवं बालको के लिए यह शाही जलसा एक नवीन विषय था। जिसका किस्सा अक्सर वह अपने बुज़ुर्गो एवं अनुभवी व्यक्तियों से सुनते आए थे कि कैसे कभी प्रत्येक वर्ष हैरान गंज राज्य में, राज शाही की ओर से, अत्यधिक भव्य जलसे का आयोजन किया जाता था। हर ओर सुंदर, सुंदर साज़ सजावट, रंग बिरंगा, साज़ो समान, अनेको अनेक प्रकार के राज शाही स्वादिष्ठ पकवानों की आम जनता के खाने पीने हेतु मुफ्त वितरण हुआ करता था। और उन विदेशी कलाकारों का तो कहना ही क्या? ख़ास तौर पर वह विदेशी स्वर्ग की अप्सराओँ के समान सुंदर सुंदर नृत्यांगए। आज वही नवयुवक और बालक उन्ही बुजुर्गों एवं अनुभवी व्यक्तियोँ के साथ, वही सब कुछ होता हुआ स्वयं देख रहे थे। इस एक अलौकिक एहसास को शायद मैं भी अपने शब्दों से बयां ना कर सकूँ। भोंडा के लिए तो यह बिल्कुल ही नवीन विषय था क्योंकि उसके पास अन्य नवयुवको एवं बालको के समान इस भव्य जलसे का किस्से सुनाने वाला ना तो कोई बुजुर्ग था और ना ही कोई अनुभवी व्यक्ति। अब तो उसका कोई जीवित पारिवारिक सदस्य भी शेष नही था। फिर भी भोंडा अत्यंत ही उत्साहित नज़र आ रहा था। आज कल तो प्रातः काल से सांझ होने तक, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक पर, बहुत से धन संपदा से संम्पन धनी व्यक्ति, उसकी काठ की बाँसुरी से प्रवाहित होती उन नवीन धुनों को सुनने का आनन्द प्राप्त करने के हेतु, वहा उपस्थित होने लगे थे। और भोंडा को ना चाहते हुए भी उसकी आवश्यकता से कहि अधिक खाद्य सामग्री एवं हैरान गंजी टका (हैरान गंज की मुद्रा) प्राप्त हो जाते थे। जिन्हें वह अपनी उस दरिद्रों की बस्ती के उन दरिद्र व्यक्तियों में बाट कर, उनकी दरिद्रता को कुछ राहत पहुचने का एक प्रयास कर देता था।

इस प्रकार से लगभग एक से डेढ़ हफ्ते का समय व्यतीत हो जाता है और हैरान गंज की साज़ सजावट भी पूर्ण हो जाती है। इसी के साथ हैरान गंज राज्य में आगमन होता है! एक भव्य जलसे का और अब हर ओर राज शाही घोड़ सवार, रंग बिरंगी पोशाकों में चहलकदमी करते हुए, दिखाई देने लग जाते है। समय बेसमय राज शाही के, बड़े बड़े उन मशहूर ढोल एवं नगाड़ो का वह तीव्र स्वर, अब अक्सर ही सुनाई दे जाता था। ऐसे ही एक दिन भोंडा हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक, जो अब सबके आकर्षण का केंद्र था पर खड़ा हुआ अपनी काठ की बांसुरी से नवीन, नवीन, मनोहरी जादुई स्वरों को फूक कर, हर एक राहगीर का मनोरंजन कर रहा था। तभी एक अज़ीब सा शोर उसके कानों में सुनाई देता है कि आ गए, आ गए, वह वेदशी कलाकार आ गए। देखो कैसे रंग बिरेंगी पोशाके है और इसी के साथ राज शाही के वह बड़े बड़े, मशहूर ढोल और नगाड़ो की गूंज से सम्पूर्ण हैरान गंज पुनः गूंज उठता है। इससे पहले की कोई कुछ समझ पाता, देखते ही देखते कुछ ही क्षणों के उपरांत, हैरान गंज राज्य में वेदशी कलाकारों की पहली रंग बिरंगी झांखि प्रेवश करती है। उसके पीछे दूसरी, फिर तीसरी, और यह सिलसिला, बहुत समय तक, यू ही चलता रहा। ऐसी रंग बिरंगी झाखिया देख कर, भोंडा के दोनों श्याम नयन, हैरानी से खुले के खुले ही रह गए। और वह उन झांकियों के पीछे, पीछे, राज शाही के मेहमानखाने तक चला जाता है। जहाँ राज शाही के शाही वंशजो द्वारा उन विदेशी कलाकारों के ठहरने की बहुत ही सुंदर शाही व्यवस्था का प्रबंध किया गया था। तभी एक राज शाही घुड़सवार भोंडा को रोक देता है और उसको फटकार लगाते हुए कहता है कि “अरे लड़के कहा जा रहा है? देखता नही, यहा से राज शाही का शाही बाड़ा (राज शाही मेहमानखाना) प्रारंभ होता है। चल भाग जा यहाँ से, नही तो तुझ को अभी अपने घोड़े के खुरों से रौंद कर, तेरी चटनी बना दूंगा। चल भाग यहा से।” उस राज शाही घोड़ सवार की लताड़ से, भोंडा भय के मारे, उल्टे कदमो से वापस लौट आता है। उस दिन हैरान गंज के समस्त बच्चे, बूढ़े और जवानों सहित, अपने नवयुवक भोंडा का भी विदेशी कलाकारों के आगमन का इंतजार समाप्त हो जाता है।

इसी हर्षोल्लास के बीच भोंडा, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक से, अपने झोपड़े के लिए प्रस्थान करने ही वाला था कि तभी राज शाही के, वह बड़े बड़े, मशहूर ढ़ोल और नगाड़ों की तीव्र ध्वनि की गूंज से, सम्पूर्ण हैरान गंज, एक बार पुनः गूंज उठता है और एक राज शाही सन्देशक, ऊंचे ऊंचे स्वरों के साथ, हैरान गंज राज्य में राज शाही की ओर से, राज शाही जलसे के प्रारम्भ का ऐलान कर देता है कि सुनो, सुनो, सुनो, हैरान गंज के हर आम और खास को, राज शाही की ओर से, सूचित किया जाता है कि कल से लेकर आगामी पन्द्रह दिनों तक, हैरान गंज में राज शाही की ओर से एक शाही जलसे के प्रारम्भ का ऐलान किया जाता है। आप अभी को ज्ञात रहे कि इस भव्य शाही जलसे का सम्पूर्ण खर्ज, राज शाही की ओर से वहन किया जाएगा। उस राज शाही सन्देशक के द्वारा राज शाही जलसे के प्रारम्भ की सूचना प्राप्त करते ही, सम्पूर्ण हैरान गंज, बहुत समय तक हैरान गंज के नागरिकों के द्वारा उतपन्न, एक अज़ीब से हो हल्ले से गूंजता रहा। तदोपरांत समस्त हैरान गंज के नागरिक, थक हार कर, अपने अपने घर को प्रस्थान कर जाते है। आखिर कल से हैरान गंज का, वह मशहूर राज शाही जलसे का आयोजन, एक बार पुनः राज शाही की ओर से, हर आम और खास व्यक्ति के लिए, प्रारम्भ जो होने वाला था। अपना भोंडा भी, आज की अपनी समस्त कमाई को समेट कर, अपने झोपड़े के लिए परस्थान कर जाता है। आज रात्रि भोंडा को ना जाने क्यों निंद्रा ही नही आ रही थी? नही तो कहा भोंडा, प्रत्येक रात्रि को अपनी खटिया पर लेटते ही किसी खेतिहर महजूर की भांति, धड़ाम से एक गहरी निंद्रा में खो जाता है था। परन्तु आज! आज की बात कुछ अलग है। आज तो भोंडा जागते हुए ही उन सुंदर सुंदर विदेशी नृत्यांगनाओं के मधुर, मधुर, स्वप्नों में खोए जा रहा था। इस प्रकार जागृत नयनो से स्वप्न देखते, देखते, ना जाने कब उसकी आँखें लग जाती है और वह सम्पूर्ण दिन की भाग दौड़ से थका हुआ, निंद्रा को प्राप्त हो जाता है। अगली प्रातः भोंडा एक झटके के साथ अपनी खटिया से उठ बैठता है और जोर जोर से आवाज़ लगते हुए, कह उठता है कि कहा है! कहा है वह स्वर्ग की अप्सराओँ के समान सुंदर, सुंदर नृत्यांगए? ए घोड्सवार तुम मुझ को यू ही नही रोक सकते। हट जाओ, हट जाओ, अन्यथा आज यहाँ बबाल हो जाएगा। हट जाओ, हट जाओ, हट जाओ! इस अज़ीब सी बेचैनी के साथ, भोंडा एक हड़बड़ाहट के साथ, अपने स्वप्न से बाहर आ कर लगभग चीख उठता है। कुछ क्षण ऐसे ही बेचैन अवस्था के साथ वह अपनी खटिया पर बैठा रहा। फिर उसको वास्तविकता का ज्ञान होता है और वह समीप के घड़े से एक हांडी जल ग्रहण करते हुए, कुछ अंजुली भर जल अपनी आँखों पर दे मरता है। उसी समय पड़ोस का एक मुर्गा ज़ोरदार बांग लगाते हुए, भोंडा को सूचित करता है कि आज तुम मुझ से पराजित हो गए हो। आज मैं तुम से पहले ही जाग गया हूं भोंडा भाई। मुर्गे की बांग सुनते ही, भोंडा को एहसास होता है कि आज कई वर्षों के उपरांत, उसको इतनी गहरी निंद्रा आई थी।

आज राज शाही भव्य नगर हैरान गंज में राह शाही जलसे का प्रथम दिवस था और तड़के तलक ही लगभग सम्पूर्ण हैरान गंज के व्यक्ति, सज, धज कर, हैरान गंज की उन चौड़ी, चौड़ी, सजी, धजी सड़को पर, राज शाही जलसे का आनंद प्राप्त करने के लिए, अपने अपने घरों से बाहर निकल आए थे। अब यह राज शाही जलसा, यू ही निरन्तर, पन्द्रह दिनों तक, रात और दिन, अपनी रौनक, हैरान गंज में बिखरने वाला था। इधर भोंडा भी अपने झोपड़े से, अपने साज़ो समान के साथ, हैरान गंज राज्य की ओर, मुख्य मार्ग जो अब आम जनता के लिए, खोल दिया गया है से होते हुए, उत्साहपूर्वक चलता चला जा रहा है। आज हैरान गंज में हर ओर धूम सी मची हुई है। हर एक व्यक्ति चाहे वह आम हो या ख़ास, अत्यधिक उत्साहित नज़र आ रहा है। कई नवयुवक बालक अपनी अपनी टोली बना कर, हैरान गंज में धूम मचा रहे थे। भोंडा भी हैरान गंज पहुच कर, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक पर, अपना स्थान ले चुका है। आज भोंडा को ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो, वह स्वर्ग लोक के साक्षात दर्शन कर रहा हो। इतना सुंदर माहौल और ऐसी साज़ो सज़ा के बारे में, ना तो उसने आज से पूर्व कभी सुना था और ना ही कभी, कोई ऐसा अद्भुत दृश्य देखा ही था। सांझ होते, होते, कई विदेशी कलाकार भी, हैरान गंज की सड़कों पर, चहलकदमी करते हुए, दिखाई देने लगे थे। उन्हें देख कर हर कोई, अत्यधिक उत्साहित नज़र आ रहा था। परन्तु यदि कोई उन विदेशी कलाकारों से, उनके उत्साह का कारण पूछे, तो वह यही कहते कि यह कौन नवयुक है! जो स्वयं जितना सुंदर और सजीला है। उतने ही मधुर स्वर, वह अपनी काठ की बाँसुरी से, प्रवाहित कर रहा है। आज सांझ को हैरान गंज के व्यक्ति ही नही, बल्कि कई विदेशी कलाकार भी अपने, अपने, जमघट बनाए हुए, भोंडा की उस काठ की बांसुरी के, वह मधुर मधुर स्वर सुनते हुए, मंत्रमुग्ध हुए जा रहे थे। परन्तु भोंडा इस बात से अंजान, कृष्ण मुद्रा बनाए हुए, श्री कृष्ण की भांति, अपने श्याम नयनो को मूंदे हुए, अपनी उस काठ की बाँसुरी से, जादुई स्वरों को, निरन्तर हर दिशा में प्रवाहित किए जा रहा है। बहुत समय तक, वह ऐसे ही अपनी उस काठ की बाँसुरी से, उन जादुई स्वरों को प्रवाहित करता रहा। फिर अचानक से वह रुक कर, अपने बन्द श्याम नयनो को खोल देता है। तब भोंडा के इर्द गिर्द एकत्रित, समस्त व्यक्ति, जिनमे वह विदेशी कलाकार भी सम्मलित थे। अपने दोने हाथो से थाप लगाते हुए, भोंडा का उत्साहवर्धन करते है।

यह सब देख कर, भोंडा अत्यधिक उत्साहित हो जाता है। उसी समय उसकी दृष्टि, उन विदेशी कलाकारों के, एक जमघट में, मुस्कुराती हुई रोज़नलो पर, पड़कर वही ठहर जाती है। रोज़नलो जो बहुत देर से, मंत्रमुग्ध हो कर, भोंडा की जादुई बाँसुरी से, प्रवाहित होते हुए उन मनोहर स्वरों को, सुन रही थी। जिन्हें भोंडा किसी जादूगर के समान ही अपने ग़ुलाबी अधरों के द्वारा फूक कर उतपन्न कर हर दिशा प्रवाहित कर रहा था। भोंडा के उन सुंदर श्याम नयनो को देख कर, उनमे ही कहि खो जाती है। ऐसी ही कुछ मनोस्थिति, भोंडा की भी थी। वह दोनों इस समस्त संसार से बेखबर होते हुए, ना जाने कितने समय तक, यू ही बिना अपनी पलको को झपकाए, एक दूसरे के उन मनमोहक नयनो में देखते रहे। मानो उस समय यह सारा संसार ही रुक कर स्थिर हो गया था। और स्थिर हो गई थी इस संसार की समस्त वार्तालाप। अब तो भोंडा को ना तो दिन का चैन ही प्राप्त हो पा रहा था और ना ही रात्रि को उसको निंद्रा ही आ रही थी। उसको ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो उस स्वप्न सुंदरी के वह मदहोश करते हुए कजरारे नशीले नयन, उसके प्राण ले कर ही दम लेंगे। उधर रोज़नलो की सहेलियां भी, उसकी चुटकी ले रही थी कि सुना है आज कल, हमारी रोज़नलो, हर किसी राह चलते फ़क़ीर से, दिललगी करने लगी है। जिसके प्रतिउत्तर में रोज़नलो केवल मुस्कुरा देती है और कहती है कि ऐसे तो कोई भी हालात, मालूम नही होते। शायद तुम को, दिललगी की, आदत हो गई है। रोज़नलो के इतना कहते ही रोज़नलो के साथ, साथ उसकी समस्त सहेलियां, हँसते हुए, खिखिलाते हुए, राज शाही के सुंदर शाही बाग, बगीचे में दौड़ने लगती है।

वहाँ हैरान गंज में राज शाही जलसे की अगली शाम को भी, भोंडा हैरान गंज के, उस मशहूर फव्वारा चौक, जिसके फव्वारे से अब रंग, बिरंगा जल, उछाल मरता हुआ, सम्पूर्ण हैरान गंज को हैरान किए हुए था पर खड़ा हुआ, अपनी काठ की बांसुरी से, अत्यंत ही मधुर, मधुर, नवीन, नवीन स्वरों को, फूक कर, राज शाही जलसे में शिरकत करते हुए, समस्त सैलानियों को, मंत्रमुग्ध किए जा रहा था। आज भी जैसे ही वह, अपने श्याम नयनो को खोलता है कि तभी, विदेशी कलाकारों के, एक जमावड़े में से, रोज़नलो अपनी मदहोश शराबी निग़ाहों से, भोंडा के उन श्याम नयनो में देखते हुए, अपने चेहरे के एक बेहद महीन, रेशमी कपडे के नकाब से, मुस्कुरा रही थी। ऐसे ही प्रत्येक शाम को भोंडा, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक से, अपनी काठ की बांसुरी से, मनोहरी धुन छेड़ देता है और रोज़नलो उसी प्रकार मंत्रमुग्ध हो कर, भोंडा के उन जादुई स्वरों को सुनने के लिए, वहा आती है। तदोपरांत भोंडा, जब अपने उन श्याम नयनो को, खोल कर देखता, तो सामने रोज़नलो की, मदहोश कर देने वाली, उन्ही खूबसूरत शराबी निग़ाहों को, अपनी ओर देखते हुए पाता।

फिर एक सांझ को कुछ अज़ीब सा हुआ! जिसकी ना तो भोंडा ने कभी कोई कल्पना करि थी और ना ही रोज़नलो ने ही ऐसा कुछ कभी घटित होगा! यह सोचा था। आज हैरान गंज के उस, राज शाही जलसे की भव्य रौनक और धूम धड़ाके को, पूरे 11 या 12 दिन हो चले थे और भोंडा आज भी, अपनी हैसियत से बढ़कर, सुंदर पोशाक पहने हुए, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक, जिससे अब राज शाही जलसे के दौरान, रंग बिरंगा जल, उछाल मारता हुआ निकलता था पर खड़ा हुआ, अपनी काठ की बांसुरी से, अत्यंत ही मनमोहक जादुई स्वरों को फूक रहा था। जिसको सुनकर हर सैलानियों का ह्रदय, चिर कर बस यही कह रहा था कि बस! अब ये दर्द, ये जादुई स्वरों का जादू और नही साह जाता। वाह भोंडा वाह! क्या खूब रंग जमाया है। मान गए भोंडा! भई वाह। और वही एक ओर विदेशी कलाकारों के, एक जमावड़े में, बेहद हसीन और कमसिन काया रोज़नलो भी, भोंडा के उन जादुई स्वरों से मंत्रमुग्ध हो रही थी। अभी जलसा अपने पूरे शबाब पर था कि तभी एक ओर से, एक तीव्र शोर, हर दिशा गूंज उठता है कि मारो मारो, पकड़ो पकड़ो, मार दे साले को, पकड़ साले को, गर्दन तोड़ इसकी। फव्वारा चौक के समीप ही, नवयुवको की दो टोलियों में, एक विदेशी कलाकार, सुंदरी नृत्यांगना को लेकर, आपस मे एक ख़ूनी झड़प, प्रारम्भ हो गई थी। अचानक इस प्रकार के शोर शराबे से, वहाँ एक भगदड़ सी मच जाती है और भोंडा के समीप एकत्रित समस्त सैलानी, वहाँ से दूसरी ओर जलसे का आनन्द प्राप्त करने हेतु, परस्थान कर जाते है। बाबरा भोंडा अब भी अपनी काठ की उस बाँसुरी से जादुई स्वरों को, अपने दोनों श्याम नयनो को मूंदे, फूंके जा रहा था, बस फुके ही जा रहा था। जब कि उस के इर्द गिर्द एकत्रित समस्त सैलानी, झगड़े की भगदड़ से बचने हेतु, दूसरी ओर जलसे का आनन्द प्राप्त करने के लिए परस्थान कर गए थे। यदि वहाँ कोई था तो केवल और केवल, सुंदर रोज़नलो और बाँसुरी बजाता हुआ अपना भोंडा। जो अब भी किसी बाबरे प्रेमी की भांति, अपने बाँसुरी से मनोहर जादुई स्वरों को फूंके जा रहा था। तभी आसमान में, एक तेज़ गर्जना के साथ, मूसलाधार वर्षा की बौछार, प्रारम्भ होने लगती है। परन्तु भोंडा अब भी अपनी बाँसुरी से, जादुई स्वरों को फूक रहा था और अपने इस दीवानेपन में, वह यह भी भूल गया था कि उसके पास जो कटोरा है! वह रत्नजड़ित स्वर्ण कटोरा है। जिस पर वर्षा की बौछार होने से, उसके रत्नजड़ित स्वर्ण का वह सुनहरा रंग, कई जगह से, खुल कर सामने आ गया था। परन्तु इस समय वहाँ सिर्फ रोज़नलो ही मौजूद थी। जिसने भोंडा के उस रत्नजड़ित स्वर्ण कटोरे का राज जान लिया था और वह आहिस्ता, आहिस्ता से भोंडा के समीप पहुचती है। तभी भोंडा अपने सुंदर श्याम नयनो को खोल देता है। और उसके ठीक सामने होती है बेहद हसीन रोज़नलो।

रोज़नलो को अपने इतने समीप देख कर, भोंडा के होशोहवास, कहि खो जाते है। इससे पहले की वह कुछ समझ पाता, रोज़नलो अपने उन गुलाब की पंखुड़ियों के सामान सुंदर एवं रसीले अधरों को, भोंडा के उन कपकपाते हुए अधरों पर, रख देती है। और ना जाने कब तक, वह उसी मुद्रा में उसी प्रकार से, एक दूसरे के समीप, एक दूसरे के अधरों से अधरों को मिलाए, अत्यंत ही समीप से एक दूसरे को समझने का प्रयास करते रहे। तभी एक बार पुनः, नवयुवको की उन बदमाश टोलियो के, झगड़े का स्वर हर दिशा गूंज उठता है और रोज़नलो अपने रेशमी वस्त्रों में से, एक पर्चा भोंडा के हाथों में थमाते हुए, बिना कुछ कहे ही वहाँ से चली जाती है। जाते समय रोज़नलो की उन मदहोश निग़ाहों ने, भोंडा पर ऐसा जादू किया कि वह ना जाने कब तक, यू ही किसी मूर्त के समान स्थिर अवस्था मे, वहाँ खड़ा रहा, फिर अचानक ही भोंडा को कुछ चेतना आती है और वह अपने उस रत्नजड़ित स्वर्ण कटोरे, समेत उस गुलाबी पर्चे को, जिसे रोज़नलो ने उसके हाथों में थमा दिया था को अपने, थैले में रख देता है। तदोपरांत भोंडा एक अज़ीब से उत्साह के साथ अपने झोपड़े की ओर परस्थान कर जाता है। आज भोंडा की जन्मोजन्म पुरानी, कोई अधूरी ख़्वाहिश, बिन मांगे ही पूर्ण हो गई थी। भोंडा अब अपने झोंपड़े के भीतर प्रवेश कर चुका है। परन्तु उसको अब भी विशवास नही हो रहा कि आज उस विदेशी, स्वर्ग की अप्सरा के समान सुंदर हसीना ने उसके अधरों को, अपने कोमल और रसीले अधरों से, स्वयं ही चुम कर, उसकी व्याकुल आत्मा को अंदर तक तृप्त कर दिया है। फिर अकस्मात ही भोंडा को कुछ स्मरण होता है और वह अपने थैले में से, उस गुलाबी पर्चे को निकाल कर, अत्यंत ही प्रेम भरी भावना के साथ, देखते हुए चुम लेता है। जिस पर उस विदेशी हसीना का एक चित्र अंकित था। इस प्रकार बारम्बार, उस विदेशी हसीना के, उस चित्र को चूमते हुए, भोंडा उसके चित्र को अपने सीने से लगा कर, अपने बेचैन धड़कते हुए दिल के समीप रख कर, अपनी खटिया पर लेट जाता है। इस प्रकार से भोंडा सम्पूर्ण रात्रि, उस गुलाबी पर्चे को अपने सीने से लगाए हुए, अपनी खटिया पर लेटा रहा। जिसे रोज़नलो ने जाते समय, उसके हाथों में थमा दिया था। आज भोंडा को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे उसकी सुनी दुनिया को, मोहब्ब्त की हसीन ख़ुशबू ने, महका कर गुलज़ार कर दिया है। और भोंडा सम्पुर्ण रात्रि एक प्रेम भरी बेचैनी के साथ, सकूँ से प्रेम की सांसे भरता रहा।

वही दूसरी ओर राज शाही के मेहमानखाने में, रोज़नलो की सखियां, उसके साथ अटखेलियां करते हुए, उसको छेड़ रही थी कि वाह रोज़नलो वाह! मान गए हम, आज तो तुम ने कमाल ही कर दिया। तुम से हमें ऐसी तो कोई भी उम्मीद ना थी! अपनी सखियों के मुंह से यह सुनते ही, रोज़नलो कुछ बेचैन सी होते हुए, कहती है कि तुम्हारा इस प्रकार से, व्यंग्य करने का तातपर्य क्या है सखी! रोज़नलो को यू अंजान बनते देख, उसकी सखियां पुनः कुछ अठखेली करते हुए, कहती है कि ना, ना, रोज़नलो हमने तो कुछ भी ना कहा। तुम ने तो बेवजह ही, अपने गुलाबी अधरों को दबा लिया है। इतना कहते हुए रोजनालो की सभी सखियां, हंसती मुस्कुराती हुई, समीप के एक रेशमी गलीचे पर लेट जाती है। अपनी सखियों की इस प्रकार की अटखेलियों से, रोज़नलो कुछ लज्जा से शरमा जाती है। अगली दिन भोंडा, प्रातः काल से पूर्व ही, राज शाही जलसे में शामिल हो जाता है। और हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक पर, बैठ कर रोज़नलो की प्रतीक्षा करने लगता है। इस प्रकार भोंडा को रोज़नलो की प्रतीक्षा करते हुए, प्रातः काल से दोपहर, फिर दोपहर से सांझ हो जाती है। परन्तु आज रोज़नलो का दूर, दूर तक, कहि कुछ अता पता नही लग रहा था। आज प्रातः काल से सांझ होने तक, ना जाने कितने ही राहगीर सैलानियों ने, भोंडा से उसकी उस काठ की बाँसुरी से, वह जादुई स्वरों को फूंकने का आग्रह किया! जिनका सम्पूर्ण हैरान गंज कायल था। परन्तु भोंडा एक दिवाने की भांति गुमसुम सा, एक ओर को बैठा रहा और अब जबकि आसमान में रात्रि के तारे टीम टमाने लगे है! तो भोंडा को अब भी सिर्फ रोज़नलो का ही इंतज़ार है। जैसे वह अभी उसके सामने प्रकट हो कर, उसके उन बेचैन अधरों को, अपने गुलाबी रसीले अधरों से, चुम कर तृप्त कर देगी। परन्तु आज रोज़नलो नही आई और भोंडा को उसके प्रेम भरे दर्शन प्राप्त नही हो सके। तभी भोंडा अपने कुर्ते की जेब से वह ग़ुलाबी पर्चा, जो रोज़नलो ने कल, उसके हाथों में थमा दिया था को निकाल कर, अत्यंत ही करुणामय भावों से उसको देखने लगता है। उस ग़ुलाबी पर्चे को देखते हुए, उसकी आँखों से अश्रु की धारा बहते हुए, उस ग़ुलाबी पर्चें को भिगोकर, उस पर भोंडा के प्रेमस्वरूप, मोहब्ब्त के निशान, छोड़ देते है।

वहाँ से कुछ ही दूरी पर भोंडा का मित्र बिरजू पनवाड़ी, यह सब कुछ बहुत ही ध्यान से देख रहा था। भोंडा की इस प्रकार से दयनीय स्थिति देख कर, उसको अत्यंत ही पीड़ा हो रही थी। तभी वह भोंडा की ओर चलते हुए, उसके समीप आ कर, खड़ा हो जाता है और वह भोंडा से इस प्रकार दुःखी हो कर, अपने अश्रुओं को, बहाने का कारण पूछता है। बिरजू के सहानुभूति पूर्ण वचनों को सुन कर, भोंडा को कुछ धीरज बंधता है और वह बिरजू को अब तक का समस्त हाल ए दिल कह सुनाता है। जिसे सुन कर बिरजू कहता है कि भोंडा तुम सचमुच, अत्यंत ही भाग्यशाली हो। अन्यथा उन विदेशी सुंदरियों के इर्द गिर्द, उनके हुस्न से आकर्षित हो कर, चक्कर लगाते हुए, मैं कई साहूकारों और नवयुवको को आजकल प्रतिदिन ही देखता हूं। परन्तु वह किसी पर घास बराबर ध्यान भी नही देती। यदि तुम सत्य कह रहे हो! तो तुम सचमुच अत्यंत ही भाग्यशाही ही कहलाओगे। तभी बनवारी दुखी भोंडा के हाथों से, उस गुलाबी पर्चे को, अपने हाथों में थाम कर समीप से देखता है। तदोपरांत वह अत्यंत ही उत्साहित होते हुए कहता है कि भोंडा तुम तो सचमुझ ही अत्यंत भाग्यशाली हो। जानते हो यह क्या है?

बिरजू के मुख से यह सुनते ही, भोंडा अत्यंत ही सहज भाव से, कहता है कि “नही, मुझ को नही पता, क्या यह प्रेम पत्र है?” भोंडा के मासूमियत भरे स्वरों को सुन कर, बिरजू कुछ मुस्कुराता हुए, भोंडा को बताता है कि यह राज शाही के, उस शाही नृत्य के भव्य कार्यक्रम का, प्रथम श्रेणी का प्रवेश पत्र है। जिसके द्वारा तुम राज शाही के उस शाही नृत्य के कार्यक्रम को, अत्यंत ही समीप से देख सकते हो। जिसके लिए वह स्वर्ग की अप्सराओँ के समान सुंदर, सुंदर विदेशी नृत्यांगए, हैरान गंज के इस राज शाही जलसे में, शिरकत करने के लिए आई है। बिरजू के द्वारा यह जानकारी प्राप्त करते ही, भोंडा अत्यंत ही हर्षोउत्साहित हो उठता है। और वह बिरजू से कहता है कि सत्य, तुम सत्य कह रहे हो बिरजू! तभी बिरजू इसका उत्तर देते हुए, कहता है कि हा भई हा, मैं सत्य कह रहा हु। भला मैं तुम से कभी असत्य वचन बोल सकता हु। इतना सुनते ही भोंडा बिरजू को, अपने गले से लगा कर, भावनात्मक अश्रु बहाने लगता है। तदोपरांत वह बिरजू से अलविदा लेते हुए, स्नानादि करके एक नवीन पोशाक पहन कर, राज शाही के उस शाही नृत्य के, कार्यक्रम के स्थान की ओर चल देता है। जिसके विषय में बिरजू ने उसको बताया था। भोंडा अब अत्यधिक उत्साहित दिखाई दे रहा है और वह विचार कर रहा था कि जब वह रोज़नलो से भेंट करेगा, तो उससे बहुत सी वार्तालाप करेगा। वह उससे झगड़ा भी करेगा और उससे पूछेगा की वह आज उसकी बाँसुरी की धुन को, सुनने के लिए क्यों नही आई! परन्तु वास्तविकता तो यह थी कि अंदर ही अंदर भोंडा कुछ भयभीत हो रहा था। उसको यह विचार बारम्बार सताए जा रहा था कि यदि उसको, राज शाही के शाही सैनिकों ने, राज शाही के उस शाही नृत्य के कार्यक्रम में, प्रवेश करने से रोक दिया! तो उसका क्या होगा। कहि वह उसको मरेंगे, पिटेंगे तो नही। इन्ही सब विचारो की उधेड़बुन के साथ, भोंडा एक अज़ीब सी मनोस्थिति के साथ, राज शाही के शाही नृत्य के कार्यक्रम में रोज़नलो से भेंट करने हेतु, अंधाधुंध चले जा रहा था और कुछ ही क्षणों के उपरांत, भोंडा उस राज शाही के शाही नृत्य के शाही कार्यक्रम के प्रवेश द्वार पर, पहुच कर रुक जाता है।

वह एक असमंजस में है कि वह यहा तक तो आ गया है परन्तु राज शाही के शाही नृत्य के कार्यक्रम के उस प्रवेश द्वार के भीतर प्रवेश करने का, उसको अब भी कोई हौसला प्राप्त नही हो रहा है। तभी राज शाही के शाही नृत्य के भव्य कार्यक्रम के प्रवेश द्वार पर तैनात, एक शाही दरबान, भोंडा से इस प्रकार वहाँ हैरान परेशान होने का कारण पूछता है। तब भोंडा उसको वह ग़ुलाबी पर्चा जो वास्तव मे एक प्रथम श्रेणी का प्रवेश पत्र (टिकट) था। दिखाते हुए कहता है कि यह देखो भाई! क्या यही वह विदेशी नृत्यांगए, अपने नृत्य का प्रदर्शन करती है। भोंडा के पास प्रथम श्रेणी का प्रवेश पत्र देख कर, पहले तो वह दरबान, कुछ हैरान होता है। तदोपरांत कुछ मुस्कुराते हुए कहता है कि “श्री मान अपने अत्यधिक विलम्भ कर दिया है क्योंकि कार्यक्रम तो बहुत समय पूर्व से प्रारंभ हो कर, अब अपने चरम पर है। आइए, आइए श्री मान।” और वह मुस्कुराते हुए प्रवेश द्वार को खोल देता है। जिसके उपरांत भोंडा अत्यधिक उत्साह के साथ, उस राज शाही के भव्य प्रवेश द्वार से होते हुए, भीतर प्रवेश कर जाता है।

उस भव्य प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश करने के उपरांत, भोंडा अभी मुश्किल से, कुछ कदम ही चला होगा कि उसके कानों में राज शाही के उस भव्य कार्यक्रम के, हर्षोउल्लास से भरे हुए स्वर, गूंज उठे। जैसे, जैसे वह आगे की ओर बढ़ रहा था! वैसे, वैसे उसके ह्रदय की धड़कने, तेज़ और तेज़, बहुत तेज़ होती जा रही थी। कुछ ही कदमो के इंतज़ार के उपरांत, भोंडा उस आलीशान भव्य शाही दरबार मे प्रवेश कर जाता है। जहाँ राज शाही नृत्य का कार्यक्रम अपने चरम पर पहुँचते हुए, हर किसी को मंत्रमुग्ध किए हुए था। भोंडा अभी भी अपने बैठने के लिए स्थान की तलाश कर रहा था कि तभी भीतरी द्वार का एक शाही दरबान, भोंडा के प्रवेश पत्र को देख कर, उसको बताता है कि यह प्रथम श्रेणी का प्रवेश पत्र है। इसीलिए आप बाजू के गलियारे से होते हुए, प्रथम पंती के तीसरे स्थान पर विराजमान हो कर, इस शाही नृत्य के भव्य कार्यक्रम का आनन्द प्राप्त करें। भीतरी द्वार के दरबान के दिशा निर्देश अनुसार, भोंडा बाजू के गलियारें से होता हुआ, प्रथम पंती के तीसरे स्थान की और चल देता है। जैसे, जैसे भोंडा प्रथम श्रेणी की प्रथम पंती के, अपने तीसरे स्थान की ओर बढ़ रहा है, वैसे, वैसे, उसको इस राज शाही के भव्य कार्यक्रम की चकाचौंध कर देनी वाली, साज़ सजावट का एहसास होना, प्रारम्भ हो जाता है। हर बढ़ते कदम से इस शाही कार्यक्रम की भव्यता, पूर्व से कही अधिक ज्ञात होने लगी है। इसके साथ ही सामने के उस आलीशान भव्य मंच के दृश्य, अब पहले से कही अधिक भव्य और स्पष्ट दिखाई देने लगे है। भोंडा जैसे जैसे आगे की ओर बढ़ रहा है। वैसे, वैसे उसके कानों में इस राज शाही भव्य नृत्य कार्यक्रम के, मधुर संगीत के स्वरों का, एक अनोखा सा जादू , उसके मस्तिक्ष पर हावी होने लगा है। हर बढ़ते कदम से सामने के दृश्य पूर्व से कही अधिक रंगीन और संगीत कहि अधिक मधुर और तीव्र होता जा रहा है। अब भोंडा प्रथम श्रेणी की प्रथम पंती के अपने तीसरे स्थान पर, सहज ही विराजमान हो जाता है। जहाँ उसके प्रवेश पत्र की संख्या के साथ और बड़े बड़े अक्षरों में उसका नाम अंकित था “भोंडा”।

भोंडा किसी प्रकार से अपने उतेजित ह्रदय की धड़कती ध्वनियों को थामे हुए, कार्यक्रम देखना प्रारम्भ कर देता है। उसको अब भी विशवास नही हो रहा कि वह आज यहाँ राज शाही के इस भव्य नृत्य कार्यक्रम में, यू इस प्रकार से प्रथम श्रेणी की पंती में बैठ कर, इस प्रकार से, इस भव्य शाही कार्यक्रम का आनन्द प्राप्त कर रहा है। तभी भोंड़ा को रोज़नलो का विचार आता है कि रोज़नलो, वह कहा होगी! क्या वो भी यहा नृत्य करेगी? अभी भोंडा, यह सब कुछ विचार कर ही रहा था कि तभी संगीत की धुन बदल कर, कुछ अत्यधिक उतेजित हो जाती है और हर दिशा में एक ही स्वर “रोज़नलो, रोज़नलो, रोज़नलो…रोज़नलो! गूंज उठता है। उसी समय आज के, इस भव्य नृत्य कार्यक्रम के, सबसे अहम भाग का प्रारंभ होता है। जिसके लिए वहाँ सभी रसिया लोग, उपस्थित हुए थे। उस भव्य नृत्य कार्यक्रम के, सबसे अहम भाग के, प्रारंभ होते ही, भोंडा देखता है कि रोज़नलो एक अत्यंत ही कामुक और शाही पोशाक पहने हुए, मंच पर अपनी पतली सुनहरी कमर के, ज़ोरदार लटकों झटकों से, हर किसी के ह्रदय को चिर कर रख देती है। रोज़नलो, उस अत्यधित उतेजित कर देने वाले, उस संगीत की धुन पर, ऐसे नृत्य कर रही है जैसे कि वह कोई ज़हरीली नागिन हो। भोंडा की दृष्टि के ठीक सामने, रोज़नलो अपना अत्यधिक कामुकता से भरा, नृत्य प्रस्तुत कर रही है और जिस संगीत पर, वह अपने जलवे बिखेर रही थी! वह भोंडा के कानों में, किसी ज़हर के समान घुलते हुए, उसकी रग रग में समाए जा रहा था। तभी भोंडा के समक्ष, एक राज शाही सेवक हाथो में, रंगीन राज शाही मदिरा से भरे जाम की तश्तरी लिए, उससे मदिरा पान का आग्रह करता है और भोंडा, जिसने आज तक कभी कोई एक पान भी नही चखा था। जिसने आज तक चिलम या हुक्के का एक कश भी नही लगाया था। आज वह रोज़नलो के उस कामुक नृत्य से, अत्यधिक आहात हुए, एक के बाद एक, मदिरा के कई भरे जाम, खाली कर देता है।

अब यह राज शाही, भव्य नृत्य कार्यक्रम, अपने अँतिम पड़ाव पर पँहुचते हुए, अपनी कामुकता एवं भव्यता के चरम सीमा तक पहुचते हुए, हर किसी को नाचने और गुनगुनाने के लिए, स्वतः ही विवश किए हुए था। उधर मंच पर, रोज़नलो भी अपने, कामुक नृत्य के चरम पर थी। इधर भोंडा भी, पहले से कही अधिक, आहात हो चुका था। भोंडा के कानों में, वह कामुक संगीत, जिस पर रोज़नलो, अत्यधिक कामुकता के साथ, नृत्य कर रही थी। किसी पिंघले हुए, शिशे के समान, समाए जा रहा था। अब अकस्मात ही उस शाही नृत्य दरबार मे, एक मदहोशी सी छा जाती है। और भोंडा भी मदिरा के सरूर में, वह कामुक संगीत, जो कुछ समय पूर्व तक, उसको आहात किए हुए था। तीव्र स्वर से गुनगुनाना प्रारम्भ कर देता है कि “जलवा, जलवा, शहर में आया है जलवा जलवा, देखले तू जलवा, जलवा, हुस्न है, इश्क है, और ये जलवा, जलवा, शहर में आया है, जलवा, जलवा। ना मोहब्बते, ना आरज़ू, ना कोई ख्वाहिशें, बस है यहा, ये जलवा, जलवा, हुस्न है, इश्क है, और ये जलवा, जलवा। आशिके, हुस्न का, फूटता फवार, ये जलवा, जलवा।”।

तभी भव्य मंच पर, एक रेशमी रंगीन पर्दा, गिर कर, आज के इस भव्य राज शाही नृत्य कार्यक्रम के, समापन की घोषणा, कर देता है। परन्तु भोंडा अभी भी, शाही मदिरा के सरूर में, एक तीव्र स्वर से, वही संगीत गुनगुनाए जा रहा था कि “जलवा, जलवा, शहर में आया है जलवा, जलवा” नवयुवक भोंडा की ऐसी स्थिति, देख कर, भीतरी दरबानों में से एक, भोंडा के समीप पहुच कर, उसको सहारा देते हुए, निकास द्वार से, बाहर की ओर, जाने के लिए कहता है और भोंडा अब भी “जलवा, जलवा, शहर में आया है, जलवा, जलवा, हुस्न है, इश्क है, और ये, जलवा, जलवा” तदोपरांत अचानक ही, भोंडा मदिरा के सरूर में, उस राज शाही दरबान को, एक ओर धकेल देता है और उसकी जुबान पर, अब भी वह स्वर थे कि “जलवा, जलवा, शहर में आया है, जलवा, जलवा, देखले तू, जलवा, जलवा”। भोंडा की इस गुस्ताखी पर, राज शाही दरबान, अपना हाथ उठा कर, मदिरा के सरूर में धुत, भोंडा को सबक सिखाने ही वाला था कि ठीक उसी समय, कोई उसके उस उठे हुए हाथ को, पीछे से पकड़ कर झटक देता है। जैसे ही वह राज शाही के, भीतरी द्वार का दरबान, पलट कर देखता है! तो उसके होश उड़ जाते है। क्यों कि उसके उस उठे हुए हाथ को, झटकने वाले हाथ, किसी और के नही, बल्कि स्वयं राज शाही नृत्यांगना, अत्यंत ही आकर्षित एवं सुंदरी, रोज़नलो के थे। रोज़नलो को इस प्रकार से, अपने समीप खड़ा देख कर, वह भीतरी द्वार का दरबान, पसीने पसीने हो जाता है और बिना कुछ कहे, अपने दोनों हाथों को, बहुत ही अदब के साथ, बांधकर, अपने सर को झुकाए, एक ओर ख़ामोश सा खड़ा हो जाता है। भोंडा की ऐसी अज़ीब सी, विकृत स्थिति को देख कर, रोज़नलो, उस भीतरी द्वार के दरबान को, कहती है कि “ए दरबान मेरे वचन को अब जरा ध्यानपूर्वक सुनना। देखो! साहब को मेरे पीछे पीछे, मेरे कक्ष तक ले कर आओ। हा, ध्यान रहे! इन्हें किंचित मात्र भी, समस्या ना उतपन होने पाए। यह हमारे, बहुत ही महत्वपूर्ण अथिति है। इस प्रकार वह भीतरी द्वार का दरबान, रोज़नलो के वचन अनुसार, राज शाही मदिरा के नशे में धुत, भोंडा को किसी प्रकार सहारा देते हुए, रोज़नलो के उस राज शाही मेहमानखाने के, भव्य कक्ष में छोड़ कर, बाहर की ओर परस्थान कर जाता है।

भोंडा अब भी नशे में धुत, मदहोश अवस्था मे, वही संगीत गुनगुनाए जा रहा था कि “जलवा, जलवा, शहर में आया है, जलवा, जलवा, देखले तू, जलवा, जलवा, हुस्न है, इश्क़ है और ये, जलवा, जलवा। तभी भोंडा को एक ज़ोरदार हिचकी आती है। उस हिचकी के साथ ही वह, रोज़नलो के उस राज शाही मेहमानखाने के, भव्य कक्ष के उस मख़मली बिस्तर पर, बेसुध को कर गिर जाता है। रोज़नलो, आहिस्ता से नशे में धुत भोंडा के समीप आती है और उसको पुकारते हुए चेतना दिलाने का, एक पुरज़ोर प्रयास करती है। परन्तु रोज़नलो के हर एक प्रयत्न के उपरांत भी, जब भोंडा को चेतना नही आती, तो रोज़नलो, उस भव्य राज शाही कक्ष की वह रंगीन रौशनी, एक फूंक से बुझा कर अँधेरा देती है। अगली प्रातः जब भोंडा को कुछ चेतना आती है! तो वह स्वयं को, एक आलीशान महल के समान, सुंदर कक्ष में, बिल्कुल नग्न अवस्था में, एक मख़मली चादर से ढका हुआ पाता है। वास्तविक हैरानी, तो उसको तब होती है! जब वह अत्यधिक आकर्षित, रूप सौंदर्य की मल्लिका, रोज़नलो को भी बिल्कुल अपनी बगल में, एकदम नग्न अवस्था में सोता हुआ पाता है। इससे पहले की भोंडा कुछ समझ पाता, रोज़नलो उसी नग्न अवस्था में, भोंडा को अपने प्रेम भरे आलिंगन में जकड़ लेती है और उसको अत्यंत ही प्रेम से चुम्बन करते हुए, कहती है कि सुप्रभात डार्लिंग। तुम, हमको बहुत अच्छा लगता है। रात को तुम ने कितना हंगामा किया, तुम को कुछ होश भी नही है। हम कितना डर गया था। रोज़नलो, भोंडा को अभी भी, अपने प्रेम भरे आलिंगन में, उसी प्रकार नग्न अवस्था के साथ, जकड़े हुए थी और भोंडा के तो जैसे प्राण पखेरू ही उड़ गए थे। इस नग्न अवस्था में भोंडा, शर्म से लाल होते हुए, उस रेशमी बिस्तर में सिमटता हुआ, जमीन में गढ़े जा रहा था और उसने लज्जा से, अपने दोनों नयनों को अत्यधिक जोर से मूंद लिया था।

तभी रोज़नलो उसी प्रकार से उस नग्न अवस्था में ही, बिस्तर से बाहर निकलते हुए, उस रेशमी चादर को खींच कर, भोंड़ा के नग्न बदन से अगल करते हुए, स्वयं के नग्न बदन पर लपेट लेती है। रोज़नलो की इस हरक़त से, भोंडा शर्म से पानी पानी हो जाता है और दौड़ कर एक रेशमी पर्दे के, पीछे छुप जाता है। भोंडा को इस प्रकार से शर्माता हुआ देख कर, रोज़नलो की हंसी छूट जाती है और वह भोंडा को उसके कपडे पकड़ाते हुए, अत्यंत ही प्रेम भरे स्वर से कहती है कि लीजिए पहन लीजिए। हम अभी आते है तुम को बहुत शर्म आता है डार्लिंग। इतना कह कर रोज़नलो एक दूसरे रेशमी महिम जालीदार पर्दे के पीछे, अपने वस्त्रों को पहनते हुए, भोंडा से कहती है कि हम तो तुम्हारा नाम भी नही पूछा। रोज़नलो के इतना कहते ही, नवयुक भोंडा, पर्दे के पीछे से अपने कपड़े पहन कर, बाहर निकलते हुए कहता है कि जी “भोंडा” भोंडा नाम है मेरा। तभी रोज़नलो उस अर्धनग्न अवस्था मे, उस महीन पर्दे के पीछे से बाहर आते हुए, कहती है कि “ओह भोंडा” कितना सुंदर नाम है तुम्हारा। रोज़नलो को इस प्रकार से उस अर्धनग्न अवस्था मे देख कर, भोंडा पुनः शर्म से लाल, होने लगता है। भोंडा को पुनः इस प्रकार से शर्माते हुए, देख कर, रोज़नलो कहती है कि “भोंडा” तुम अब क्यों शर्माता है? कल रात्रि को तुम ने कितना मदिरा पी लिया था! तुम को कुछ चेतना भी नही था। हम तुम को सहारा दे कर, अपने इस कक्ष में लाया और तुमने, हमारे साथ! इतना कहते हए, रोज़नलो रोने लगती है। रोज़नलो को इस प्रकार से रोता हुआ देख कर, भोंडा कुछ घबरा जाता है और वह रोज़नलो के उस अर्धनग्न, अत्यधिक आकर्षित, कामुक, मख़मली बदन को, अपनी दोनों मजबूत भुजाओं से थाम कर, अत्यधिक प्रेमपूर्वक कहता है कि कृपया आप रोए नही रोज़नलो। भोंडा के इतना कहते ही रोज़नलो अपनी मदहोश कर

कर देने वाली उन नशीली निग़ाहों से, अत्यधिक प्रेम के साथ, भोंडा के उन श्याम नयनों में देखते हुए, कहती है कि भोंडा तुम को हमारा नाम कैसे पता है! हम तो अभी तक तुम को अपना नाम नही बताया। तदोपरांत भोंडा, अर्धनग्न रोज़नलो के अत्यधिक सौंदर्य से परिपूर्ण, मख़मली बदन को उसी प्रकार से अपनी मजबूत भुजाओं में थामे हुए, कहता है कि आपका नाम तो आज हैरान गंज के हर बालक की जुबान पर है रोज़नलो। भोंडा के इतना कहते ही रोज़नलो भोंडा को अपनी रेशमी बाहों में जकड़ कर, एक बार पुनः उस रेशमी, मख़मली बिस्तर पर ले जाती है और एक बार पुनः दिन के उजाले में रोज़नलो और भोंडा का प्रेम आलिंगन अपने चरम पर पहुँच जाता है। तदोपरांत रोज़नलो उसी नग्न अवस्था मे किसी विषधारी नागिन के समान ही मासूम भोंडा से लिपटे हुए, कहती है कि हम तुम से विवाह सम्पन्न करेगा भोंडा। रोज़नलो के उस हसीन मुख से यह वचन सुनने के उपरांत भी भोंडा को विशवास नही होता कि यह सब कुछ, उसके साथ वास्तविकता में घटित हो रहा है। कुछ क्षण स्वयं को शांतचित रखने का एक असफल प्रयास करने के उपरांत, भोंडा एक गम्भीर स्वर द्वारा रोज़नलो से कहता है कि मैं तो अत्यधिक दरिद्र हु रोज़नलो। फिर तुम मुझ से विवाह कैसे कर सकती हो?

भोंडा को इस प्रकार से घबराता हुआ, देख कर, रोज़नलो अत्यंत ही प्रेम भरे स्वर से कहती है विचार लीजिए और उसके बाद ही आप अपना जबाब, हमको बताना भोंडा। आज शाम को हम, तुम्हें हैरान गंज के गुलाबी दरिया के घाट पर मिलने को आएगा। ध्यान रहे भोंडा! हम तुमारे इस नगर में कल तक ही रहेगा, इसके उपरांत हम को फतेह गंज के राज शाही दरबार में अपना नृत्य प्रस्तुत करके, अपने देश को चला जाएगा। तुम समझ रहा है ना भोंडा! हम तुम से क्या वचन कहता है। हम कल हमेशा के लिए चला जाएगा। इतना कहते हुए रोज़नलो अत्यधिक भावुक हो जाती है और उसकी उन शराबी निग़ाहों से अश्रु बहने लगते है। जिन्हें देख कर भोंडा भी भावुक होते हुए, कहता है कि रोज़नलो तुम रोओ मत। हम आज शाम को गुलाबी दरिया के घाट पर अवश्य मिलेंगे। परन्तु अभी के लिए तुम कृपया रोओ मत। देखो नही तो मैं भी रो दुंगा। भोंड़ा के इतना कहते ही रोज़नलो, अपने गुलाबी हसीन चेहरे से, किसी अनमोल मोती रत्न के समान, उन स्थिर अश्रुओं की बूंदों को पोंछ देती है और अत्यंत ही प्रेम भरे स्वर से कहती है कि भोंडा तुम हमको प्यार करता है। इतना कहते हुए रोज़नलो, भावुक हो चुके भोंडा के अधरों पर अपने ग़ुलाबी रसीले अधरों से एक अत्यंत ही भावनात्मक चुम्बन कर देती है। ना जाने कितने समय तक भोंडा और रोज़नलो उसी प्रकार अपने अधरों से अधरों को मिलाए, उस रेशमी बिस्तर पर नग्न बदन लिए हुए, एक अलौकिक दिव्य स्वरूप के साथ, एक दूसरे से लिपटे रहे। तदोपरांत भोंडा अपने वस्त्रो को ठीककरने के उपरांत, रोज़नलो से सांझ के समय गुलाबी दरिया के घाट पर, अपने उसी स्वरूप के साथ, भेंट करने का वचन देते हुए! जिस स्वरूप में उसका प्रथम बार रोज़नलो से आमना-सामना हुआ था। भोंडा द्वार से बाहर को परस्थान कर जाता है।

आज भोंडा अत्यधिक उत्साहित है क्यों कि जिस विदेशी स्वर्ग की अप्सरा के समान सुंदर सुंदरी को, एक दृष्टि भर निहारना भी, किसी को नसीब नही था। आज वह भोंडा पर इस प्रकार से महरबान हो कर, अपना ह्रदय हार चुकी है कि आज सांझ को, वह उससे विवाह की वार्तालाप करने हेतु, एकांत में गुलाबी दरिया के घाट पर, भेंट करने के लिए, आने वाली है। रोज़नलो से विदा लेकर भोंडा सीधे अपने झोपड़े पर पहुचता है और स्नानादि करने के उपरांत, रोज़नलो के साथ सांझ के उस प्रेम भरे मिलन के विषय में विचार करते हुए, अत्यधिक उत्साहित हो जाता है। खैर किसी प्रकार से बेचैन भोंडा का दिन व्यतीत हो जाता है और वह सांझ के समय एक राज शाही धनी के समान सज धज कर, अपनी पतली कमर में अपनी सुंदर काठ की बाँसुरी को लपेट लेता है। इसके बाद भोंडा अपने बाए हाथ मे, अपने मृत पिता हरिहर की बांगी लाठी और दाए हाथ मे अपने रत्न जड़ित सवर्ण कटोरे को, जिसे भोंडा ने पुनः अपने मृत पिता के दाह संस्कार के स्थान पर, उसी शमसजन की मिट्टी से लिप कर ढक दिया था! को थामे हुए अत्यधिक हसीन कमसिन काया रोज़नलो से भेंट करने के लिए, हैरान गंज की एकलौती उस मशहूर गुलाबी दरिया के घाट की ओर परस्थान कर जाता है।

उधर रोज़नलो भी सज धज कर, स्वर्ग की किसी अफसरा से भी अधिक सुंदर और कामुक प्रतीत हो रही है। रोज़नलो को इस प्रकार से श्रृंगार करते हुए, देख कर, उसकी सखिया उससे कहती है कि आज किस पर अपने इस क़ातिलाना हुस्न की बिजली गिराने के लिए, सज धज रही हो रोज़नलो! इसके प्रतिउत्तर में रोज़नलो सिर्फ इतना ही कहती है कि आज कोई अपना धड़कता सीना चिर कर, उसके कदमो में अपना धड़कता ह्रदय रखने वाला है। रोज़नलो के मुख से यह शब्द सुनते ही, उसकी सभी सखिया कुछ गम्भीर होते हुए, भय से काँपने लगती है। तदोपरांत अत्यंत ही सुंदर रोज़नलो, हैरान गंज के मशहूर ग़ुलाबी दरिया के घाट पर, अपने क़ातिलाना हुस्न के दीवाने, पागल प्रेमी भोंडा से एक अत्यंत ही दिलचस्प भेंट करने के लिए, एक राज शाही पालकी में बैठ कर, उस राज शाही महमखाने से परस्थान कर जाती है। दूसरी ओर ग़ुलाबी दरिया के घाट पर, भोंडा समय से पूर्व ही एक बेचैन अवस्था मे चहल कदमी करते हुए! बारम्बार ग़ुलाबी दरिया के घाट पर घाट के प्रवेश द्वार पर, अपनी बेचैन दृष्टि को टिकाए हुए है कि रोज़नलो अब आई और अब आई! बहुत देर तक रोज़नलो कि राह देखते के उपरांत भी जब रोज़नलो कहि दिखाई नही देती, तो भोंडा कुछ भावनात्मक रूप से टूटते हुए, गुलाबी दरिया के घाट पर, अपने घुटनों के बल पर बैठ जाता है कि तभी रोज़नलो हैरान गंज के उस मशहूर गुलाबी दरिया के घाट पर, मुख्य द्वार से सजी-धजी हुई, किसी स्वर्ग की अफसरा के समान ही अकस्मात से, भोंडा के समुख प्रकट हो जाती है। रोज़नलो को अकस्मात ही यू अपनी बेचैन दृष्टि के समुख देख कर, उदास भोंडा अत्यधिक उत्साहित हो कर, रोज़नलो का एक प्रेम भरी मुसकान के साथ स्वागत करता है और रोज़नलो भी आगे को बढ़ते हुए भोंडा को अपने नर्म, मुलायम सीने से लगते हुए, उसके व्याकुल ह्रदय को कुछ शांति का अनुभव प्रदान करवाती है। रोज़नलो एवं भोंडा बहुत समय तक, यू ही एक दूसरे को अपने प्रेमभरे आलिंगन में जकड़े हुए, हैरान गंज के उस मशहूर गुलाबी दरिया के घाट पर एक दूसरे से प्रेम जताते रहे।

तदोपरांत रोज़नलो एक प्रेम भरे स्वर से भोंडा को कहती है कि वह उसको बहुत अच्छा लगता है। खास तौर पर उसकी वह बांगी लाठी और वह मिट्टी से लीपा हुआ कटोरा। इतना कहते हुए रोज़नलो, अपने उस प्रेम भरे आलिंगन से, भोंडा को रिहा करते हुए, भोंडा के उस शमशाम की मिट्टी से लिपे हुए, रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे के समीप, अपने इठलाती हुई चाल चलते हुए, पहुच जाती है। एवं बिना एक क्षण भी गवाए, वह उस स्वर्ण कटोरे को उठाते हुए, कहती है ओह! भोंडा तुम भी कितना ना समझ है। देखो तो तुम्हारा यह सुंदर कटोरा, कितना मेला दिखता है, क्या तुम इसे कभी साफ नही करता है! इतना कहते हुए, रोज़नलो अपना रेशनी दुपट्टा, उस रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे पर, आहिस्ता से फेरते हुए, उसे साफ करने लगती है। यह देख कर भोंडा कुछ घबरा जाता है और वह लगभग चीखते हुए, रोज़नलो की ओर बढ़ता है कि नही, नही, रोज़नलो, ऐसा मत करो! परन्तु अब काफ़ी विलम्भ हो चुका था क्यों कि रोज़नलो के उस रेशमी दुपट्टे से, उस रत्न जड़ित सवर्ण कटोरे पर लिपि गई श्मशान की मिट्टी, अब पूर्णतः साफ हो कर दूर हो चुकी है। जिससे अब उस रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे का वह दिव्य स्वरूप, उस चांदनी रात में एक सूर्य की भांति, खिल कर सामने आ गया है।

जिसकी उस दिव्य आभा को, भोंडा अब रोज़नलो की उन मदहोश कर देने वाली, नशीली निग़ाहों में स्पष्ट रूप से देख सकता था। भोंडा की मनोस्थिति को रोज़नलो, तुरन्त ही भांप जाती है और वह उससे अंजान बनते हुए, कहती है कि भोंडा यह कटोरा तो अत्यंत ही अद्भुत और दिव्य लगता है। तुम इस के विषय में हम से छुपाया क्यों? रोज़नलो के उस हसीन गुलाबी अधरों से यह सुनते ही, भोंडा स्वयं को कुछ लज्जित सा महसूस करते हुए, अपने उन श्याम नयनो को रोज़नलो की नशीली शराबी निग़ाहों के समीप लाते हुए, अत्यंत ही प्रेम से कहता है कि ऐसी तो कोई भी बात नही है रोज़नलो। तुम्हें इस विषय में शीघ्र ही मैं सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करने ही वाला था। परन्तु प्रभु की कृप्या देखो, मेरे बताने से पूर्व ही तूमको, इसके विषय में स्वतः ही जानकारी प्राप्त हो गई। यह सुनते ही रोज़नलो, भोंडा को पुनः अपने प्रेम भरे आलिंगन में जकड़ते हुए, कहती है कि ओह! भोंडा तुम हम को कितना प्यार करता है। अब हम तुमारे बिना एक क्षण भी जीवित नही बचने पाएगा। हम अभी तुम्हारे साथ विवाह को सम्पन करेगा भोंडा। यह सुनते ही भोंडा कुछ अत्यधिक उतेजना से कंपकपाने लगता है और वह कुछ कह पाता इससे पूर्व ही भोंडा के उन कंपकपाते हुए, सूखे अधरों पर रोज़नलो अपने गुलाब की पँखडियो के समान रसीले, कंपकपाते हुए अधरों को रख देती है। रोज़नलो और भोंडा न जाने कितने समय तक, उस चांदनी रात्रि में उसी प्रकार से, हैरान गंज के उस मशहूर ग़ुलाबी दरिया के घाट पर, एक दूसरे को अपने प्रेम भरे आलिंगन में जकड़े हुए, अपने अधरों से एक दूसरे के अधरों को मिलाए, प्रेम से चूमते रहे।

तदोपरांत रोज़नलो, भोंडा के उन श्याम नयनो में, अपनी नशीले निग़ाहों से देखते हुए, अत्यंत ही गम्भीरता से कुछ कहती है कि भोंडा! तुम को यह इतना सुंदर कटोरा, कहा से प्राप्त हुआ है? क्या तुम हमको बताएगा! तब भोंडा अत्यधिक भावुकता से रोज़नलो के हसीन मख़मली सुनहरे बदन को, अपनी मजबूत भुजाओं में, उसी प्रकार से थामे हुए, रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे का सम्पूर्ण किस्सा, रोज़नलो के समक्ष जाहिर कर देता है। भोंडा से उस रत्न जड़ित सवर्ण कटोरे की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के उपरांत, रोज़नलो अत्यधिक सहानुभूति और अपनापन दिखाते हुए, भोंडा से कहती है कि भोंडा हमारी आँखों में देखो और हमारी बात को बहुत ही ध्यान से सुनना, हम को तुम्हारा बहुत ही चिंता होती है। रोज़नलो कि उन हसीन गुलाबी लबों से, अपने लिए सहानुभूति और अपनेपन के स्वरों को सुन कर, भोंडा अत्यंत ही भावुक हो जाता है और वह भी कुछ भावुकता भरे स्वर से कहता है कि कहो रोज़नलो क्या बात है! तुम निसंकोच अपने ह्रदय के एहसासो को मुझ से कह सकती हो। तुम्हे किस बात की चिंता सताए जा रही है! कह दो रोज़नलो। भोंडा के इस प्रकार से प्रेमपूर्वक आग्रह करने पर, रोज़नलो कुछ गम्भीर स्वरों के साथ, पुनः कुछ कहती है कि भोंडा हम तुम से बहुत प्यार करता है। कुछ क्षण मौन रहने के उपरांत वह पुनः भोंडा से कहती है कि जब से हम तुमारे देश हैरान गंज में आया है! तुम्हारा जैसा सुंदर, संस्कारी और ह्रष्टपुष्ट नवयुवक, हमने अभी तक नही देखा है। ईष्वर साक्षी है कि अब हम दोनों प्रेम आलिंगन द्वारा शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक रूप से एक हो चुके है भोंडा। इसीलिए हम तुम को कहता है कि हम को तुम्हारा बहुत चिंता होता है। यदि कोई इस मूल्यवान स्वर्ण के कटोरे को, तुम्हारे पास से चुरा लिया या तुम्हारे उज्वल व्यक्तिव पर, इस मूल्यवान सवर्ण के कटोरा को चोरी करने का इल्जाम लगा कर, तुम को कैद करवा दिया। तो हमारा क्या होगा भोंडा! हम सत्य कहता है भोंडा, हम मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। नही, नही, हम ऐसा नही होने देगा भोंडा। तुम अभी इस स्वर्ण के कटोरा को हमे दे दो और हम इसको अपना मजबूत तिजोरी में सुरक्षित रख देगा। तुम समझ रहा है ना भोंडा! हम तुम से क्या कह रहा है। हम तुम से कल इसी समय यही मिलने के लिए आएगा और उसी समय हम तुम्हारे साथ, विवाह भी सम्पन करेगा भोंडा। इतना कह कर रोज़नलो भोंडा के सूखे अधरों पर अपने गुलाबी मुलायम अधरों को रख कर, एक प्रेम भरा चुम्बन कर देती है। भोंडा भी आगे को बढ़ते हुए, रोज़नलो के हसीन नक्कासीदार गठीले बदन को, अपनी मजबूत भुजाओं में जकड़ लेता है और अत्यधिक भावुकता से उस रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे को, सहज ही रोज़नलो के सपुर्द्ध कर देता है।

इस प्रकार से रोज़नलो के प्रेम भरा आलिंगन, मनमोहक क़ातिल अदाओं और अपनेपन से परिपूर्ण स्वरों को सुनकर, भोंडा को उस पर पूर्णतः विशवास हो जाता है कि कल वह उससे मिलने के लिए, अवश्य ही आएगी और जैसा कि उसने कहा है कि वह कल ही उसके साथ, विवाह भी सम्पन करेगी। रोज़नलो का अपने प्रति अपनेपन की भवनाओं से प्रभाविक होकर, भोंडा उसके सुरक्षित हाथों में, अपना रत्न जड़ित सवर्ण कटोरे को सपुर्द्ध कर, अपने झोंपड़े पर लौट आता है। आज की रात्रि भोंडा को अत्यधिक रोमांच से भरी हुई ज्ञात हो रही है और वह निरन्तर अपने झोपड़े से बाहर निकल कर, उस निर्मल चाँदनी रात में, उस पुर्णिमा के पूर्ण चाँद को देख कर, एक प्रेमी कवि के समान ही, अपनी प्रेमिका की आकृति को, उसमे बनाए और मिटाए जा रहा है। इस प्रकार से भोंडा सम्पूर्ण रात्रि, खुले आसमां में अपनी प्रेमिका रोज़नलो को याद करते हुए, पूर्णिमा के पूर्ण चाँद के साथ, अटखेलियां करता रहा। भोंडा की ऐसी दीवानगी से भरी मनोस्थिति देख कर, आपके अपने कवि एवं लेखक मित्र विक्रांत राजलीवाल जी ने क्या खूब लिखा है कि “चाँद रात में चाँद देखने जो गए, चाँद की कसम चांदनी की कसम, चाँद तो दिखा नही, चांदनी में ही हम जो कसका गए।” फिर ना जाने कब भोंडा को निंद्रा आ जाती है! उसको इस का एहसास भी ना हो पाया।

प्रत्येक दिन तड़के तलक, प्रातः कालीन सूर्य के उगने से पूर्व ही, जो भोंडा अपनी निंद्रा त्याग कर, खटिया से उठ कर बैठ जाता था। आज वह दोपहर तक, रोज़नलो के प्रेम भरे स्वप्न देखते हुए, गहरी निंद्रा की गिरफ्त में सोता रहा। फिर अचानक से उसकी निंद्रा टूटती है और वह हड़बड़ाहट से रोज़नलो का नाम पुकारते हुए, उठ बेठता है। उधर सम्पूर्ण हैरान गंज में राज शाही जलसे की चकाचौंध कर देनी वाली रौनक और चहल पहल, आज अपने चरम सीमा तक पहुच गई थी। ऐसा हो भी क्यों ना! आज राज शाही जलसे का अंतिम दिवस जो था। ईधर अपने झोंपड़े में अर्धचेतन भोंडा, अभी कुछ समझ पाता इससे पूर्व ही उसका एकमात्र मित्र बिरजू पनवाड़ी जिसे भोंडा कभी कभी भावुक होते हुए काका कह कर भी सम्बोधित कर देता था, भोंडा की झोपड़ी के बाहर पहुँचकर उसको आवाज़ लगाते हुए, उसको पुकारता है कि भोंडा, अरे कहा हो भाई! आज दिखे ही नही। कुछ क्षण रुकने के उपरांत वह पुनः आवाज़ लगते हुए कि भोंडा! कहा हो भाई भोंडा। इस प्रकार से अकस्मात ही अपने एकलौते मित्र बिरजू पनवाड़ी की आवाज़ सुन कर, भोंडा को कुछ आशचर्य होता है और वह अपने झोपड़े के भीतर से ही, बिरजू को प्रतिउत्तर देते हुए कहता है कि हा भाई बिरजू! मैं भीतर ही हु आ जाओ। इतना सुनते ही बिरजू पनवाड़ी, भोंडा के झोपड़े के भीतर, प्रवेश कर जाता है और झोंपड़े के भीतर प्रवेश करते हुए, वह कुछ नाराजगी के स्वरों के साथ, कहता है कि भोंडा भाई, आज तुम दिखे ही नही। क्या अभी तक निंद्रा में ही मगन थे! देखो बाहर सांझ होने को आई है और तुम राज शाही जलसे के अंतिम दिन इस प्रकार से कैसे निंद्रा में चूर हो सकते हो? चलो आज भव्य जलसे में हम दोनों एक साथ बहुत धूम मचाएंगे। बिरजू के मुख से यह सुनते ही, भोंडा दौड़ कर अपने झोपड़े से बाहर निकल कर, ऊपर आसमान की ओर देखता है। जहा सूर्य में अभी भी कुछ चमक शेष थी। जिससे भोंडा को एहसास होता है कि सत्य ही आज वह अत्यधिक समय तक, निंद्रा में चूर होकर सोता रहा है। अकस्मात ही उसको, रोज़नलो से अपनी, आज सांझ को होने वाली भेंट का एहसास हो आता है और वह हड़बड़ाहट पूर्वक बिरजू से कहता है कि बिरजू भाई, तुम जाओ और राज शाही के भव्य शाही जलसे के अंतिम दिन का, भरपुर आनन्द प्राप्त करो। मुझ को आज अत्यंत ही आवश्यक कार्य से, कही ओर किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति से, भेंट करने को जाना है।

इस प्रकार से बिरजू को अलविदा करने के उपरांत नवयुक भोंडा शीघ्र ही स्नानादि कर के एक नई चमकदार पोषक को पहन कर अपने एक हाथ में अपने मृत पिता हरिहर की बांगी लाठी को थामे हुए जैसे ही अपने रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे को उठाने के लिए झुकता है तो भोंडा उसको वहा से नदारत पाता है फिर अकस्मात ही उसको स्मरण होता है कि वह रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरा तो रोज़नलो ने अपने पास सुरक्षित रखने हेतु कल उससे ले लिया था। तभी भोंडा बिना एक क्षण भी व्यर्थ किए, अपने पैरों में एक जुड़ी नवीन जूतियां पहन कर, रोज़नलो से भेंट करने हेतु, अपने झोपड़े से बाहर की ओर परस्थान कर, हैरान गंज के शाही जलसे की भव्य रौनक से चकाचोंध सड़को से होते हुए, हैरान गंज के मशहूर गुलाबी दरिया की ओर चल पड़ता है। कुछ ही क्षणों के उपरांत भोंडा अपने एक हाथ में हैरान गंज का मशहूर शाही ग़ुलाब जिसको उसने भव्य जलसे से गुजरने के दौरान एक पुष्पों की दुकान से नकद हैरान गंजी 3 टके के मोल पर खरीदा था को थामे हुए गुलाबी दरिया के घाट पर आहिस्ता आहिस्ता से टहलते हुए, रोज़नलो का इंतजार कर रहा है। हर गुजरते लम्हे से भोंडा के दिल की धडकती धड़कने तेज़ और तेज़, बहुत तेज़ धड़कने लगती है। इस प्रकार से भोंडा लगभग समुपर्ण रात्रि घाट पर अपनी प्रेमिका रोज़नलो का इंतज़ार करता रहा और अब आसमां में केवल सुबह का तारा टिमटिमाते हुए शेष रह गया है और भोंडा अब भी रोज़नलो का इंतज़ार कर रहा है। परन्तु सब व्यर्थ है क्योंकि रोज़नलो नही आती और अचानक ही भोंडा की वह बेचैनी एक अज़ीब से दीवानेपन में परिवर्तित हो जाती है और वह ना चाहते हुए भी स्वयं को विशवास नही दिला पा रहा है कि रोज़नलो नही आई। फिर अचानक ही भोंडा एक ज़ोरदार चीख के साथ रोज़नलो का नाम पुकारता है कि “रोज़नलो” और अत्यंत ही दुखद अवस्था मे अपने घुटने के बल बैठ कर रोने लगता है। भोंडा के इस प्रकार से विलाप करते हुए उसके हाथों में उस शाही गुलाब के टुकड़े, टुकड़े हो कर, उसकी सुर्ख ग़ुलाबी पंखुड़ियां हैरान गंज की उस मशहूर ग़ुलाबी दरिया के घाट पर बिखर जाते है।

उसी समय भोंडा का एकलौता मित्र बिरजू पनवाड़ी वहाँ उपस्थित हो जाता है और वह भोंडा को किसी प्रकार से संभालने का प्रयत्न करता है। परन्तु भोंडा अब भी रोते हुए केवल रोज़नलो का नाम दोहराए जा रहा था कि “रोज़नलो, रोज़नलो तुम कहाँ हो तुम रोज़नलो।” तब बिरजू उसको बताता है कि वह विदेशी कलाकार तो कब के हैरान गंज से परस्थान कर चुके है यदि मुझ को पहले पता होता कि तुम आज यहाँ दरिया के घाट पर उस विदेशी हसीना रोज़नलो से भेंट करने की बात कह रहे हो, तो यकीन मानो मैं तुम्हे उसी समय सूचित कर देता कि वह तो कब की अपने डेरे के साथ, हैरान गंज से परस्थान कर चुकी है। बिरजू के मुँह से ऐसे कठोर वचन सुन कर भोंडा का ह्रदय उसकी धडकती हर ध्वनियों से चिर सा जाता है और वह अत्यधिक क्रोधिक होते हुए बिरजू का गला पकड़ लेता है। उसी क्रोध की अवस्था मे वह बिरजू से कहता है कि बिरजू ईष्वर के लिए ख़ामोश हो जाओ, अन्यथा आज मैं तुम्हे जान से मार दूंगा। तुम्हारी इतनी हिम्मत की तुम मेरी रोज़नलो के लिए ऐसी बेवफ़ाई से भरी घिनोनी बात कहो और इसी क्रोध में भोंडा बिरजू को एक चमाट जड़ देता है। परन्तु बिरजू जो कि भोंडा का एक मात्र घनिष्ट मित्र होने के नाते अब भी अत्यंत शांत नज़र आ रहा था। अब वह भी भावुक होते हुए एक अत्यंत ही भावुक स्वर के साथ भोंडा से पुनः अपनी बात को दोहराता है कि भोंडा शांत हो जाओ भाई। मैं तुम से असत्य क्यों कहूँगा। मेरा विशवास करो भोंडा मैं सत्य कह रहा हु। बिरजू के इस प्रकार के वचन सुन कर भोंडा अब कुछ और अधिक भावुक अवस्था को प्राप्त हो जाता है और बिरजू को एक ओर को धकेल कर दीवानों की भाँति “रोज़नलो, रोज़नलो” पुकारता हुआ राज शाही के शाही बाड़े यानी कि मेहमानखाने की ओर दौड़ने लगता है। इस समय सम्पूर्ण हैरान गंज में राज शाही जलसे के समयावधि समाप्त हो चुकी थी। इसीलिए हर और भोंडा को केवल बुझे हुए चिराग़ और राख से ढके हुए सुलगते अंगार ही दिख रहे थे और वह उसी विकृत मनोस्थिति के साथ दीवानों के भांति दौड़ता जा रहा है। तेज़, और तेज़ बहुत तेज़! बस दौड़ता ही जा रहा है। कुछ ही क्षणों के उपरांत भोंडा अब राज शाही के शाही बाड़े के उस भव्य द्वार (मेहमानखाने के प्रवेश द्वार) तक पहुच जाता है।

जहा उसको राज शाही के शाही मेहमानखाने के प्रवेश द्वार पर तैनात एक शाही दरबान रोक देता है और भोंडा को एक लताड़ लगाते हुए कहता है कि अरे ठहरो! इस प्रकार से दौड़ते हुए किधर जा रहा है। तब भोंडा उस शाही दरबान से कहता है कि “रोज़नलो मुझ को रोज़नलो से भेंट करनी है कृपया तुम रोज़नलो को बता दु की तुम्हारा भोंडा आया है। रोज़नलो तुम कहाँ हु।” भोंडा को इस प्रकार से रोते और बिलखते हुए देख कर वह शाही दरबान भोंडा से कहता है कि कौन रोज़नलो! कहि तुम उन शाही दरबार की बेहद हसीन नृत्यांगनाओ के विषय में तो बात नही कर रहे हो। उस राज शाही के शाही मेहमानखाने के द्वार पर तैनात उस शाही दरबान के मुख से यह सुनते ही भोंडा कुछ उत्साहित होते हुए कहता है कि हा, हा भाई मैं उनके ही विषय में बात कर रहा हु। कहा है मेरी रोज़नलो! तुम मेरी रोज़नलो को बुलाओ ना, वह कहा है कुछ तो बताओ? भोंडा की दीवानों के भांति ऐसी विकृत मनोस्थिति देख कर, उस शाही दरबान को कुछ दुःख होता है और वह भोंडा के उन झुकें हुए कंधों पर अपना सहानुभूति से भरा हाथ रख कर उससे कुछ कहता है कि भाई तुम तो अभी नवयुवक हो फिर तुम कैसे उन क़ाफ़िर हसीनाओं के मकड़जाल में फंस गए। उन्हें यहाँ से परस्थान किए हुए अब पूरे आठ पहर गुज़रने को है। (लगभग एक सम्पूर्ण दिन) और तुम अब भी उन्हें किसी दिवाने की भांति पुकार रहे हो। जाओ भाई अपने घर को जाओ, भला ये क़ाफ़िर हसीनाएं किसी की हुई है! उस राज शाही दरबान के मुख से यह सब हालात जानकर भोंडा को अब विशवास होने लगता है कि रोज़नलो अब हैरान गंज से ही नही, अपितु उसके जीवन से भी परस्थान कर चुकी है।

रोज़नलो की हक़ीक़त को जान कर भोंडा अत्यधिक दुखी होते हुए टूट सा जाता है और अचानक ही वह अपने बहते हुए अश्रुओं को पोछते हुए, उस अज़ीब सी विकृत मनोस्थिति के साथ ही अपने झोपड़े पर लौट आता है। उसी समय प्रातः कालीन सूर्य उगते हुए अपनी सुनहरी आभा को हर दिशा में बिखेरना प्रारम्भ कर देता है और भोंडा समीप

के घड़े से एक हांडी जल निकालने के लिए उसमे हांडी को जैसे ही घूमता है तो उसको ज्ञात होता है कि घड़ा आज बिल्कुल रिक्त है। तब भोंडा अपने मृत पिता की उस बांगी लाठी को उठा कर, उस अजीबोगरीब विकृत सी मनोस्थिति के साथ ही अपने झोपड़े से बाहर की ओर प्रस्थान कर जाता है।

कुछ क्षणों के उपरांत भोंडा समीप के उसी शमशाम के मैदान में ठीक उसी स्थान पर एक अजीबोग़रीब विकृत सी मनोस्थिति के साथ खड़ा हुआ है! जहा उसके मृत पिता हरिहर का अंतिम संस्कार सम्पन्न हुआ था। अचानक ही भोंडा ज़ोर ज़ोर से चीखते हुए अपने मृत पिता के अंतिम संस्कार वाले स्थान पर, उनकी उस बांगी लाठी से खुदाई करना प्रारंभ कर देता है और वह अब भी उसी प्रकार से एक अजीबोगरीब विकृत मनोस्थिति के साथ रोता हुआ चीखता जा रहा है। कुछ ही क्षणों की खुदाई के उपरांत वह अपने हाथों को रोक देता है। इसके साथ ही उसका चीखना भी बंद हो जाता है। भोंडा अब अपने दोनों हाथों से उस खुदाई वाले स्थान पर कुछ टटोलने लगता है और अचानक ही उसके हाथ किसी वस्तु से टकरा कर रुक जाते है। और वह बहुत ही आहिस्ता से उस वस्तु को अपने दोनों हाथो से उठाते हुए अपने चेहरे के समीप ला कर देखता है। फिर अचानक ही एक अत्यंत जोरदार चीख उसके मुंह से निकलती है कि “बाबा” तुम कहा हु बाबा! ये दुनिया अच्छी नही है बाबा। इतना कहते हुए भोंडा पुनः जोर जोर से रोते हुए, चीखने लगता है। और उसके मुंह से निरन्तर यही स्वर निकल रहे थे कि “बाबा” वापस आ जाओ बाबा। ये दुनिया अच्छी नही है। ये दुनिया अच्छी नही है हा बाबा! ये दुनियां अच्छी नही…हैं।

आज भोंडा हक़ीक़त में भावनात्मक रूप से टूट कर अंदर ही अंदर, खंड, खंड होते हुए बिखर चुका था। और इसके साथ ही इस निष्ठुर संसार के एक और कटु सत्य से उसका अत्यंत ही समीप से एक परिचय हुआ था। जिसे अक्सर हम “बेवाफ़ाई” कहते है।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

प्रथम प्रकाशन की तारीख 2 आकटुबर, वर्ष 2019 एवं समय 10:20 pm (सांझा कीजिए)

Republished with recorded YouTube video link

Date 14 july 2020 time 9:50 pm

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🌹 Book A Nazam Dastan’s And Poetry program By Vikrant Rajliwal.

October 15, 2019

Name: Vikrant Rajliwal Published book: एहसास (a highly sensitive poetic book inspired by social and humanitarian values) published by Sanyog publication house shahdara. Which was also showcased at the Delhi World Book Fair in the same year 2016. The contact form is displayed below. My Whatsapp no: 91 + 9354948135

“भोंडा। (एक कहानी जो दिल को छू जाए)”

Pingback: भोंडा। (एक दिलचस्प उपन्यास) With YouTube Video link. *विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एवं प्रसारित* – Vikrant Rajliwal Writing

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🌹 बेगुनाह मोहब्ब्त। (दर्द ए मोहब्ब्त की एक दिलकश दास्ताँ) Republished with Facebook Live Video!

वक़्त की चादर पर जो अब एक गुनाह हो गया।

समझा सनम को जो बेवफ़ा तो एक गुनाह हो गया।।

दिल को उस के मासूम को एक इल्ज़ाम जो हमनें दे दिया।

खुद ही मार कर दिल पर फिर ख़ंजर ख़ूनी जो दिल रो दिया।।

जिस्म से बूढ़ा अब अपने जो हो गया हूं।

झुर्रियों में अपनी अब कहि जो खो गया हूं।।

जान ना बच पाई अब कोई जो मुझ में।

तबियत भी कुछ बदहवास सी है अब जो मुझ में।।

छूटने को है बस अब जो मेरी जान।

पल भर का ही हु शायद अब जो मैं मेहमान।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

चेहरे की झुर्रियों से मेरी दिलबर की वफ़ा झलकती है।

नोच डालो तुम इन्हें, इनसे बेवफ़ाई मेरी अब झलकती है।।

गुजरते है दिन मेरे मौत के सन्नाटे में।

डर जाता है दिल मेरा इन सुनी अंधेरी रातो में।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

सिहर (काप) जाता हूं देख कर महबूब ए मोहब्ब्त का वो आईना।

दिखती नही उस में वफ़ा, बतलाता है मुझ को वो आईना।।

टूटी खटिया पे तन्हा पड़ा, अब किसे मैं ढूंढ रहा।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

तन्हा अंधेरी इन रातो में टूट कर बिजली सी मुझ पर कोई चोंध जब जाति है।

बन के साया एक मौत का कोई, अक्स अपना मुझे जब दिखा जाती है।।

कड़क के टूटी खटिया ये मेरी जैसे कर्राह जाती है और भी टूट जो जाती है।

लेते हुए नाम ए सनम एक याद आह दिल से निकल जाती है उसको शायद जो बुलाती है।।

याद सनम को करते हुए धड़कने जो जख़्मी दिल की रुक जाती है उसको शायद जो बुलाती है।।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।।

टूटी खटिया ये वीरान कोठरी तन्हा पड़ा है कब से दीवाना सनम का जो यहाँ।

कर गई बेवफ़ाई मौत भी जो ढूंढ ना पाई मुझे वहा, कब से दीवाना तन्हा पड़ा सनम का जो यहाँ।।

वफ़ा ए महबूब जो वफ़ा सनम की एक इल्ज़ाम उस पर कोई बेहूदा दीवाना हो गया।

दुपट्टे पे रेशमी जो मख़मली उसका, दाग दीवाना बेहूदा सा उस पर हो गया।।

समझा जो बेवफ़ा सनम को अपने, ए वक़्त तो ये दीवाना खुद ही बेवफ़ा हो गया।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

वो तो हर पल घुटती रही।

तन्हा जीती और मरती रही।।

हाल ये उसका जो जान ना पाया।

बेबसी ये उसकी जो अपना उसे मान ना पाया।।

सितम जो रूह पर मासूम, वार बेदर्दी से कर दिया।

खुद ही दिल हाथो से अपना, जो चिर कर रख दिया।।

दे कर वफ़ा को इल्ज़ाम बेवफ़ाई का उसकी, गुन्हेगार ये दीवाना जो उसका अब हो गया।

देख कर ये हाल अपना तड़प कर रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

जान हक़ीक़त ए सनम दीवाना जो उसे जान गया।

मासूम धड़कने वो मासूम दिल दीवाना जो उसे पहचान गया।।

ना कोई चाल ना ही कोई इल्ज़ाम उस पर अब रहा ना बाकी।

टूट गए आईने सब फ़रेबी कोई इलज़ाम कोई फ़रेब अब रहा ना बाकी।।

मज़बूरियों ने इस ज़माने की जो बेदर्द, एक दिवाने को सनम से जुदा जो कर दिया।

सितम ए दिल दिल को दिवाने के सरेराह, बेबसी ने उसकी चकनाचूर जो कर दिया।।

ढूंढता है दीवाना अब भी उसे वक़्त की किताब में।

महफूज़ है यादें अब भी उसकी जो वक़्त की किताब में।।

हो कर जुदा दीवाना अपने सनम से मिल ना पाया फिर उसे।

ढूंढता है निसान ए क़दम सनम के हर तरफ पुकारता है अब भी उसे।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

दिन वो अब भी जवानी के अपने याद आते है।

महबूब की अपने हर सौगात साथ अपने लाते है।।

धड़कनों में एक आख़री मेरे अब भी एक तम्मना है।

हर धड़कन टूटने से पहले अपनी आखरी एक दीदार सनम का अब भी चाहते है।।

याद है वो मदहोश निगाहें उनका वो क़ातिल हुस्न, जवानी के अब भी वो दिन।

बन के मोहब्ब्त फड़कती रगों में दौड़ता लहू, सनम से अपने दीवानगी के वो दिन।।

वो वक़्त वो समा वो मिज़ाज ए मौसम बेहद अज़ीब था।

वो आलम मदहोशी का हर तरफ वो गुल वो गुलिस्तां वो महकता ग़ुलाब ए मोहब्ब्त बेहद अज़ीब था।।

करता था मोहब्ब्त एक हुस्न से जो एक दीवाना, वो दस्तूर ए मोहब्ब्त वो ज़ालिम ज़माना बेहद अज़ीब था।।।

एक इंतज़ार था हर लम्हा एक हसीन का, कर दे मदहोश जो दिवाने को।

कर दे जख़्मी दिल चिर के क़ातिल निग़ाहों से अपने जो निहार कर दिवाने को।।

अंगड़ाई लेता महकता वो सनम अब भी है याद दिवाने को।

बदलती निगाहें वो लहू बरसाता आसमां अब भी है याद दिवाने को।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

याद है वक़्त वो जब…

एक रोज़ इत्तफाक एक अज़ीब सा हो गया।

टकरा गए जो एक हुस्न से तो वार धड़कते दिल पर हो गया।।

नही नादां ये इश्क़ ये दीवाना तंग एक गली से एक रोज़ जो गुजर गया।

सामना वो मदहोश हुस्न से वार शराबी निग़ाहों का दिल पर अपने जो हो गया।।

नही मिलता है फिर चैन की लूट गया ये दीवाना, एक हसीना से सरेराह टकरा जाने के बाद।

नज़र आता है फिर हर तरफ चेहरा वो उनका हसीन, क़ातिल से सरेराह अपने टकरा जाने के बाद।।

कहते है अनहोनी ज़माने में जिसे एक दिवाने से अब वो हो गई।

आता है नज़र हर तरफ चेहरा वो उसका, यकीं है मोहब्ब्त दिल ए दिवाने को अब एक हसीना से जो हो गई।।

ढूंढता है दीवाना वही हसीं समा, वो मदहोश निगाहें, वो हुस्न ए यार दुबारा।

यकीं है दीवाना पा जाएगा एक रोज़ उसे, धड़केगा ये दिल ए दीवाना दुबारा।।

हटा दिया रुख से अपने नक़ाब जो उन्होंने सरेराह भरे बाजार ।

कर दिया जख़्मी ये दिल ए दीवाना जो उन्होंने रुख से अपने हटा कर नक़ाब सरेराह भरे बाजार।।

खिल उठा जो चेहरा वो हसीन उनका, एक दूजे को करीब से देखने के बाद।

किया नज़ारा बेहिंतिया मोहब्ब्त का उन्होंने, भर के नज़रो में मोहब्ब्त एक दूजे को देखने के बाद।।

भर कर मदहोश निग़ाहों में बेहिंतिया मोहब्ब्त दिवाने को उन्होंने क्यों देख लिया।

कर दिया वार धड़कनों पर मेरे, जख्म दिल पर देकर सरेराह जो उन्होंने मुझे लूट लिया।।

दिल की किताब के पन्नों पे हुस्न का गुलाबी नाम लिख दिया।

हुई जो नज़रे चार सरेराह उनसे, धड़कते दिल को थामे दिवाने ने उनसे उनका नाम पूछ लिया।।

उस दिलबर का जो अब बुरा हाल हो गया।

उसका भी जीना जो अब दुशवार हो गया।।

आए वो करीब हमारे तो उनको भी हम से प्यार हो गया।

देखा जो नज़रो में नज़रो के एक दूजे के इज़हार ए प्यार हो गया।।

नही मिलता है आराम धड़कनो को मेरी अब क्यों?।

नही रहता है सकूँ सांसो में मेरी अब क्यों?।।

ख़्याल ए सनम हर लम्हा सताता है मुझे अब क्यों?।

बेचैन ए दीवाना हर लम्हा रहता है तन्हा रातों में अब क्यों?।।

मोहब्ब्त जब खुद मुझ पर महरबान हो गई।

वीरान दुनिया ये मेरी अब गुलज़ार हो गई।।

रहता है ख्याल ए सनम इस दिल मे जो मेरे, ना जाने क्यों एक हसीना वो मुझ पर महरबान हो गई।।।

खिलते है गुल बागों में अक्सर, हुस्न से इश्क की वहा जब मुलाक़ात होती है।

देखते है मदहोशी से निग़ाहों में मदहोश उनकी जब, बिन बोले ही अक्सर वहा फिर बात होती है।।

सादगी से अपनी हुस्न वो अंजान सा लगता है।

नज़दिक से कर दीदार ए जलवा ए हुस्न हाल बेहाल सा दिवाने का लगता है।।

सितमगर से एक अक्सर नज़रे चार होती है।

जख़्मी ये दिल वार धड़कनो पर जब मुलाक़ात उनसे होती है।।

तन्हा थे जो लम्हे कभी ज़िन्दगी ये दिवाने की हसीं वादिया महक महकती मोहब्ब्त के बन गई।

बेनाम थी जो धड़कने कभी ज़िन्दगी ये दिवाने की एक नाम वो नाम ए सनम नाम जो उनके हो गईं।।

धड़कता है दिल देख कर दिवाने का चेहरे की हसीं जो उनके वो सुर्ख लाली एक।

डरता है दिल ए दीवाना नादां सोच कर कमसिन उसे जो हसीना वो मतवाली एक।।

ज़िंदगी ये हमारी खुशनुमा और भी हो जाती है।

हसीं चेहरे की सुर्ख लाली देख हमारी धड़कने जब बढ़ जाती है।।

दे कर दिवाने को क़ातिल जब मुस्कुराहट एक झलक देख लेती है वो।

धड़कते दिल की धड़कती हर धड़कनो को हमारी धड़का और भी देती है वो।।

भर के मदहोश निगाहों में अपनी बेहिंतिया मोहब्ब्त वो।

दे कर ज़ख्म दिल और जख़्मी दिल ए दीवाना कर देती है वो।।

राह ए मोहब्ब्त सुने थे दिवाने ने किस्से जो कई हज़ार।

हो गए फ़ना जो जल कर परवाने हुस्न पर उनकी उन मज़ारों पर हर बार।।

ऐसा क्यों लगता है मोहब्ब्त ये दिवाने को भी जला देगी।

बेवफ़ाई जो करि उन्होंने तो मुझ को भी रुला देगी।।

मलिका ए हुस्न है सनम वो मेरा, ये जानता है दीवाना।

कतार है दीवानों की उसके आस पास, ये मानता है दीवाना।।

महरबान है हुस्न वो हसीना सिर्फ इश्क़ ए दीवाना पर, इस बात से नही है इश्क़ ये अनजान।

दे देगा मोहब्ब्त में हुस्न की इश्क़ ये अपना उनके लिए अपनी ये जान।।

लगने लगी है सितमगर वो अपनी, उसकी दुनिया रंगीन है।

मरता है सारा जहां उस पर, हर अदा से अपने वो कमसिन है।।

बिखेर देती है मदहोश निग़ाहों से देख कर, जब वो क़ातिल अपनी जो मुस्कान।

खिल जाते है गुल जमीं पर बंजर, हो जाता है हुस्न से उसके फिर वो गुलिस्तां।।

हुस्न है धड़कने हर किसी की और उनकी जवानी है जान।

उनके ही मदमस्त हुस्न से है वीरानों यहां धड़कती जो जान।।

धड़कता है दिल सीने में जो सनम के, हर धड़कन है उसकी दिवाने की जो जान।।।

दिलाते है यकीं रख के दिल पर हर बार दिवाने के हाथ वो।

मर तो सकती है जल कर मग़र बेवफ़ाई जो ख़ंजर दिल पर दिवाने के मार नही सकती है वो।।

बदल गया मौसम बदल गई फ़िज़ाए जो मोहब्ब्त की एक रोज़।

टूटी है कड़क कर दिल पर जो बिजली दिवाने के एक रोज़।।

बदला जो रुख बहती हवाओ ने एक रोज़, जरूर कुछ बात है।

हुआ हादसा जो कहि पर एक रोज़, जरूर ये दिल यू ही नही परेशान है।।

बदला है रुख हवा का एक रोज़ जो कहि, एहसास उसका यहा हो रहा।

टूटी है डोर ए मोहब्ब्त एक रोज़ जो कहि, दर्द ए दिल उसके खिंचाव से उसका दीवाना रो रहा।।

बिजली एक रोज़ क़यामत की मुझ पर टूट गई।

धड़कते दिल की धड़कने मेरे कहि जो छूट गई।।

फट कर आसमां भी गर्ज के रो पड़ा।

डर कर मोहब्ब्त भी सरेराह मर गई।।

याद है नज़ारा अब भी वो आह से भरा।

बिना कुछ कहे ही दिल रो रहा था मेरा।।

याद है नज़ारा अब भी दर्द ए दिल जो दर्द भरा।

बिना ज़ख्म ही चिर रहा था जख़्मी दिल मेरा।।

अज़ीब सा एक वाक्या एक रोज़ जो दिवाने ने देख लिया।

सनम से करते हुए किसी गैर को मोहब्ब्त जो दिवाने ने देख लिया।।

बेवफ़ाई पर सनम की दिल को उस रोज दिवाने के हैरत हुई।

बेवफ़ा वो क्यों सनम मेरे, किसी गैर की भूल कर मुझे जो हुई।।

निकला था इश्क तो हुस्न के एक दीदार में।

कदम शोलो पर रख जलते जो उसके प्यार में।।

दहक उठे दिल मे फिर क्यों जलते शोले।

हो गए बर्फ फिर क्यों मोहब्ब्त के जलते शोले।।

हो गया जख़्मी दिल वो मेरा जो तड़प गया।

छोड़ दामन में किसी गैर के उनको फिर वो रो दिया।।

नही है अंजान एहसास ए हुस्न हर चाल ज़हरीली हुस्न की इश्क़ अब जान गया।

बेवफ़ा है हुस्न जो अपने इश्क़ से, सितम खुद पर इसे इश्क़ अब मान गया।।

दिल चिर देती है यू ही दिवाने का अब भी वो।

धड़कने तोड़ देती है फ़रेबी नज़रो में ला कर मोहब्ब्त वो।।

दिया है जला दिल इश्क़ का कर के हुस्न ने बेवफ़ाई।

दिया है रुला रूह ए मोहब्ब्त जो उसने कर के मोहब्ब्त की रुसवाई।।

नाक़ाम इश्क़ को हुस्न की मक्कारी जो अब भी दिखती है।

छुप छुप कर सितमगर किसी गैर से वो अब भी मिलती है।।

याद है…

दिखा कर जलवा ए हुस्न ने जलवा ए बेवफ़ाई, धड़कने धड़कते दिल की जब रोक दी।

ऐसा मारा तमाचा टूटे दिल पर मेरे, जीते जी ही उसने सांसे मेरी रोक दी।।

लेकर फ़रेबी मुस्कुराहट आई जब वो मेरे पास।

भर कर नज़रो में मोहब्ब्त झूठी बैठ गई वो मेरे पास।।

कर दिया जख़्मी रख के दिल पर उसमे बेवाफ़ाई से अपना जब हाथ।

कर रही है बैठ कर अब नज़दीक मेरे वो मोहब्ब्त की बात।।

तोड़ दी हर धड़कने रोक दी सब सांसे कर दिया इतना मज़बूर।

दिखता नही दिवाने को अक्स अपना, नही कोई अपना कसूर।।

लेता है बदल रूप वो हुस्न अपना।
लगा कि दाग दामन पर रौशन,
निकलती है ढक दाग को कर के रंगीन वो पर्दा अपना।।

पर्दा है महीन शराफ़त भरा, ढक नही पाता दाग दामन पर अपने बेवाफ़ाई से जो भरा।

झटक कर हाथ दिवाने का एक बेवफ़ा ने सरेराह, मज़ाक मोहब्ब्त का सरे अंजुमन जो उड़ा दिया।।

बेवफ़ा सनम से मुलाक़ात अब भी जो हो रही है।

जख़्मी ये दिल ए दीवाना रूह उसकी जो रो रही है।।

लगता है हुस्न अंजान मगर इश्क़ नही अब नादां।

फ़ितरत है फ़रेबी जो उनकी इश्क़ नही अब अंजान।।

एहसास ए दीवाना सनम जो दगाबाज़ हो गए।

कर के मोहब्ब्त किसी गैर से दामन में उसके खो गए।।

ज़ख्म दिल का सहलाना हाथो से अपने नही असां।

धड़कनो से नाम एक बेवफ़ा का अपनी खुद मिटा पाना नही असां।।

लपटों से धधकती आग के दीवाने को अपने सनम ने जो छोड़ दिया।

कर के मोहब्ब्त किसी गैर से जो बेवफ़ा दिवाने से अपने, दिल दिवाने का तोड़ दिया।।

बेवाफ़ाई का बेवफ़ा सनम से इक़रार करवाना असां नही।

सितमगर का फ़रेबी दिल से उसके नाम मिटाना असां नही।।

मोहब्ब्त का अपनी उसी तरह दिवाने से करती है अब भी वो इज़हार।

भर के मदहोश निगाहों में मोहब्ब्त, दिल पर करती है दिवाने के वो वार।।

धड़कने मुस्कुराहट से अब भी एक उसकी दिवाने की बढ़ जाती है।

इठलाती चाल पर अब भी जो उसकी, सांसे दिवाने की रुक जाती है।।

खड़ा है दीवाना उसके इंतज़ार में अब भी वही।

ए वक़्त टूटे दिल मे मगर एहसास ए मोहब्ब्त कोई एहसास नही।।

बेवफ़ा सनम दिवाने से मुलाक़ात फिर भी है करती।

झूठी मोहब्ब्त से इज़हार ए मोहब्ब्त का वो है करती।।

तड़प दिल की देख कर अपनी दीवाना यह मान गया।

करता है मोहब्ब्त सनम से अब भी, आह से टूटे दिल की इस बात को मान गया।।

अंजान है हुस्न एहसास ए दीवाना जो अपनी वो बेवफ़ाई से।

परेशान है इश्क, एहसास ए हुस्न जो अंजान है वो खुद अपनी बेवफ़ाई से।।

रुला देती है आँसुओ से दिवाने को मोहब्ब्त के अपने झूठे।

तड़पा देती है दिल ए दीवाना दिखा कर मोहब्ब्त के फ़साने झूठे।।

डाल दिया है पर्दा रूह पर क्यों अपनी उसने।

रोक दी है सांसे दिखा कर फ़रेबी मोहब्ब्त क्यों अपनी उसने।।

नही पड़ता है फ़र्क कोई कर के मोहब्ब्त ज़ाहिर उनको झूठे अपने एहसासों से।

हो गया है फ़ना कब का दीवाना देख नज़दीक दिल के उन्हें फ़रेबी उनकी मोहब्ब्त से।।

जख़्मी दिल के ज़ख्म एक रोज़ जो फिर से रो दिए।

देख दामन में किसी गैर के फिर से उन्हें, टुकड़े टूटे दिल के टुकड़े टुकड़े हो गए।।

हर टुकड़े से दिल के निकल रही फ़रियाद।

तोड़ा दिल दिवाने का सनम ने अब है जो गैर के साथ।।

आईने ने मोहब्ब्त के दीवाने को फिर से जला दिया।

दिखा कर अक्स ए बेवफ़ाई सनम का, फिर से मार दिया।।

दौलत ए मोहब्ब्त से दीवाना दिखता था कभी जो शहंशाहों सा।

बेवफ़ाई ए सनम ने कर दिया कंगाल उसे दिखता है हाल ए सूरत अब उसका कोई फ़कीरी सा।।

बदल गया बदलते मौसम की तरह जो दिलबर मेरा।

मुर्झा गया गुलिस्तां पतझड़ आने से पहले ही मोहब्ब्त का मेरा।।

ए मोहब्ब्त हर बार मोहब्ब्त से इश्क जो मज़बूर हो गया।

जान बेवफ़ाई जो हक़ीक़त ए यार, कहि अंधेरे गर्द में खो गया।।

हिम्मत ए इश्क़ टूट जाती है जो बता दे वो हुस्न को।

आईना ए हक़ीक़त जो दिखा दे बेवफ़ाई उसकी जो उसको।।

यकीं है इस कदर एक दिवाने का वफ़ा ए मोहब्ब्त पर अपनी।

कर देगा इस कदर मज़बूर हुस्न को दिखा कर आईना मोहब्ब्त का वो अपनी।।

हो कर बेबस वफ़ा से कर लेगा इकरार ए दगा खुद मोहब्ब्त का सनम वो बेवफ़ा अपनी।।।

मिलते है कर के पत्थर जो एहसासो को इस दिल के अब भी एक बेवफ़ा के साथ।

करती बयां मोहब्ब्त की वो अब भी दिवाने को अपनी हर एक बात।।

अपनी मोहब्ब्त और वफ़ा उसे मोहब्ब्त की एक जिंदा मिसाल लगती है।

अश्को से भीगा दामन में मेरे फ़रेबी जब सर वो अपना रखती है।।

बदस्तूर जारी है बेवफ़ा सनम से मोहब्ब्त की मुलाकाते।

हो जाएगी फ़ना एक रोज़ मोहब्ब्त से मेरी, मोहब्ब्त की दे रही है वो सौगातें।।

सुन कर एक बेवफ़ा से वफ़ा के वो अल्फ़ाज़।

रो दिया दिल तड़प कर सुन बेवफ़ा लबो से वफ़ा के अल्फ़ाज़।।

मासूम है धड़कने जो दिल में मेरे, करती है कई संगीन सवाल।

दे दु ज़वाब हर सवाल का जो ऐसे नही थे दिवाने के हाल।।

होती है सितमगर से अपने अब भी क्यों मोहब्ब्त की ये जख़्मी मुलाक़ातें।

मिलती है दामन में बेवफ़ाई के सरेराह जो वफ़ा की ये बेचैन सौगातें।।

नही है वाकिफ़ हक़ीक़त से हुस्न वो बेवफ़ा सनम मेरा।

नही रहा नादां इश्क़ ये अब जख़्मी है जो मेरा।।

नसों में अपनी ज़हर एक बेवाफ़ाई भरा उनकी जो उतार दिया।

कर के वफ़ा बेवफ़ा से एक खुद को हमने जीते जी ही जो मार दिया।।

बेवफ़ाई से सनम की ख़ुद को जिंदा ही हमने जला दिया।

रुसवाई से मोहब्ब्त की अपनी, प्याला ज़हर का हलक से उतार दिया।।

याद आई जब उसकी तो ज़ख्मो को अपने नासूर बना दिया।

मार कर जख़्मी दिल पर ख़ंजर ख़ूनी लहू अपना बहा दिया।।

उतार कर फड़कती रगों में सीसा कोई पिंघला, दिल से नाम बेवफ़ा का मिटा दिया।।।

दिया है दाग मोहब्ब्त का, नाम ए मोहब्ब्त लबो से उसके निकलने ना अब पाए।

मज़बूर है इश्क जान हक़ीक़त अब भी नज़रो में बहुत, कहि बदनाम ना वो हो जाए।।

कसमें हज़ारो वफ़ा की हमसे, हुस्न वो बेवफ़ाई से आज भी दोहरा गया।

हर सितम झेल कर जख़्मी दिल पर हज़ारो अपने, इश्क ये फिर से आज जख़्मी होता गया।।

जलता है दिल दिवाने का एक, धड़कनो में अब जान नही।।

छूटता है दम दिवाने का एक, सांसो पर उसे अब एतबार नही।।

लगते है ज़ख्म दिल पर मगर आह अब निकलती नही।

दर्द है बेहिंतिया सांसो पर मगर चोट क्यों दिखती नही।।

मिलता है हुस्न ए यार मुस्कुरा कर अब भी आता है दिवाने के जब भी करीब।

देता है सौगात प्यार की बैठाकर एतबार से अब भी अपने करीब।।

तोड़ दिया एतबार एक बेवफ़ा ने अपने यार का क्यों?।

मार कर ख़ंजर बग़ल से ख़ूनी उस को, दम घोट दिया प्यार का क्यों?।।

यकीं मोहब्ब्त का भर कर मदहोश निग़ाहों में अपनी फ़रेबी दिल ए दीवाना तोड़ दिया।

एतबार वफ़ा का बेवफा सनम ने दिला कर हर टुकड़े को टूटे दिल के फिर बिखेर दिया।।

ऐसा लगता है खेल बर्बाद ये मोहब्ब्त का खत्म जल्द ही हो जाएगा।

दिल है फ़रेबी हुस्न का, रौशनी मोहब्ब्त से मोहब्ब्त की दीवाना जरूर उसे दिखलाएगा।।

हैरान है दीवाना, हैरानी की ये बात।

दिख रही है सूरत उसकी वो कुछ उदास।।

आई क़रीब एक रोज़ वो, सूरत कुछ उसकी उदास दिखती है।

ऐसा लगता है तबियत कुछ उसकी नासाज़ लगती है।।

पूछते है दिवाने से अपने बेवफ़ा वो सनम एक रोज़, हो गए जुदा जो हम तो क्या करोंगे।

याद करोंगे हुस्न ए यार को या कर के बदनाम हमे, किसी गैर पर मरोंगे।।

रख दिया ना जाने क्यों हाथ दिल पर बेवफ़ा उस सनम ने जख़्मी दिल जो दिवाने का।

ले रही है एतबार ए वफ़ा अब क्यों, सब कुछ लूट कर वो अपने दिवाने का।।

फ़रमाते है बेवफ़ा वो सनम मेरे वक़्त ए जुदाई भरी बातें।

पूछते है बिन सनम कट पाएँगी क्या दिवाने की तन्हा रातें।।

कहती है दिवाने से वो, जल्द ही जुदा अब शायद हो जाएंगे।

ना दिखो जो तुमको कभी, तन्हा तो नही तब हो जाओंगे।।

कसक ए मोहब्ब्त से दामन ए वफ़ा पाक कर रहे है जो।

मदहोश निग़ाहों से गिरते वो अश्क़, फ़रेबी कत्ल दिवाने का कर रहे है वो।।

यकीं ए दीवाना सनम वो बेवफ़ा वफ़ा गैर से कर रहे है जो।

कर के क़त्ल सुने अरमानों का सरेराह बातें जुदाई भरी कर रहे है वो।।

बात सनम कोई बेवफ़ा जुदाई की जब करने लगे।

सुर्ख गुलाबी लबो से ख़ुद हक़ीक़त अपने बयाँ करने लगे।।

दे देगा इश्क़ दिलासा फिर भी उसे।

धड़कने सुना देगा दिल चिर कर फिर भी उसे।।

दिखा कर आईना बर्बाद मोहब्ब्त का अपनी।

हर ज़ख्म से टूटे दिल के आ रही है एक आह अपनी।।

अंगार है बरस रहे जो अश्क़ बन के, नम आँखों से मेरा लहू।

इम्तेहां ए मोहब्ब्त जो हो रहा तड़प के रो रही है मेरी रूह।।

हो गया बेवफ़ा हुस्न वो, बेवफ़ाई की एक मिसाल बन गया।

बहा कर अश्क़ नम निग़ाहों से अपने, आशिक़ का अपने दिल चिर दिया।।

दे रहे है यकीं, मोहब्ब्त का एतबार बेवफ़ा सनम वो अपनी।

करता है हुस्न सिर्फ इश्क़ से मोहब्ब्त, दर्द ए जुदाई दे देगी जान वो अपनी।।

दिल चिर कर अपना दिखा सकती है वो।

हर धड़कन को रोक कर मिटा सकती है वो।।

लिख दिया टूटे दिल की जो वीरान धड़कनो पर एक नाम वो नाम ए मोहब्ब्त।

इश्क़ को हुस्न पर ना रहा फिर अब क्यों एक यकीं जो यकीं ए मोहब्ब्त।।

झेल गया ख़ंजर ए बेवफ़ाई धड़कनो से अपने, इश्क़ ए दीवाना जो नादां नही।

कर देगा रुसवा ज़माना वफ़ा ए मोहब्ब्त हमारी, अंजाम ए मोहब्ब्त ऐसा कोई नही।।

दिल बदल जाए हुस्न ए सनम जो मिज़ाज ए मौसम की तरह।

थाम के हाथ मोहब्बत किसी गैर से जो चली जाए बेवफ़ा चाल सियार की तरह।।

मोहब्ब्त है जो किसी गैर से तो हाथ उसका थाम ले।

ले रही है इम्तेहां ए दीवाना जो बेवफ़ा अब तो रब का नाम ले।।

आ रही जो खबर आग गुलिस्तां में लग गई।

मोहब्ब्त करते किसी गैर से नज़रे दिलरुबा की अपने दिवाने पर जो ठहर गई।।

उड़ गए क्यों होश ए यार जो सरेराह, मदहोश निगाह एक दम से उसकी, सन सी क्यों जो रह गई।

एहसास ए पत्थर वो एहसास ए यार, ना जाने क्यों सरेराह उनकी, पथराई निगाहें जो बरस गई।।

भीगा जो अश्को से दामन किसी गैर का उनके, आग गुलिस्तां में दिवाने के जो लग गई।।।

समझ गया दिल ए नादां ये दीवाना, वो वक़्त भी आ गया, जुदा जब हो जाएंगे।

करते है गैर से बेवफ़ा सनम जो मोहब्ब्त, ये पल उसी के अब हो कर वो रह जाएंगे।।

सदियों से है तन्हा इश्क़, बेदर्द ज़माने में जो तड़प रहा।

याद हुस्न को करते हुए, घुट घुट कर हर लम्हा जीता और मर रहा।।

देखना है अंजाम ए मोहब्ब्त, बेवफा सनम वार सीने पर कब करेंगे।

तन्हा छोड़ दिवाने को अपने, हाथ किसी गैर का सरेराह वो थाम लेंगे।।

क़यामत दिल पर बेवफ़ा के बन कर बिजली कोई टूट गई।

लिपटी थी दामन से गैर के, निंद जब उसकी उड़ गई।।

नज़रे मिली दिवाने से तो नज़रे उसकी झुक गई।

जख़्मी हो गया दिल मेरा, धड़कने जब उसकी रुक गई।।

तस्वीर ए मोहब्ब्त थी धुंधलाई सी जो, एकदम से साफ वो अब हो गई।

चली हवा तूफ़ानी सी जब, हर बात अधूरी सी जब पूरी हो गई।।

उतर गया नक़ाब ए चेहरा सूरत से जो उनकी, बिन बोले ही हर बात वहा फिर हो गई।।।

जख़्मी दिल ए दीवाना हर ज़ख्म को दिल के कुछ सकूँ मिला।

कुरेदें ज़ख्म दिल के जो हर ज़ख्म अब नासूर बना।।

तड़पती रूह दिवाने की उसको कुछ आराम मिला।

रह गई थी कब्र जो खुली उन एहसासो को अब मुक्कमल मुकाम मिला।।

झूठी महफ़िल में हुस्न की इश्क़ ए दीवाने अब कोई काम नही।

एक बेवफ़ा की मोहब्ब्त में मोहब्ब्त जो अब नीलम हुई।।

फट गए पर्दे बेवफ़ाई के महीन सब उनमे अब आराम नही।

आ गई सूरत ए यार असल नज़र, नक़ाब ए वफ़ा अब बेवफ़ाई नही।।

नही है आदि इश्क़ ये मेरा इन बेदर्द से दर्दो का दिवाने।

ना जाने सह गया सितम कैसे इन बेदर्द बेदर्दो का दिवाने।।

दिखते नही बेवफ़ा सनम कहि, बेवफ़ाई से अपनी क्या सहम गए।

गुजर गए है ना जाने मौसम कितने, रुसवाई से अपनी सितमगर कहि छुप गए।।

जानते है इश्क़ ए दीवाना है सवाल कई।

छुपे है हर सवाल ए मोहब्ब्त है मसले कई।।

हर मसाला है मोहब्ब्त दिल की गहराई से जो।

हर गहराई है राज दिल के छुपाए उन्होंने जो।।

नादां है इश्क़ हो गया जो नीलम।

कुचला गया खाई ठोकरे उसने जो सरेआम।।

फिर एक रोज़…

निकला है चाँद कहि आज किसी ओर से, एक अरसे के बाद।

दिख रहे है मासूम चेहरे पर उसके बेवफ़ाई के घिनोने जो दाग।।

रोशनी है बेनूर सी उसकी, जल रहा जो ये एतबार।।।

दर्द ए जुल्म की हो गई अब इंतेहा, हर दर्द, हर अधूरी आरज़ू एक साथ जो रो पड़े।

आ गए नज़दीक बेवफ़ा दिवाने के क्यों, झुका कर निगाहें अपनी साथ दिवाने के वो जो खड़े।।

देख रही है मदहोश निगाहों में अपनी भर कर प्यार।

तड़प रही है टूटे दिल पर दिवाने के रख कर अपना हाथ।।

उठ चुका है हर पर्दा बेवफ़ाई का चेहरे से जो उनके।

आ गई है दुबारा फिर ये कौन सा नक़ाब जो चेहरे पर उनके।।

दे रहा है हो कर बेसुध हुस्न दुहाई वफ़ा की दिवाने को तन्हाई में अपने।

ले रहा है लिपट कर नाम ए वफ़ा दिवाने से तन्हाई में अपने।।

आँखों से आँसू रुकते नही।

तड़प दिल की कुछ कम तो नही।।

लव्ज़ है मासूम से उसके, सुर्ख लबो से नज़रे क्यों हटती नही।।।

दर्द ए दिल बन कर अश्क़ मासूम निग़ाहों से शराबी जो उसकी झलक गया।

खून ए ज़िगर दिवाने का देख कर उसकी तड़प जो तड़प गया।।

आँसुओ से बेवफ़ा सनम के दर्द झलक रहे।

तड़पता दिल हर टूटती धड़कने नाम ए दीवाना ले रहे।।

सुन कर नाम ए वफ़ा लबों से बेवफा के एक, ज़ख्म ए दिल जो दिवाने के जलते रहे।

हुस्न मरता रहा इश्क तड़पता रहा, देख ये हाल ए सनम ज़ख्म दिल के रो रहे।।

मोहब्ब्त से उनकी ज़ख्म छीलते रहे, हम मरते रहे, हर लम्हा ही दिल दीवानों के जो जलते रहे।।।

रख कर टूटे दिल की टूटी धड़कनो पर हाथ अपना, दे रहे है यकीं वो।

दामन है पाक हुस्न का ए दिवाने, नही है बेवफा वो।।

नही है बेवफ़ा सनम वो, सितम दिल पर उसके हो रहा।

मज़बूर है दस्तूर ए ज़माने से टूट कर दिल उसका रो रहा।।

ना समझ बेवफ़ा सनम को अपने ए दिवाने।

ना दे इल्ज़ाम ए बेवफ़ाई दिल को उसके ए दिवाने।।

मज़बूर है ये हसीना बेदर्द से, खून के रिश्तों और मुफ़लिसी भरे अफ़साने से।।

ले कर नाम ए मोहब्ब्त ए दिवाने ये हुस्न है बदनाम।

जाता है पहलो में गैर के, रूह को उसके नही है आराम।।

मोहब्ब्त के अलावा सितम है कई इस ज़माने में ए दिवाने।

तोड़ सकती है दिल हसीना अपना, पी कर ज़हर ए रुसवाई बेदर्दी इस ज़माने में ए दिवाने।।

देख कर दामन में गैर के, ना समझ लेना तुम गैर मुझ को ए मेरे दिवाने।

जिंदा है अब भी मोहब्ब्त तुम्हारी, हर धड़कन पे है नाम ए दीवाना जो तेरा ए दिवाने।।

एहसास है जो एक गैर का, जान मुफ़लिसी ने निकाल दी कर के अपना बेदर्द वार।

साया है जो एक मौत का, लटकी है सर पर अब भी एक नंगी जो तलवार।।

सितम से मज़बूर है हसीना ये अपनो से, नही छोड़ सकती उनका जो साथ।

निकला है बिज जो दरख़्त से एक, बन गया अब हुस्न ए शबाब जो तुम्हारा ग़ुलाब।।

कांट दु उस दरख़्त को ले कर मोहब्ब्त का अब कैसे मैं नाम।।।

याद फिर भी आए जब मेरी, चाँद आसमां पर देख लेना।

ना मिले सकूँ ए दिल जब, नाम ए बेवफ़ा सनम को अपने दे देना।।

कर देना रुसवाई इस ज़माने में, एक नाम बेवफ़ा हर जगह बेवफ़ाई से लिख देना।

हालात ख़िलाफ़ जो हो गए, जुबां से निकले ना कोई भी अल्फ़ाज़।

जल्द ही ले आएगा एक अंजान घर आंगन में मेरे बारात।।

मज़बूर है बेहिंतिया बेवफ़ा सनम को जान लेना, अलग ना उससे अब हो पाऊंगी।

हो रही हु जुदा जो अपने महबूब से, फिर से ना अब मिल पाऊंगी।।

समझ लेना तुम मुझे बेवाफ़ाई की कोई घिनोनी सौगात।

आ रही है जल्द ही आंगन में मेरे एक अजनबी की बारात।।

हो कर ओझल नज़रो से हुस्न कहि अब खो गया।

छोड़ कर तड़पता दिवाने को दूर नज़रो से हो गया।।

हाल ए दिल जान अपने सनम का, दिल ए दीवाना एक रो रहा।

समझा जो बेवफ़ा वफ़ा को उसकी, रूह ए दीवाना एक दीवाना तड़प रहा।।

आईना ए मोहब्ब्त चमक गया महबूब की सच्चाई से।

दिख रहा अक्स ए मोहब्ब्त उनकी अब वफ़ाई से।।

जान कर हक़ीक़त ए सनम तड़प गई रूह दिल भी रो रहा।

ज़ख्म बेहिंतिया पहले से थे, जख़्मी अब फिर से दिल ए दीवाना हो रहा।।

दिल है बीमार मेरा, रोग ए मोहब्ब्त जो लाइलाज़।

दर्द ए दिल की दवा जो नही, हर धड़कन भी जो सनम के नाम।।

दर्द ए दिल बीमार का एक रोज़ जो बढ़ गया।

हर नव्ज़ रुक गई और कलेजा भी जो फट गया।।

देखी जो आंगन में बारात सनम की उसके, ये दिल तड़पा बेहिंतिया और धड़कना भूल गया।

जान दर्द ए जुदाई ये दिल जो एक दिवाने का टूटा, टूटने से पहले एक आह लेना भी भूल गया।।

हो रही है आतिश बाजी आंगन से ये किस के यू ही अचानक से।

रो रहे है ज़ख्म दिल के हो कर नासूर ये किस के यू ही अचानक से।।

आंगन से उनके धुन जो शहनाई की आ रही है दर्द भरी।

टूटती धड़कने तोड़ते हुए दूर सनम को ले जा रही है दर्द भरी।।

हाल ए बेहाल है उधर भी जो सनम का, देख रही है पल पल हर लम्हा वो किस की राह।

सुनी है नज़रे उसकी, नही निकलती दिल से जो उसके आह से भरी कोई आह।।

रात है मेहंदी की सब सखिया है उसके साथ।

लब है ख़ामोश उसके, बेचैन है धड़कने करने को दिवाने से कोई बात।।

जगमगाहट है सितारों सी घर आंगन जो उसका चमक रहा।

जल रहे है फानूस हर ओर दिल से फिर भी अंधेरा झलक रहा।।

दे रही दुहाई तड़पती धड़कने दिल की होने से पहले उसकी जो विदाई।

दिख जाएगा दीवाना जरूर वो उसका होने से पहले उसकी आखरी जो विदाई।।

उठ गई डोली बुझ गई हर शमा उसके इंतज़ार की उसके साथ, आया ना दिलबर वो दिल का उसके, यार हरजाई।

दर्द ए दिल सरेराह नम आंखों से झलक गया।

बैठ गई डोली में हसीना, दीवाना भी उसका तड़प गया।।

उठी थी डोली जिस लम्हा ये आसमां, ये चाँद भी उसका लाल हो गया।

गिरी थी बिजली दिल पर जो मेरे, गर्ज कर बरसा के शोले वो भी जो रोआ फिर बरस गया।।

टूट गया दिल ए दीवाना हर धड़कन से जख्मी हो गया।

देख कर मंजर एक दिवाने की बर्बादी हर कोई वहा रो दिया।।

तन्हा छोड़ तड़पता सनम दूर कहि परदेश को चला गया।

कसमे वादे तोड़ कर सब, हर टुकड़े पर दिल के दास्ताँ ए बेवफ़ाई लिख गया।।

दिन गुजरते रहे दूर सनम से जुदाई मे।

मौसम ज़िन्दगी के बदलते रहे बेदर्द अंधेरी तन्हाई में।

बिछुड़े सनम से फिर कभी मिल ना पाया जो दीवाना।

याद सनम को करते हुए तार टूटे दिल के कभी छेड़ ना पाया फिर से दीवाना।।

रह गए जो सवाल अधूरे कई, टूटे दिल की तन्हाई में।

ढूंढ़ ना पाया जबाब उनका कोई, हर लम्हा दीवाना तन्हाई में।।

जबाब अधूरे एहसासो का अपने हर सवालों का मुमकिन अब नही।

दीदार ए यार मिल जाए वो बिछुड़ा सनम ए मोहब्ब्त मुमकिन अब नही।।

एहसास ए सनम के हर एहसास है जख़्मी अब भी दिल मे जो बाकी।

टूट गए जो तार ए मोहब्ब्त हर एहसास है अधूरा एक साया जो मौत का अभी बाकी।।

महबूब की मोहब्ब्त से जख़्मी ये दिल दिवाने का हो गया।

इंतज़ार है अब भी उसका, जान के दिल दिवाने का रो गया।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

सताती है हर लम्हा याद तेरी, जान दिवाने की निकल जाती है।

होता नही दीदार ए यार, तड़प ये तेरी दिवाने को बहुत रुलाती है।।

आती है याद दिवाने की क्या तुझ को भी ए बिछुड़े सनम, याद से दिवाने की क्या तू भी तड़प जाती है।

ले कर नाम ए दीवाना अपने दिवाने को, हर लम्हा क्या तू भी उसे बुलाती है।।

तन्हा है हर धड़कन बेशक़ से टूटे दिल की मेरे, हर धड़कन से छुपाए हु सूरत ए यार आवाज़ अब नही उन धड़कनो में कोई है।

ज़ख्म ना सिलने पाए टूटे दिल की हर जख़्मी धड़कनो के मेरे, आहट अब दिवाने को अपनी मौत की आई है।।

याद हर लम्हा बेवफ़ाई अपनी, दिल में एक तन्हाई, सुनी नज़रो में अब भी सूरत ए यार दिवाने, याद दिल मे मेरे जो उसकी समाई है।।।

देख कर ये हाल अपना तड़प कर रो दिया अब भी ज़ख्मी दिल मेरा, अब भी ज़ख्मी दिल मेरा, अब भी ज़ख्मी दिल मेरा।।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

पुनः प्रकाशित #FacebookLive video के साथ।

27 जून 2020 2:11 am

#FacebookLive link is https://www.facebook.com/vikrantrajliwal85/videos/2651787795092523/

बेगुनाह मोहब्ब्त।
🌹Begunah Mohbbat
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एक एहसास-ज़िंदगी।

ज़िंदगी की हर एक कसौटियों पर,  हम ख़ुद को परखते हुए चलते गए।


हर हालात ए ज़िंदगी से झुझते हुए, हम खुद को हर हालात ए ज़िंदगी के मुताबिक ढालते गए।।


सकूँ सांसो का ज़िंदगी मे कभी पा ना सके, हम ज़िंदगी को ठोकरों पर ठोकर लगाते गए।


बच्चपन गुज़रा, ज़वानी भी ढल सी गई जो एक दम, हम ख़्वाबों को जिंदगी के पूरा करने में ज़िंदगी को बिताते गए।।


एहसास ख़ुद का हमें आज भी डराता है, हम हर एहसास को ज़िंदगी से अपने मिटाते गए।


हर लम्हा एक तन्हाई सी मालूम होती है, हम अपनों में खुद को हर मरतबा तन्हा पाते गए।।


याद आती है आज भी बचपन की वो गलियां, उम्र गुजरती गई, सितम ज़िंदगी का हम सहते गए।


उम्र गुजार दी हमनें सलीका ज़िंदगी का सीखते हुए, हम आज भी सलीका ज़िंदगी का जो सिख ना सके।।


हर हक़ीक़त को ज़िंदगी की अपने सीने से लगाए, हर हक़ीक़त को ज़िंदगी की हम ज़िंदगी से झुठलाते गए।


इश्क़ है हमें आज भी जिंदगी से बेहिंतिया, ज़हर सांसो से जिंदगी का पीते हुए हम जो मुस्कुराते गए।।


विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।


तारिक़ 13 महीना जून वर्ष 2020 समय
रात्रर 10:01 बजे।

विक्रांत राजलीवाल।
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💥 Recovery Man Author Vikrant Rajliwal

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You can produce a positive change in your personality today. The only requirement is a positive move and a qualified experienced person.

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When you want to make your precious life free from intoxication, it means that you want to be free from the company you all know in society as incompatible. With this, you are willing to make some positive changes in your chaotic life.

But here you did this idea and there all the above positive changes took place in your life and you ended up the chaos of your life and achieved life advancement. Do you think so

If you have come down then you are in great need of a responsible chancellor, otherwise you can waste your precious life on your own hands due to your ignorance or you may even die from your family members without any reason.

Recovery And Addiction by Vikrant Rajliwal

Why so? Have you ever considered it?

Because you first need a person who can accept you with your true state of mind. With this, the unknown problem you are feeling today or the unknown problems that have arisen in front of you like a chakravyuh, they had also faced the same problems and who could conquer those problems and reach here today. is.

Some real facts written by Vikrant Rajliwal which is a tangible result of true experiences.

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आप आज ही अपने व्यक्तित्व में एक सकरात्मक परिवर्तन उतपन कर सकते है। केवल आवश्यकता है तो एक सकरात्मक भरे कदम एवं एक योग्य अनुभवी व्यक्ति से एक मुलाकात की।

💥 जब आपने अनमोल जीवन को नशे से मुक्त करना चाहते है तो! इसका तातपर्य यह है कि आप अपनी उस संगत जिसे समाज में हम सभी असंगत के रूप में जानते है से मुक्त होना चाहते है। इसके साथ ही आप अपने अव्यवस्त जीवन में कुछ सकरात्मक परिवतर्न उतपन करने के इच्छुक है।

परन्तु यहाँ अपने यह विचार किया और वहाँ उपरोक्त सभी सकरात्मक परिवर्तन आपके जीवन मे उतपन हो गए और आप अपने जीवन की अव्यवस्था को समाप्त कर जीवन उन्नति को प्राप्त हो गए! क्या आपको ऐसा ही लगता है?

यदि आपका उतर हा है तो आपको एक जिम्मेवार कौंसलर की अति आवश्यकता है अन्यथा आप स्वयं अपने हाथों ही अपने अनमोल जीवम को अपनी अज्ञानता के कारण बर्बाद कर सकते है या बिना कारण ही स्वयं अपने परिवार के सदस्यों से आहात भी हो सकते है।

ऐसा क्यों? क्या कभी यह विचार किया है अपने?

क्योंकि आपको सर्वप्रथम एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जो आपको आपकी वास्तविक मनोस्थिति के साथ स्वीकार कर सके। इसके साथ ही जो अनजानी समस्या आप आज महसूस कर रहे है या जो अनजानी समस्याओं आपके सामने एक चक्रव्यूह के समान अक्समात खड़ी हो गई है कभी उन्होंने भी उन्ही समस्याओं का सामना किया था और जो उन समस्याओं पर विजय प्राप्त करते हुए आज यहाँ तक पहुच पाए है।

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स्वयं को किसी के समुख इतना ना झुकाए की वह आपको अपने मुनाफ़े एवं स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर सकें।

इसके विपरीत आप स्वयं में कुछ ऐसे सकरात्मक परिवर्तन उतपन कीजिए, जिससे आपको किसी के समुख झुकना ही ना पड़े।

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Do not bend yourself in front of anyone so that they can use you for their profit and selfishness.

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Dear Loved One’s,My First Introduction video is uploaded now!

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Shankar Madari. (Episode 3) with Recorded Video.

नमस्कार प्रिय पाठकों एवं श्रुताओ, आभी तक आपने जाना कि किस प्रकार से भव्य झिलमिल नगर में शंकर मदारी का आगमन होता है। जहाँ उसकी मुलाकात पोपटलाल भाया से होती है।

जो उसको मुसाफिरखाने के स्थान पर झिलमिल नगर के शाही बाग में ठहरने हेतु एक झोपड़ा प्रदान कर देता है। जिसके अवज़ में वह उससे मदिरा की एक पूरी बोतल की मांग करता है। 

अब आगे…

उधर मुसाफिरखाने के भीतर मुंशी पोपट लाल भाया स्वयं से कुछ बड़बड़ाते हुए कि वो कठे अटक गयो। अभी तक आयो कोणी। माहरी बोतल वाली बात वो “मदारी” भूल तो कोणी गयो भाया। अभी मुंशी इन सभी प्रश्नों के हल खोजने में चिंतामग्न था कि तभी मुंशी के कक्ष के द्वार पर एक जोरदार दस्तक होती है। जिसको सुनकर मुंशी कुछ हड़बड़ाहट के साथ होश में आते हुए की कौन है? कौन है भाया? तभी दूसरी ओर से एक आवाज़ आती है कि जी मैं हु शंकर मदारी। शंकर की आवाज़ को सुनकर मुंशी अत्यधिक प्रसन्न होते हुए, उसको कक्ष के भीतर बुला कर कहता है कि भाया अभी तक कठे अटक गयो था। म्हारी मदिरा की बोतल कठे है! लायो है के कोणी लायो? मुंशी की ऐसी उतेजना देखकर, शंकर कुछ उतेजित स्वर के साथ “हा हा मुंशी जी लायो हु! मेरा मतलब है कि लाया हूं। यह देखे रंगीन मदिरा की बोतल। शंकर अपने मदारी वाले थैले में से मदिरा की बोतल निकाल कर मुंशी को दिखाते हुए। तदोउपरांत मुंशी और मदारी शंकर वही मुसाफिरखाने के उस बड़े से बरामदे में एक विशालकाय वृक्ष के नीचे बैठ कर भव्य झिलमिल नगर की उस मदहोश कर देने वाली रंगीन मदिरा का पान करते हुए, मदिरा के नशे में मदमस्त हो जाते है। लगभग एक बोतल मदिरा का पान करने के उपरांत मुंशी और शंकर मदारी के सर पर अब मदिरा का सरूर हावी हो जाता है।

तब मुंशी मदिरा के सरूर में शंकर से कुछ कहते हुए कि दे देख भ भा भायो! आदमी तो तू मने को भला दिखे है। पर ध्यान रहे भाया मैं भी कोई बेकार को आदमी कोणी। समझ रहे हो है ना। शंकर भी मदिरा के सरूर में हामी भरते हुए कहता है कि हे हा मालूम है मुंशी। तू बहुत ही अय्याश आदमी है। शंकर के मुह से यह सुनते ही मुंशी उसको टोकते हुए कहता है कि क्या बोल्यो तू मने? मुंशी का तेज स्वर सुनकर शंकर अपना सुर कुछ हल्का कर देता है कि कुछ नही महाराज। आप तो महान आदमी है। तभी तो मुझे राज शाही बाग में ठहरने दिया है अपने।

तब मुशी मदिरा के सरूर में पुनः कुछ कहते हुए कि देख भायो, वैसे में कुछ कोणी कहु। परन्तु जिस भी दिन मने मदिरा की बोतल कोणी मिले तो समझ जाइयो कि वही दिन तेरो अठे आखरी दिन हो जावेगों। इस प्रकार से शंकर मदारी को मुसाफिरखाने के बाग में अपने दोनों वानरों के साथ ठहरने का एक ठिकाना यानी कि स्थान प्राप्त हो जाता है और इस के बदले में मुसाफिरखाने के मुंशी पोपट लाल भाया को प्रतिदिन मदिरा की एक बोतल। तदोउपरांत मुंशी के साथ मदिरा की एक बोतल से अधिक मदिरा का पान करने के उपरांत शंकर मुसाफिरखाने के बाहरी द्वार पर बने भोजनालय से स्वादिष्ट भोजन खरीद कर अपने दोनों बन्दरो के साथ उस स्वादिष्ट भोजन का लुफ्त उठा कर अपने झोपड़े में आ कर चरपाई पर लेट जाता है। आज भव्य झिलमिल नगर में शंकर का प्रथम दिन बहुत ही अच्छे से व्यतीत हो जाता है।

अगली प्रातः जैसे ही उसकी आंख खुलती है तो उसकी सांसे उसके हलक में अटक जाती है। अभी प्रातः कालीन सूर्य ठीक से उदय भी नही हुआ था और शंकर अब भी रात की मदिरा पान के सरूर में अपनी चरपाई पर पड़ा हुआ था कि तभी उसके कानों में कोई तीव्र स्वर गूंज उठता है कि भाया उठो भाया। शंकर आहिस्ता आहिस्ता से अपनी आंखों को खोलने का प्रयत्न करता है। जैसे ही वह रात्रि मदिरा पान की खुमारी में अपनी अर्धखुली आँखों को खोल कर देख सकने में समर्थ हो पाता है तो वह देखता है कि मुसाफिरखाने का मुंशी पोपट लाल भाया उसको जोरदार झटके से हिलाते हुए निंद्रा से उठाने का प्रयत्न कर रहा था। यू इस प्रकार से प्रातः मुंशी को अपने इतने समुख पाकर शंकर एक झटके के साथ उठ कर बैठ जाता है और मुंशी से यू इस प्रकार से प्रातः उसको परेशान करने का कारण पूछता है।तब मुंशी पोपट लाल भाया उसको बताता है कि भायो राज शाही दरबार को एक दरबान आयो है। तने अभी उसके साथ जानो है। मुंशी के मुह से यह बात जानकर शंकर पहले तो कुछ हैरान होता है फिर भय से कांपते हुए मुंशी से कहता है कि क्यों आया है मुंशी जी, राज शाही दरबार से दरबान? मैं नही जाऊंगा! कह दो उससे। तब मुंशी पोपट लाल भायो उसको समझाता है कि देख भाया तेने अठे अपनो खेल तमाशो दिखानो से के कोणी दिखानो! मुंशी के द्वारा इस प्रकार के सँवाद को सुन कर, शंकर कुछ हैरान-परेशान सा हो जाता है और मुंशी से उसके यू इस प्रकार के सँवाद का कारण पूछता है। तब मुंशी उसको बताता है कि अपना खेल तमाशा दिखाने के लिए राज शाही को आज्ञा पत्र आवश्यक होवे है। समझो कि कोणी समझो। मुंशी से समस्त हाल जानकर शंकर मदारी अपने उन दोनों वानरों के साथ राज शाही दरबान के पीछे पीछे राज शाही दरबार की ओर चल देता है।

 कुछ ही क्षणों के उपरांत, वह राज शाही दरबान, शंकर मदारी को भव्य झिलमिल नगर के कला एवं साहित्य विभाग के मंत्री भानु प्रताप के सहायक खोटक लाल के समुख उपस्थित कर देता है। खोटक लाल ठिगने कद काठी के बाबजूद दिखने में अत्यंत ही क्रूर प्रवर्ति का दिखाई देता था। शंकर को देखते ही वह उस पर कुछ क्रोधिक होते हुए कहता है कि क्या तुम ही वो परदेशी मदारी हु जो परदेश से हमारे इस भव्य झिलमिल नगर में अपना खेल तमाशा दिखाने के लिए आए हो? खोटल लाल का क्रोध से भरा ऐसा कड़क स्वर सुन कर, शंकर के होश उड़ जाते है और वह कुछ कुछ भयभीत भी हो जाता है। किसी प्रकार से स्वयं के भय पर काबू पाते हुए शंकर अपने दोनों हाथों को जोड़कर खोटक लाल से कहता है कि “जी महाराज।” भय के मारे उसके मुह से सिर्फ इतना ही निकल सका।

शंकर को यू इस प्रकार से भयभीत होते देख खोटकलाल की हँसी छूट जाती है और वह अत्यंत ही हँसमुख अंदाज़ में हँसते हुए शंकर से कहता है कि तुम घबरा क्यों रहे हो भाई?  मैं कोई जल्लाद नही हु। इतना कहते हुए वह अपनी बगल से खेल-तमाशा दिखाने की अनुमति का राज शाही आज्ञा पत्र निकालते हुए! शंकर से 3 हलफ जो कि उस समय की अत्यधिक प्रचलित मुद्रा होती थी उसको राज शाही ख़ज़ाने में जमा करवाने के लिए कहता है। शंकर तुरन्त ही 3 हलफ राज़ शाही ख़ज़ाने में जमा करवाने के लिए खोटल लाल को देते हुए खेल तमाशा दिखाने का वह राज़ शाही आज्ञा पत्र उसके हाथों से अपने हाथों मे थामते हुए बहुत ही सहजता के साथ वहाँ से बाहर को निकल जाता है।

 वही दूसरी ओर भव्य झिलमिल नगर के बालको की मशहूर मित्र मंडली आज विद्यालय में अत्यधिक उत्साहित दिखाई दे रही है। तभी गटकु जो कि मित्र मंडली का सबसे चंचल बालक है एकाएक मदारी आया, मदारी आया का शोर मचाते हुए दौड़ने लगता है। और वह दौड़ते दौड़ते भी लगातार यही बोलता जा रहा है कि डुक डुक डुक आयो देखो मेरा खेल तमाशा। गटकु का ऐसा उत्साह देख कर विद्यालय के अन्य बालक भी अत्यधिक उत्साहित हो जाते है। तभी फूल कुमारी जो कि मित्रमंडली की मुखिया से कम ना थी अपने सभी मित्रों को एकत्रित कर मदारी और उसके बन्दरो के विषय मे वार्तालाप प्रारम्भ कर देती है। फूल कुमारी की एक आवाज़ पर सभी मित्र एकत्रित हो उसकी बात को अत्यंत ही ध्यानपूर्वक सुनना प्रारम्भ कर देते है। आखिर वह अपनी मित्र मंडली की मुखिया थी। उसकी हिम्मत एवं समझदारी के कारण सभी मित्र उससे अत्यधिक प्रेम जो करते थे।

फूल कुमारी अपने सभी मित्रों जैसे कि प्रियलता, बाहु और गटकु  से सांझ को मदारी के खेल वाले स्थान पर मिलने के लिए कहती है। वह उन्हें समझाते हुए कहती है कि वहाँ आते समय केले और थोड़ा अनाज अवश्य  ही अपने साथ लेते आए। क्यों कि खेल देखने के साथ ही वह उन बन्दरो को केले भी खिलाएंगे और  अनाज उस मदारी को दे देंगे। सभी मित्र फूल कुमारी की ऐसी समझदारी पूर्ण बात से अत्यधिक प्रभावित होते हुए अपना अपना सर हिलाते हुए अपनी सहमति दर्शा देते है। तभी गटकु जो पहले से ही अत्यधिक उत्साहित दिखाई दे रहा था अपना मुह किसी बन्दर के समान फुलाते हुए कहता है कि मैं तो उन मोटे बन्दरो को सारे के सारे केले खिला दूना। देखो देखो में भी बन्दर हु मुझे भी केले खिलाओ, खिलाओ ना। गटकु के इस प्रकार के मसखरेपन से सभी मित्र खिल खिला कर हंसते हुए लोटपोट से हो जाते है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

समाप्त।

प्रकाशित तारीख 12 अगस्त समय दोपहर 4:15 बजे वर्ष 2020

Shankar Madari. Episode 2 With recorded Video!

नमस्कार प्रिय पाठकों एवं श्रुताओ, अभी तक अपने जाना कि किस प्रकार से भव्य झिलमिल नगर में शंकर मदारी का आगमन होता है और वह भव्य झिलमिलमिल नगर की भव्य भव्यता को देख कर किस प्रकार से हैरान होता है। तदोपरांत मुसाफिर खाने का वह कुटिल मुंशी पोपट लाल भाया शंकर मदारी को कैसे रस केसरी की बोतल के एवज में उसको मुसाफिर खाने के पिछवाड़े स्थित एक झोपड़े में ठहरने की अनुमति प्रदान कर देता है।

अब आगे…

आप अत्यंत ही दयावान है। मुंशी को धन्यवाद कह कर शंकर उस कक्ष से बाहर की ओर मूड जाता है।

तभी मुसाफिरखाने का वह मुंशी उसको आवाज़ लगा कर वापस अपने समीप बुलाता है और कहता है कि देख भायो तूने पूरी बात तो सुनी ही कोनी। मैं तने उस राज शाही के शाही बाग के शाही झोपड़े में ठहरा रेहार्यो हु। कोई भाड़ो भी कोनी ले रहयो हु। ठीक से ना भायो। पर तु तो अच्छे से जाने है की आज कल के इस लोभी दौर में कुछ भी मुफ्त कोनी मिल सके है। मुंशी अब अपने छुपे हुए दांत “शंकर” को दिखाता है। तो सुन भायो मैं सीधे सीधे बोल्यो कि मैने तेरे से कोई भाड़ो कोणी चाहिए! हा परन्तु मैने रोज़ की एक बोतल मदिरा वो भी “अनारकली” चाहिए भाया। मुसाफिरखाने के मुंशी की यह बात सुनते ही शंकर तुरंत ही हामी में अपना सर हिला देता है। और मुंशी के बताए अनुसार भव्य झिलमिल नगर के उस विशालकाय मुसाफिरखाने के पिछवाड़े वाले राज शाही बाग के शाही झोपड़े की ओर मुड़ जाता है। 

कुछ ही क्षणों के उपरांत, शंकर मदारी अपने दोनों वानरों सहित मुसाफिरखाने के पिछवाड़े में स्थित, शाही बाग में एक ओर को बने एक मजबूत झोपड़े के भीतर प्रवेश करते हुए; अत्यधिक प्रसन्न दिखाई दे रहा है। ऐसा हो भी क्यों ना! वह भी तो यही चाहता था कि वह किसी ऐसे एकांत स्थान पर ठहर सकें; जहाँ उसको कोई भी अन्य व्यक्ति चाह कर भी परेशान ना कर सकें। वह स्वयं को उस भीड़ भाड़ वाले मुसाफिरखाने में सहज महसूस नही कर पा रहा था। परन्तु यहाँ तो उसको जैसे पंख ही लग गए थे।  तभी शंकर उस शाही बाग में अपने झोपड़े के समीप एक विशालकाय पीपल के वृक्ष से अपने दोनों वानरों को, नही नही माफ कीजिएगा, उनमें से एक नर वानर है तो दूसरी मादा वानर। उन्हें उस विशालकाय पीपल के वृक्ष से बांध कर दो क्षण विश्राम करने हेतु झोपड़े के भीतर बिछी हुई इकलौती चारपाई पर लेट जाता है।

अभी शंकर ने झोपड़े में पड़ी हुई उस एकलौती चारपाई पर लेट कर, दिन भर की थकी हुई अपनी आंखों को मूंदा ही था कि तभी झोपड़े के द्वार पर टँगी सांकल से एक जोरदार दस्तक होती है और शंकर हड़बड़ा कर उठ बैठता है। जैसे ही उसकी दृष्टि द्वार पर पड़ती है तो वह देखता है कि मुसाफिरखाने का वह दुबला पतला मुंशी “पोपट लाल भाया” अपने चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान के साथ खड़ा हुआ है। उसको देखते ही शंकर एक झटके के साथ उस झोपड़े की चारपाई से उठ कर बैठ जाता है। और कुछ हैरान होते हुए उस मुसाफिरखाने के मुंशी से यू इस प्रकार से आने का कारण पूछता है कि “मुंशी जी आप, क्या बात है? क्या कुछ समस्या है?  जिसके प्रतिउत्तर में मुसाफिरखाने का मुंशी एक नाराज़गी भरे स्वर के साथ शंकर से कहता है कि भायो तुम अठे आराम से इस शाही चारपाई पर लेट गयो है। इतना कह कर मुंशी चुप हो जाता है और शंकर को कुछ इस प्रकार से घूरता है कि मानो वह कोई अपराधी हो। मुंशी के यू इस प्रकार के अजीबो गरीब व्यवहार से शंकर कुछ भी समझ नही पाता। तब वह मुंशी से कहता है कि महाराज आप कहना क्या चाहते है! कृपया स्पष्ट रूप से कहिए। क्या मुझ से कोई अपराध हो गया है। यह सुनते ही मुंशी उससे कहता है कि “अपराध की बात करो हो भाया! अठे तो तने माहरी भावनाओं का कत्ल कर दियो है।” 

एक क्षण रुक कर मुसाफिरखाने का वह मुंशी पोपट लाल भाया उसको कुछ स्मरण करवाते हुए कहता है कि “देखो भायो मैने पहले ही कह दियो था कि हम वानरों के साथ अठे किसी मुसाफिर ने कोणी ठहरा सके है। अन्य मुसाफ़िर भय खा सके है ना भाया। जान को घणो खतरों भी हो सके है ना भायो”। मुसाफिरखाने के उस धूर्त मुंशी के ऐसे वचन सुन कर शंकर कुछ घबरा सा जाता है फिर कुछ हौसला बटोरते हुए कहता है कि परन्तु महाराज मैं तो आपकी आज्ञा से ही यहाँ बाग में ठहरा हु और आपने ही तो! अभी शंकर कुछ कह ही रहा था कि तभी मुंशी झुंझलाते हुए उसको बीच मे ही टोक देता है कि देख्यो भाया मैं तने बोल्यो की मैं कोई महाराज कोणी, मैं अठे को मुंशी पोपट लाल हु। मुंशी को अकारण ही इस प्रकार से रुष्ट होते देख शंकर नर्मतापूर्वक कहता है कि मालूम है मुझे, परन्तु मेरे लिए तो आप ही महाराज हो। शंकर मदारी के मुहँ से अपने लिए अत्यंत ही समांजनक शब्दों को सुन कर मुसाफिरखाने के मुंशी पोपट लाल भाया का क्रोध एकदम से काफूर हो जाता है और वह कुछ मुस्कुराते हुए शंकर से कहता है कि देख भाया यो राज़ शाही बाग है अठे रुकने के कुछ नियम कुछ कायदे होवे है।

शंकर अब भी अत्यधिक विनर्मतापूर्वक कहता है कि परन्तु महाराज मेरा मतलब मुंशी जी मैंने तो किसी भी नियम का उलंघन नही किया है। यह सुनते ही मुंशी पोपट लाल भाया कुछ भड़क जाता है और शंकर से कहता है कि थारी सब बात ठीक से भाया पर मेरी बोतल (मदिरा की बोतल) कठे है! तने म्हारी बोतल की कोई परवाह कोनी  है। मुसाफिरखाने के मुंशी के मुहँ से यह सुनते ही शंकर कुछ सहज होते हुए अपने दोनों हाथों को जोड़ कर कहता है कि महाराज अभी तो मैंने सफर की थकान भी नही उतारी! बस एक क्षण को अपनी इस अकड़ी हुई कमर को सीधा ही किया था कि आप आ गए। तभी मुंशी पुनः कुछ क्रोधित होते हुए “तू कहना के चाहवे है भाया” कि मैं अठे कोणी आ सकू। मुंशी को पुनः क्रोधित होते हुए देख कर शंकर कुछ घबरा जाता है और उसी प्रकार से अपने हाथों को जोड़ कर अत्यंत ही विनर्मतापूर्वक कहता है कि नही नही महाराज, मैं तो यह कह रहा हु की आपने क्यों तकलीफ उठाई जबकि मैं स्वयं ही मदिरा की बोतल को लेकर आपके समुख उपस्थित होने ही वालयो था मेरा मतलब आपके समुख आने वाला था। मुंशी “ठीक से ठीक से भाया” मैने तो पहले वही मालूम था कि तू भूल्यो कोणी। मैं उठे ही बैठ्यो हु। शंकर से मदिरा का अस्वाशन प्राप्त कर मुंशी वहा से पुनः मुसाफिरखाने की ओर चला जाता है। 

मुसाफिरखाने के मुंशी के मुहँ से मदिरा की बात सुनकर शंकर के शरीर मे भी सैकड़ो मदिरा पिआसु कीड़े बुलबुलाने लगते है। तब वह एक क्षण भी गवाए बिना समीप के घड़े से एक हंडिया जल ग्रहण कर के शाही बाग के उस झोपड़े से बाहर निकल जाता है। परन्तु मदिरालय की ओर जाने से पूर्व, वह अपने उन दोनों वानरों से कुछ वर्तालाप करते हुए कि ‘क्यों बहुत मज़ा आ रहा है ना! यहाँ तो तुम्हारी मौज हो गई “भैरो”और “बिजली” तू तो बहुत ही प्रसन्न दिख रही है। “भैरो”और बिजली उसके वानरों का नाम था। भैरो नर वानर का नाम और बिजली मादा वानर का नाम था। शंकर अभी अपने वानरों के साथ हँस बोल कर उन्हें कुछ सामान्य महसूस करवा ही रहा था कि तभी उसको मुसाफिरखाने के मुंशी पोपट लाल भाया की बात स्मरण (याद) हो जाती है कि “भायो मेरी बोतल।” यह बात ध्यान में आते ही शंकर मुसाफिरखाने के बाहरी द्वार की ओर मुड़ जाता है। जहाँ हर ओर मदहोश कर देने वाली भव्य झिलमिल नगर की रंगीन मदिरा की वह मादक महक बिखरी हुई थी।

अब तो शंकर कुछ बेकाबू सा होते हुए मुसाफिरखाने के ठीक सामने वाले भव्य झिलमिल नगर के एकलौते मदिरालय के भीतर प्रवेश कर जाता है। मदिरालय के भीतर प्रवेश करते ही उसकी दृष्टि में एक अजीब सा नशा दिखने लगता है। वहाँ हर ओर उसको रंगीन मदिरा का पान करते हए मदिरा प्रेमी ही दिखाई दे रहे थे। इससे पहले की वह कुछ समझ पाता कि तभी मदिरालय का एक कर्मचारी उससे कुछ कहते हुए कि “साहब”। यह सुनते ही शंकर को कुछ चेतना आती है और वह उस मदिरालय के कर्मचारी से कहता है कि हा, एक बोतल संतरा और एक अंगूर वाली “अनारकली” दे दो। हा ध्यान रहे मैं कोई अनजान नही हु! रोज़ का ठेला है मेरा। मुझे एकदम तेज़ और असली मदिरा ही देना। मदिरालय का कर्मचारी “साहब यहाँ सिर्फ तेज़ और असली ही मिलती है। क्या आप मुसाफ़िर हो?” शंकर कुछ हड़बड़ाते हुए नही नही मैं यहाँ आता जाता रहता हूं। मुसाफिरखाने का मुंशी मेरा जानकर है। मुझे धोखा देने का प्रयास मत करना। शीघ्रता से संतरे और अंगूर की “अनारकली” एकदम तेज़ वाली मदिरा दे दो। मदिरालय का कर्मचारी कुछ सहज भाव से जी, जी साहब अभी लीजिए। एकदम ताज़ा और तेज़ है। शंकर मदिरालय से मदिरा की दो बोतल मदिरा ले  कर मदिरालय से बाहर निकल जाता है। 

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

प्रकाशित तारीख 10 अगस्त समय 3:50 वर्ष 2020

शंकर मदारी। एपिसोड 2

रक्षा बंधन।

भाव-व्यवहार में है जो सबसे प्यारा, रक्षाबंधन का त्यौहार निराला।

रक्षा बंधन।

एक धागा, एक दुआ है जो, रिश्ता ये प्यार का ह्र्दय भाव से सबसे प्यारा।।

हर नारी, हर एक कन्या, उनके हर एक आँचल से, बरसता अमृत है जो।

वो ममता, वो स्नेह, मिलता है हर भाई को, एक आशीर्वाद अनमोल है जो।।

खिल खिलौने, मिठाईओ से भी मीठा, एक वरदान जीवन का जीवन जीवन से जीवन को जो।

मां सी ममता, मित्र सी मित्रता, ज्ञान गुरु सा वो, बहन हर भाई को प्यारी जो।।

रहे खुशहाल, आबाद हमेशा, महकती फुलवारी जीवन की उसकी, प्यारी है हर भाई-मुझ-को जो।

दुख तकलीफ़, हर काटा जीवन से गम ज़िन्दगी का उसके, यही दुआ है मिल जाए हर भाई-अब मुझको वो।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

Hindi Poetry, Shayari & Story Article’swriterpoetvikrantrajliwal-

शंकर मदारी। (ह्रदय को छूती हुई एक रोमांचक कहानी।)

                   

आज आपके अपने विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित दूसरा ऑनलाइन उपन्यास शंकर मदारी। (ह्रदयको छूती हुई एक रोमांचक कहानी) का पहला भाग प्रकाशित किया जा रहा है। जल्द ही आपके पढ़ने के लिए दूसरा भाग भी प्रकाशित कर कर दिया जाएगा। इसीलिए अधिक से अधिक आप सभी आपके अपने “शंकर मदारी।” episode 1 को like और share कीजिए। साथ ही YouTubeचैनल Poet Vikrant Rajliwal को सब्स्क्राइब करना ना भूलिएगा। धन्यवाद। विक्रांत राजलीवाल।

शंकर मदारी।

               (एक लघु उपन्यास)

“ह्रदय को छूती हुई एक अत्यधिक रोमांचक कहानी।”

 कहानी।

“झिलमिलाती आंखों में है अक्स यादों के दर्द कई,  हर लम्हा तड़पती है जिंदगी, देख अक्स जिंदगी का खुद जिंदगी।”

“एहसास टूट कर करते है दर्द एहसासों का बयाँ,  आज भी मुस्कुरा कर मिलती है करीब सेखुद जिंदगी से जब जिंदगी।”

“वो एक आह साथ है आज भी हमारे, वो एक दर्द जो आह से है भरा।”

झिलमिल नगर अपने समय का एक भव्य नगर था। सुना है उस भव्य नगर झिलमिल में प्रत्येक व्यक्ति धनी एवं शाही सुख सुविधा से पूर्णतः सम्पन्न था। यह कहना अत्यधिक कठिन था कि भव्य झिलमिल नगर अपने राजशाही भव्यता से अधिक भव्य था या अपने मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य से! भव्य नगर के एक ओर ऊँचे ऊँचे विशालकाय मनमोहक पर्वत थे और उनसे मध्य से झिलमिला कर गिरते हुए दुग्ध रंग के विशालकाय झरने। वही दूसरी ओर हरे भरे घनघोर वन और वन से सटे नगर के धनी साहुकारों के समृद्ध बाग बगीचे। इन सब प्राकृतिक सौन्दर्य को चार चांद लगती हुई झिलमिल नगर की कल कल छल छल करते हुए, बहती हुई,  मशहूर झिलमिल दरिया। जो ऊँचे पर्वतों से झिलमिला कर गिरते हुए दुग्ध रंग के झरनों के बहते जल से मिल कर बनी थी और जो हरे भरे वन के बीचों बीच से गुजरते हुए; भव्य झिलमिल नगर के धनी साहुकारों के उन समृद्ध बाग-बगीचों को सींचते हुए;भव्य नगर को छूते हुए दक्षिण दिशा में बहती थी। सम्पूर्ण झिलमिल नगर इसी झिलमिल दरिया के शीतल-मीठे जल से अपनी प्यास को तृप्त करता था। इसी कारण इस झिलमिल दरिया की महिमा अत्यधिक मूल्यवान हो जाती है।

वही भव्य झिलमिल नगर के धनी लोग सदियों से अपने अत्यधिक सौम्य स्वभाव के कारण दूर दूर के राज्यो तक एक विशिष्ट सम्मान के पात्र सिद्ध होते आए थे। आखिर ऐसा हो भी क्यों ना! वह दौर था भव्य झिलमिल नगर की असीम भव्यता और शान ओ शौकत का। जिसका उस दौर में हर कोई कायल था। भव्य झिलमिल नगर का वासी होना अर्थात अपने आप मे ही यह कोई विशिष्ट उपाधि से कम ना था। इतना सब कुछ होने के बाबजूद भव्य झिलमिल नगर के निवासी अपने अत्यधिक सौम्य व्यवहार के लिए जग विख्यात थे। सुना है उस दौर में भव्य झिलमिल नगर में प्रत्येक स्थानीय निवासी किसी धना सेठ से कम ना था। दूर दूर राज्यो से कई व्यपारी-सौदागर, मजदूर और कलाकार भव्य झिलमिल नगर की भव्यता के किस्से सुनकर वहाँ अपने व्यपार और कला का प्रसार करने आते और इनाम में मुह मांगा दाम और बहुमूल्य पारितोषिक पाते।

एक ओर जहा भव्य झिलमिल नगर अपनी राज शाही भव्यता और धन संपदा के लिए जग विख्यात था; वही दूसरी ओर धन संपदा से पूर्णतः परिपूर्ण होने के बाबजूद वहाँ के प्रत्येक निवासी अत्यधिक कठोर परिश्रम करते थे। शायद इसी कारण मंदी के दौर में भी राज शाही भव्य झिलमिल नगर अपनी भव्यता में दिन दूनी रात चौगनी बढ़ोतरी प्राप्त कर सम्पूर्ण संसार को हैरान किए  हुए था। अरे एक ख़ास विषय तो मैं आपको बताना ही भूल गया! जी हाँ आपने सही ही समझा वह ख़ास विषय है राज शाही भव्य झिलमिल नगर के मासूम बालक। जी हाँ बालक! बालक चाहे राज शाही भव्य झिलमिल नगर के हो या किसी दरिद्र मलिन बस्ती के; बालक तो बालक ही होते है। एक ओर कठोर परिश्रम करने वाले भव्य झिलमिल नगर के धनी निवासी तो दूसरी ओर राज शाही भव्य झिलमिल नगर के विश्व विख्यात शिक्षा गुरुकुल में उच्च कोटि की शिक्षा ग्रहण करते वहाँ के अत्यधिक सौम्य और मासूम बालक।

इसी प्रकार से नित्य प्रतिदिन की क्रिया और प्रतिक्रियाओं को दोहराते हुए, कला साहित्य से सम्बंधित दूर दराज के विद्वानों एवं कलाकरों से मनोरंजन प्राप्त कर उन्हें मुह मांगा पारितोषिक देते हुए भव्य झिलमिल नगर के राज वंशियों एवं सेठ-साहूकारों समेत वहा के निवासियों के दिन सुख शांति से गुजरते हुए व्यतीत हो रहे थे। हर कोई अपने आप मे पूर्णतः सन्तुष्ट और प्रसन दिखाई देता था। फिर एक रोज़ की बात है समय यही कोई दोपहर और सांझ के मध्य का ही रहा होगा। कि तभी सम्पूर्ण झिलमिल नगर डमरू की एक तीव्र ध्वनि से गूंज उठता है। और चारो दिशा एक स्वर गूंज उठता है कि आ गया, आ गया, देखो एक मदारी अपने दो बन्दरो के साथ आ गया। यू इस प्रकार से भव्य झिलमिल नगर में एक नए उत्साह की लहर दौड़ जाती है। क्या तो बच्चे और क्या  बूढ़े और जवान! हर कोई उस मदारी के आगमन से अत्यधिक उत्साह से भर जाता है।

आज बहुत समय के उपरांत यू अचानक से भव्य झिलमिल नगर के व्यवस्त और व्यस्त जीवन शैली में एक बहुत ही रोमांचक और मनोरंजक परिवर्तन सहज ही उतपन हो गया था। उस मदारी के उन दो नटखट बन्दरो को देख कर बच्चों का तो हँस हँस कर बुरा हाल था। वही नवयुवक तो उन बन्दरो को देख कर खुद बन्दर हुए जा रहे थे। कभी तो वह उन्हें देख कर किलकारी मारते तो कभी सीटियां। जिसके प्रतिउत्तर में वह दोनों बन्दर जिनमे से एक बन्दरिया थी बहुत ही जोरदार तरीके से अपने उन बड़े बड़े दांतो को दिखाते हुए किटकिटाने लगते थे।

अभी वह मदारी नगर के मुख्य द्वार से होते हुए मुख्य बाजार से गुज़र ही रहा था कि तभी नगर के दरोगा “हकड़ सिंह” अपने बड़े से चेहरे पर स्थित अपनी उन बड़ी बड़ी नुकीली मूछों को ताव देते हुए उस अंजान मदारी को रोकते हुए एक कड़क आवाज़ से कहता है कि “ए रुको कहा जा रहे हो।?” एकदम से नगर दरोगा हकड़ सिंह के उस विशालकाय शरीर को अपने समीप देख कर और उसकी उस रोबदार आवाज़ को सुन कर वह मदारी अत्यधिक भयभीत होते हुए जहां का तहा ही रुक जाता है।

तब नगर दरोगा हकड़ सिंह पुनः उस पर अपना रोब गाड़ते हुए कि तुमने बताया नही कि कहा जा रहे हो! और नाम क्या है तुम्हारा? तब वह मदारी अत्यधिक विन्रमता के साथ कहता है कि जी साहब मेरा नाम शंकर है। “शंकर मदारी” और मै पड़ोस के राज्य खैरात गंज से यहाँ इस भव्य नगर में अपना खेल तमाशा दिखाने के वास्ते आया हु। अभी वह मदारी ‘”शंकर” नगर दरोगा के सवालों का जबाब दे ही रहा था कि इतने ही समय में उसके इर्द गिर्द , चारों ओर एक भीड़ सी जमा हो जाती है और  उस भीड़ में शामिल हर व्यक्ति यही कह रहा था कि तमाशा दिखलाओ, तमाशा दिखाओ, तमाशा दिखलाओ।

नगर निवासियों का ऐसा उत्साह देख कर नगर दरोगा हकड़ सिंह स्थिति को बेकाबू होने से पूर्व ही, एक बार पुनः बीच मे अपना दखल देते हुए उत्साही नगर निवासियों को समझाते हुए कहता है कि कृपया आप सभी समानित नगर जन शांत हो जाए। अभी तो इस मदारी का भव्य झिलमिल नगर में आगमन हुआ ही है जल्द ही राज आज्ञा पत्र प्राप्त करने के उपरांत यह अपना खेल तमाशा भी दिखायेगा। परन्तु अभी के लिए आप इसको मुसाफिरखाने की ओर प्रस्तान करने दीजिए। भव्य झिलमिल नगर के कड़क दरोगा हकड़ सिंह की बात सुनकर वह भीड़ तीतर बितर हो जाती है।

तदोपरांत नगर दरोगा हकड़ सिंह एक कड़क आवाज़ के साथ उस मदारी से रूबरू होते हुए उससे कुछ वार्तालाप करता है कि “देखो मदारी ऐसा प्रतीत होता है कि तुम पहली बार भव्य झिलमिल नगर में अपना तमाशा दिखाने के लिए आए हो।” नगर दरोगा की ऐसी रौबदार आवाज़ और गठीला शरीर देख कर वह मदारी जिसका नाम शंकर था कुछ अधिक ही भयभीत हो जाता है। तब खुद को कुछ सम्भालते हुए वह कहता है कि जी साहब, मैंने भव्य झिलमिल नगर की भव्यता और यहाँ के चकाचोंध कर देने वाले शाही बाजारों की चर्चा को बहुत बार सुना था। यहाँ के महान राजवंश के दानी व्यक्तित्व की ख्याति तो दूर दूर तक विख्यात है। इसीलिए मैं भी अपना खेल तमाशा दिखाने के लिए बहुत दूर से चल कर यहा आया हु।

तब नगर दरोगा हकड़ सिंह अपनी रोबीली मुछो पर ताव देते हुए शंकर मदारी से कहता है कि हु ठीक है परन्तु ध्यान रहे राजदरबार से आज्ञा पत्र प्राप्त करने के उपरांत ही तुम भव्य झिलमिल नगर में अपना खेल तमाशा दिखा सकते हो। उसके बिना कदापि नही। इसके प्रतिउत्तर में शंकर मदारी बहुत ही सहज भाव के साथ कहता है कि जी हजूर। जैसी आपकी आज्ञा। शंकर मदारी के द्वारा यू आदर पूर्वक हाथ जोड़ कर ऐसे सम्मानपूर्वक वचनों को सुनकर नगर दरोगा हकड़ सिंह अत्यंत ही प्रसन्न हो जाता है और उसके उस विशालकाय भद्दे चेहरे पर एक मुस्कान की लहर चमकने लगती है। तब शकर पुनः कुछ हिम्मत जुटा कर अत्यंत ही आदर के साथ उससे कहता है कि महाराज कृपया कर के अब मुसाफिरखाने का मार्ग भी बता दीजिए। लगातार कई हफ़्तों के इस थका देने वाले सफर के उपरांत अब मेरा रोम रोम सफर की थकान के दर्द से कराह रहा है। 

शंकर के इस प्रकार अत्यधिक आदरपूर्वक पूछने पर भव्य झिलमिल नगर का वह नगर दरोगा बहुत ही सहजता के साथ मुस्कुराते हुए शकर मदारी से कहता है कि देखो मदारी यहाँ से तुम सीधे हाथ को मुड़ जाना तदोउपरांत दो चौराहों से गुरते हुए तुम बाई ओर को मुड़ जाना। उसी मार्ग पर शहर की एकमात्र मदिरालय है। इतना कह कर नगर दरोगा चुप हो जाता है तब शंकर मदारी कुछ हड़बड़ाहट पूर्वक कहता है कि परन्तु महाराज मुझ को तो मुसाफिरखाने में जाना है। तब नगर दरोगा हकड़ सिंह पुनः अपनी रोबीली मुछो पर ताव देते हुए कहता है कि हा भी हा मालूम है मैंने तुम्हें मुसाफिरखाने का ही पता बताया है। तब शंकर मदारी अत्यंत ही विन्रमता पूर्वक कुछ डरते डरते कहता है कि परन्तु महाराज आप ने तो मदिरालय का मार्ग बताया है। यह सुनते ही नगर दरोगा हकड़ सिंह जोर जोर से हंसने लगता है और उसी प्रकार से हंसते हुए कहता है कि भाई उस रंगीन मदिरालय के ठीक सामने ही तुम्हारी मंजिल है यानी कि मुसाफिरखाना। इतना कह कर नगर दरोगा उसी प्रकार से जोर जोर से हंसते हुए, शंकर मदारी को वहाँ अकेला छोड़ कर, वहाँ से चला जाता है। नगर दरोगा के ऐसे व्यवहार से पहले तो शंकर मदारी कुछ हैरान होता है फिर स्वयं भी हंसने लगता है और भव्य झिलमिल नगर के रंगीन मदिरालय मेरा मतलब “मुसाफिरखाने” की ओर परस्थान कर जाता है।

वही दूसरी ओर भव्य झिलमिल नगर एक धनी किसान बिरजमोहन के घर मे उसकी एक लौटी 8 वर्षीय पुत्री फूल कुमारी भोजन हेतु बैठी ही थी कि तभी घर के द्वार पर फूल कुमारी के मित्र मंडली के मित्र एक जोरदार दस्तक लगाते हुए उसको पुकारते है कि “फूल कुमारी” अरे फूल कुमारी क्या तुम घर पर ही हो? जिसके प्रतिउत्तर में फूल कुमारी भोजन से उठ कर तुरन्त ही घर के द्वार की ओर दौड़ पड़ती है और उसकी माता विपाशा देवी उसको आवाज लगा कर रोकने का प्रयत्न करते हुए कि फूल बेटी फूल रुक जाओ। भोजन तो कर लो। यह लडक़ी भी ना; कभी किसी की कोई बात नही सुनती। उधर घर के द्वार पर फूल कुमारी के मित्र मंडली के मित्र अत्यंत ही उत्साही दिख रहे है। उनको यू इस प्रकार से उत्साह में देख कर फूल कुमारी भी कुछ उत्साहित होते हुए उनसे कहती है कि आज तो तुम सब के सब बहुत ही उत्साह में नज़र आ रहे हो। क्या कोई भूत देख लिया है तुमने। इतना कहते हुए फूल कुमारी खिलखिलाकर हंसने लगती है। तभी उसकी मित्रमण्डली में से एक मित्र बाहु प्रताप उसी प्रकार से उत्साहित होते हुए कहता है कि नही नही “फूल” भूत नही बल्कि भूत से भी बढ़कर कुछ देख लिया है आज हम सब ने। कहो तो तुमको भी दिखला दे। इतना कह कर पुनः सब मित्र एक साथ हंसने मुस्कुराने लगते है।

तब फूल कुमारी उनसे उनके इस प्रकार के उत्साहित होने का कारण पूछती है कि ” अच्छा बाबा अब बता भी दो न की ऐसा तुमने क्या देख लिया है जो तुम यू इस प्रकार से हवा में उड़ रहे हो। तब फूल कुमारी की एक बेहद खास सखी प्रियलता अत्यधिक उत्साह के साथ कुछ कहते हुए कि फूल आज हमने वहाँ बड़े बाजार में एक मदारी को देखा और उसके साथ दो विशालकाय बन्दर भी थे। हम तो उन्हें देखकर बहुत ही डर गए थे। यदि तुम वहाँ होती ना तो देखती वह बन्दर आदमियों जितने बड़े दिखाई देते थे। प्रियलता के यह कहते ही सभी मित्रमण्डली उसकी सहमति में हामी भरते हुए अपना सिर हिला देते है।  अपने मित्रो के मुह से यह सुनते ही फूल कुमारी भी अत्यधिक उत्साहित हो जाती है और वह उसी उत्साह के साथ कहती है कि  अच्छा तो उस मदारी के बन्दर इतने विशालकाय है। चलो तो मैं भी देखती हूं कहि तुम मुझे मुर्ख तो नही बना रहे हो। तभी गटकु बहुत ही मसुमियर के साथ कुछ कहता है कि नही नही “फूल” भला हम तुमसे असत्य क्यों कहने लगे। हम सत्य कह रहे है वह बन्दर बहुत ही भयानक दिखाई देते थे। परन्तु तुम अभी उन्हें नही देख सकती हो क्यों कि उसको नगर दरोगा ने पकड़ लिया था और उसको राज शाही से आज्ञा प्राप्त करने के लिए कहा गया है उसके बाद ही वह बाजार में अपना खेल तमाशा दिखा सकता है।

अभी फूल कुमारी अपने मित्र मंडली से उस अनजाने मदारी और उसके उन भयानक विशालकाय बन्दरो के विषय मे बात कर ही रही थी कि तभी उसकी माता विपाशा देवी उनके समीप पहुच कर फूल कुमारी से कुछ कहती है कि बेटी फूल वहा भोजन की थाली ठंडी होने को है तुम अपने मित्रों के साथ फिर कभी वार्तालाप जर लेना परन्तु अभी पहले भोजन ग्रहण कर लो। भोजन से यू इस प्रकार से बीच मे नही उठते इसे अन्न देवता का अपमान समझा जाता है। तब फूल कुमारी अपने मित्रों से कल विद्यालय में सम्पूर्ण किस्सा विस्तार से बताने के लिए कहते हुए उन्हें विदा दे देती है और अपनी माता के साथ भोजन ग्रहण करने हेतु घर के भीतर प्रवेश कर कर जाती है।

उधर शंकर मदारी नगर दरोगा हकड़ सिंह के जाते ही! अपने हाथ ठेले पर अपने खेल तमाशे का समान लादे और उन पर सवार अपने उन दो हृष्ट-पुष्ट वानरों को खिंचते हुए, भव्य झिलमिल नगर के मुसाफिरखाने की ओर चल देता है। हर बढ़ते कदम से भव्य झिलमिल नगर की उस शाही भव्यता को देख कर, शंकर की आंखे चौंधिया रही थी। और वह अनुमान लगाने लगा कि यहां (भव्य झिलमिल नगर) तो भिखारी भी स्वर्ण पात्र (सोने का कटोरा) में भिक्षा लेते है। यदि मुझे राज शाही की ओर से तमाशा दिखाने की अनुमति प्राप्त हो जाती है तो मेरी चारो उंगलियां चाशनी के कढ़ाए में और सिर देशी घी से सरोबार (अच्छे से भीगा हुआ) हो जाएगा। अर्थात खेल तमाशा दिखा कर वह बहुत सा धन एकत्रित कर सकता है और ऐसा भी हो जाए तो कोई हैरत ना होगी कि कोई नगर सेठ या धनी साहूकार उसको उसके तमाशे से प्रसन्न हो कर बहुमूल्य स्वर्ण मुदिरा ही भेंट दे दे। इस प्रकार से शंकर अपने स्वप्न लोक में डुबकी लगाते हुए चले जा रहा था और इसी प्रकार से वह भव्य झिलमिल नगर की चकाचौंध कर देनी वाली शाही भव्यता को निहारते हुए; कुछ ही समय के उपरांत वह नगर के मुसाफिरखाने के ठीक सामने पहुच जाता है।

जहाँ चारो और नगर की इकलौती मदिरालय की उस मदहोश कर देने वाली रंगीन मदिरा की मदमस्त महक बिखरी हुई थी। जिसकी सुगंध से शंकर सहज ही वहाँ पहुच कर ठहर गया था और अपने स्वप्न लोक से निकल कर वह वास्तविक संसार में आ गया था। अब शंकर का ध्यान मुसाफिरखाने की और जाता है। वह एक अत्यधिक विशालकाय इमारत थी। जिसके प्रवेश द्वार पर एक ढाबे के समान ही भोजन करने हेतु एक भोजनालय भी खुला हुआ था। ढ़ाबे से आती हुई स्वादिष्ट मसालेदार भोजन की सुगंध को सूंघ कर शंकर को अत्यधिक तीव्र भूख लग आई थी। तब शंकर आसमान की ओर निहारते हुए स्वयं से ही बड़बड़ाते हुए कहता है कि वाह मेरे मालिक क्या सुयोजित व्यवस्था है। विश्राम करने हेतु विशालकाय मुसाफिरखाना! मुसाफिरखाने से सटा स्वादिष्ट मसालेदार भोजन से पूर्ण भोजनालय और भोजनालय के ठीक सामने रंगीन मदिरा का राज शाही मदिरालय। वाह मजा आ गया। अब सर्वप्रथम तो मैं इस विशालकाय मुसाफिरखाने में अपने ठहरने और विश्राम करने हेतु एक कक्ष (कमरा) भाड़े पर ले लू। तदोउपरांत इस भोजनालय के स्वदिष्ट भोजन और इस भव्य झिलमिल नगर की इस मदिरालय की मदहोश कर देने वाली रंगीन मदिरा का आनन्द लिया जाएगा।

इतना विचार करते ही शंकर अपने हाथ ठेले को मुसाफिरखाने के बाड़े में, जहाँ मुसाफिरखाने के मुसाफिरों के अश्व आदि को बांधने की व्यवस्था थी; वहाँ पर खड़ा कर के मुसाफिरखाने के भीतर प्रवेश कर जाता है। मुसाफिरखाने के भीतर का दृश्य देख कर शंकर के होश उड़ जाते है। अंदर चारो ओर दूर दराज के मुसाफ़िर अपनी अपनी रंग रँगीली वेश भूषा में चहल कदमी कर रहे थे। उन्हें देख कर सहज ही यह अनुमान होता था कि यह वाला मुसाफ़िर व्यपारी होगा और यह वाला कोई योद्धा। हा यह तो कोई रंगमंच का कलाकार ही हो सकता है और यह जो उसके बाजू से होकर अभी गुजरा है ना! यह तो अवश्य ही किसी सेठ का नोकर ही लगता है। इस प्रकार से शंकर एक दृष्टि से उन मुसाफिरखाने के मुसाफिरों की वेश भूषा और हाव भाव से उनके व्यवसाय का अनुमान लगाते हुए, मुसाफिरखाने के मुंशी कार्यालय के भीतर प्रवेश कर जाता है। जहाँ एक दुबला पतला सा व्यक्ति अपनी मोटी मोटी आंखों पर एक दुबला सा ऐनक लगाए बैठा था।

उसको देख कर ऐसा प्रतीत होता था कि अवश्य ही यह कोई कुटिल स्वभाव (अपने मे चालाक) का एक धूर्त व्यक्ति है। उसको देखते ही शंकर मदारी अपने दोनों हाथों को जोड़ कर नमस्कार करता है “नमस्कार मोहदय” शंकर की आवाज़ सुनते ही मुंशी जो अभी कुछ समय पूर्व तक मुसाफिरखाने के हिसाब किताब की जांच पड़ताल कर रहा था। अकस्मात ही चौक जाता है। परंतु यह अनुमान लगाना अत्यधिक दुर्लभ था कि वह शंकर की आवाज़ से अधिक चौक गया था या उसके कंधों पर बैठे हुए उसके उन दो वानरों को देख कर। एक क्षण रुक कर स्वयं को संभालने के उपरांत मुंशी कुछ चोकते हुए कहता है कि अरे अरे! यहा कहा घुसे जा रहे हो भाई। यह कोई खेल तमाशा दिखाने का स्थान कोणी है। चलो कठे ओर कहि जाकर अपना तमाशा दिखाओ। ये य य ये वानरों को दूर रखो मुझ से। तब शंकर अत्यधिक नर्मतापूर्वक कहता है कि महाराज मैं शंकर हु एक मदारी।

यह सुनते ही मुंशी उसको अपने उस मोटे से चश्में में से ऊपर से निचे तक घूर कर देखते हुए कहता है कि कौन शंकर भाया? मैं तो ना जानो किसी शंकर ने मदारी ने। कौन देश से आयो है तू? तब शंकर मुसाफिरखाने के मुंशी को बताता है कि महाराज मैं दूर देश खैरात गंज से आयो हु, मेरा मतलब है कि आया हु। यहाँ अपना खेल तमाशा दिखाना के लिए। यदि एक कक्ष मिल जाता तो मैं अपने सफर की थकान उतार लेता। शंकर की बात सुनकर मुंशी अपने चश्मे के पीछे से उसको देखते हुए बताता है कि देख भाया पहले तो मैं महाराज कोनी अठे को “मुंशी हु” और दूसरी बात यह है कि मैं तने तो कक्ष दे सकू हु परन्तु! शंकर कुछ परेशान होते हुए “परन्तु क्या महाराज़” मेरा मतलब मुंशी जी? मुंशी अब भी उसी प्रकार से “देख भाया मैं तने तो कक्ष दे सकू हु परन्तु तेरे ये वानर! ना भाया ना; मने दूसरे मुसाफिरों का भी ध्यान रखणो है अठे। यह सुनते ही शंकर कुछ हड़बड़ा सा जाता है फिर स्वयं को कुछ संभालते हुए लगभग रुआँसे से स्वरों से कहता है कि मुंशी जी आप तो बहुत ही दयालु है। हम जैसे मुसाफिरों के लिए तो आप ही राजा धी राज साक्षात महाराज हो। आप चाहे तो क्या नही हो सकता! कृपया कुछ दया कीजिए। भला मैं अपने इन दो मासूम वानरों को लेकर कहा जाऊंगा। दया करें महराज।

शेष अगले भाग में। (continue with Episode no 2)

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

प्रकाशित दिन 25 जुलाई समय 1:18 am 2020

मोहब्ब्त।/Love (Mohabbat)

वो आए पहलू में कुछ देर बैठे मुस्कुराए और फिर रूठ कर चल दिए, हम दीवानों सा उन्हें फिर भी पहलू में ढूंढते रहे।

They came in the aspect, Sitting for a while smiled and then walked away, We continued to look for them in the aspect like crazy

हर निशान उनके, जुदाई की एक दास्तान बयान करने लगे, जो मोहब्बत कभी मुकम्मल ना हो सकी, निशान अश्क के मुकम्मल अब भी उसे करते रहे।।

मोहब्ब्त।/Love(Mohabbat)

Every mark is his, They started telling a story of separation.The love could never be fulfilled.Mark continued to do Ashkam’s success.

धड़कता दिल सीने में अब पत्थर का कोई एहसास मालूम होता है, हर धड़कन तड़पती है मेरी, दिल पत्थर का जब उन्हें पत्थर सा करता है।

The throbbing heart in the chest now feels like a stone, Every beating is mine, The heart turns to stone when it turns into a stone.

बदलता मौसम करता है कोशिश! बदलने का मोहब्बत की हमारे मौसम, हमने रखा है सलामत सेहरा में भी दम तोड़ती मोहब्बत का हमारे मौसम!।।

Changing weather makes us try! Our seasons of love change! We have kept it safe even in the desert Our season of love dies.

नजदीक हर सांस से होता है जो महसूस, खो गया जो महबूब रेले में दुनिया के कहि।

एहसास उसका आज भी है धड़कनों में, खो गया जो महबूब रेले में दुनिया के जो कहि।।

विक्रांत राजलीवाला द्वारा लिखित।

Nearly every breath that is felt, Lost in Mahboob Rayleigh to the world.
Realize that even today, who is lost in his heart, what he says in the world in Mehboob Rayleigh.

Written by Vikrant Rajliwal
प्रकाशित समय 9 जुलाई वीरवार वर्ष 2020 3:05 बजे।

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मोहब्बत।/Love (Mohbbat)

🖤 The Reality.

🕊️ Birds knows the principle of this world, the same person is alive here who has also shed his blood to save himself. Who’s mother, who’s father is here? The one who has power is the same mother, the same father is here.

There are a lot of bookish things in this wild world, asul, ideal is found in many examples in this world. But the truth is that the dagger is bloody in the hand and the mask on the face stands silently for shame! Friend has wealth in his pocket, his corruption flourishes in the shadows.

A Mantra

If you kill humanity, then do it in such a way that humanity itself becomes ashamed. Every evidence and witness should be your slave. Never see the truth come out! No matter whoever is in power, you should never get off the mask.

Written by Vikrant Rajliwal

Vikrant Rajliwal

🖤 हक़ीक़त।

🕊️ पंछी जानता है इस दुनिया का असूल, यहाँ वही जिंदा है जिसने खुद को बचाने के लिए अपनो का लहू भी बहाया है। कौन माँ, कौन बाप है यहाँ? जिसकी सत्ता है वही माई है वही बाप है यहाँ।

किताबी बातें बहुत होती है इस वहशियाना संसार में, असूल, आदर्श कि मिलती है मिसालें बहुत इस संसार मे। परन्तु सत्य है कि हाथ मे खंजर खूनी और चेहरे पर नकाब शराफत का लिए खामोशी से खड़ा है! मित्र है दौलत जेब मे उसकी, साए में फलता फूलता है उसके भ्र्ष्टाचार।

एक मंत्र।

करू कत्ल इंसानियत का तो ऐसे करू कि खुद इन्सानियत भी शर्मशार हो जाए। हर सबूत और गवाह खुद तुम्हारे गुलाम हो जाए। देखना सत्य कभी भी बाहर ना आने पाए! सत्ता किसी की भी हो, नकाब चेहरे से तुम्हारे कभी उतरने ना पाए।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

विक्रांत राजलीवाल।