Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतंत्र लेखक-

काव्य-नज़्म, ग़ज़ल-गीत, व्यंग्य-किस्से, नाटक-कहानी-विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।-स्वतंत्र लेखक-

Apr 18, 2019
Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal -स्वतंत्र लेखक-

no comments

🌌 स्वप्न ड़ोर। // 🌌 Dream rope

FB_IMG_1505927934788 (1)रात की कालिमा में खिल जाए निंद्रा ये तुम्हारी।

देखो स्वप्न सुहावने भूल कर हर परेशानी ये ज़िंदगानी।।

साथ खुशियां है ख़िलखिलाती हर मुस्कुराहट ये मासूम सी तुम्हारी।

उड़ चलो पार निल गगन के ड़ोर स्वप्न साथ है कल्पनाओं की तुम्हारी।।

इसी एक एहसास के साथ आप सभी मित्रजनों को पुनः 🌌शुभरात्रि।
विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
ब्लॉग साइट पर प्रकाशित समय 18/04/2019 at 8:20 pm

🌌 Good night friends,

Nindra is blooming in the Kalima of the night.

Do not forget to forget the dream, every trouble is alive ..

I am happy with all the smiling smile that you are innocent.

Let’s fly cross nil gagan’s dream dream is along with your fantasies ..

With this one realization, all the friends will be happy 🌌 Good Night friend’s.
Written by Vikrant Rajliwal
Published on 18/04/2016 at 8:20 pm

Advertisements

Apr 18, 2019
Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal -स्वतंत्र लेखक-

no comments

ज़िन्दगी।

कुछ लम्हो को ज़िन्दगी से लहुलुहान चुरा कर लाया हूं ज़िन्दगी।

हर सितम ज़िन्दगी से खुद जिंदगी को तबाह कर आया हु ज़िन्दगी।।

उन्होंने जो कहा ही नही उस को भी सुन कर आया हु ज़िन्दगी।

हर एहसास रूह से अपने मिटा कर उनके आया हु ज़िन्दगी।।

ये वख्त बदल सकता है हर एहसास बदल जाएंगे एक रोज़ ज़िन्दगी।

बदलते वख्त से भी रहेंगे कायम धुंधलाते हर निसान ए ज़िन्दगी।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

18/04/2019 at 4:50 IMG_20190409_090855Logopit_1554967719051pm

Apr 18, 2019
Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal -स्वतंत्र लेखक-

no comments

🌄सुप्रभात मित्रों। // 🌄Good Morning Friends.

🌅सुप्रभात मित्रों।

जीने की चाहत ही जिंदगी के होने की एक मात्र निशानी है।

हर धड़कती धड़कन में धड़कती जो जिंदगी वो सिर्फ तुम्हारी है।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखत।

प्रकाशन समय ब्लॉग साइट पर
18/04/2019 at 7:47 am

🌄 Good morning friends.

The desire to live is the only sign of life.
Every throbbing beats throbbing which is your life.

  Written by Vikrant Rajliwal

Publication date on my blog site
18/04/2019 at 7:47 am1555553337606

Apr 11, 2019
Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal -स्वतंत्र लेखक-

no comments

🌹 दास्ताँ

Logopit_1554967719051नमस्कार मित्रों, जैसा कि मैंने आप सभी प्रियजनों से वचन दिया था कि जल्द ही अपनी आज तक कि बहेत्रिन दर्दभरी महोबत कि नज़्म दस्तानों को आपके पाठन हेतु आपकी अपनी इस ब्लॉग साइट पर प्रकाशित करूँगा। अपने जीवन के अत्यधिक व्यस्त एव व्यवस्त होने के उपरांत भी मैने रात दिन आपके पाठन हेतु कार्य करते हुए अपनी प्रथम दास्ताँ एक इंतज़ार… महोबत। को प्रकाशित कर दिया है।

इसके साथ ही अन्य नज़्म दस्तानों को भी अपने व्यस्त एव व्यवस्त जीवन से समय निकालते हुए जल्द से जल्द प्रकाशित करने का एक प्रयास अवश्य करूँगा। क्यों कि जब तक मैं अपनी शेष दस्तानों को उनके वास्तविक पाठकों तक ना पहुचा दु तब तक मेरी अंतरात्मा को कदापि शांति प्राप्त ना हो सकेगी। यहाँ आपको अत्यधिक खेद से सूचित करना चाहता हु की मुझ को अपने रोजगार एव अपने मासूम बच्चों के भविष्य उनके कैरियर के लिए फिलहाल अपनी कलम को विश्राम देना पड़ रहा हैं।

यहाँ आपसे अपनी आगामी अति विस्तृत दर्दभरी महोबत की नज़्म दास्तां का नाम सांझा कर रहा हु जिसको पढ़ने के उपरांत सम्भतः आप प्रथम दास्ताँ को भी भूल बैठे। मेरी आगामी नज़्म दास्ताँ का नाम है एक दीवाना। एक प्रार्थना एव उम्मीद करता हु इश्वर मुझ को अपनी आगामी नज़्म दास्तानों को आप सभी प्रिय पाठकों एव मित्रजनों के पाठन हेतु आप तक पहुचाने एव प्रकाशन की शक्ति प्रदान करें।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल

11/04/2019 1:20pm

जल्द ही आपके अपने मित्र कवि, शायर एव

नाटककार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित उनकी

नज़्म श्रंखला दास्ताँ के अंतर्गत उनकी द्वितीय अति

विस्तृत दर्दभरी महोबत कि नज़्म दास्ताँ आपकी

अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर

प्रकाशन प्रक्रिया के समस्त चरणों से गुजरने के

उपरांत प्रकाशित कर दी जाएगी।

क़िताब ए महोबत के पाक पन्नों पर दर्द, एक दीवाने का लहू जो अब बरस गया। जख़्मी दिल के ज़ख्मो से तमाम, तेज़ाब कोई जो सरेराह अब बरस गया।। याद आई बिछुड़े महबूब की जब जब अपने, बेदर्द यह ख़ूनी सावन भी तब तब गरजा बेहिंतिया और टूट कर बरस गया। देख कर तड़प एक […]

via 💌 एक इंतज़ार… महोबत। (दास्ताँ श्रुंखला के अंतर्गत प्रथम दास्ताँ) — Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation’s -स्वतंत्र लेखक-

Apr 9, 2019

Apr 9, 2019
Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal -स्वतंत्र लेखक-

no comments

💌 एक इंतज़ार… महोबत। (दास्ताँ श्रुंखला के अंतर्गत प्रथम दास्ताँ)

photocollage_2019499535021क़िताब ए महोबत के पाक पन्नों पर दर्द, एक दीवाने का लहू जो अब बरस गया।

जख़्मी दिल के ज़ख्मो से तमाम, तेज़ाब कोई जो सरेराह अब बरस गया।।

याद आई बिछुड़े महबूब की जब जब अपने, बेदर्द यह ख़ूनी सावन भी तब तब गरजा बेहिंतिया और टूट कर बरस गया।

देख कर तड़प एक दीवाने की बर्बादी, सीना आसमां का भी बेहिंतिया जो जोर से धड़क गया।।

हो गया मजबूर कुछ इस कदर वो भी, ना जाने बे-मौसम ही वो क्यों जो बरस गया।

देख कर सितम सितमगर का एक ए महोबत, मुर्दा जिस्म में बेजान दिल भी जो तड़प गया।।

लिख रहा हालात ए दिल अरमानों के खून से जज़्बात ए महोबत जो अपने एक दीवाना।

सितम ए महोबत ये टूटती धड़कने, दर्द उखड़ती सांसो से ज़हर रग रग में कर रहा बर्दाश अपने जो एक दीवाना।।

नूर ए सनम से सकूं ए दिल ना जाने गुम है कहा वो सनम मेरा।

वीरानियाँ ये उजड़ता गुलिस्तां पुकारता है नाम ए महोबत नाम सनम का क्यों मेरा।।

दिखता है पल दीवाने को ये मौत का अपनी अब अपने जो नज़दीक।

लगता है लम्हा दीदार ए सनम ये मुलाक़ात का अब उनसे जो नज़दीक।।

मौत को एक दीवाने की इल्ज़ाम ना समझ लेना कोई ए मेरे सनम।

ये ज़िन्दगी ये धड़कती हर धड़कन भी अमानत ए महोबत जो तेरी ए मेरे सनम।।

मौत का मेरी तो एक बहाना है जरूर।

बेजां दिल की हर धड़कनो को अब तेरे धड़काना है जरूर।।

पूछते है नाम ए महोबत रख कर उनकी चौखट पर हम सर जो अपना।

जख़्मी है दिल ए दीवाना बहुत, ढूंढ रहा दिलबर का अपने अब भी जो घर अपना।।

ऐसा क्यों लगता है कि उनकी मदहोश निग़ाहों के वार से हो कर के जख़्मी अब जिंदा हु।

ऐसा क्यों लगता है कि उनके एक दीदार के एक इंतज़ार में हो कर के फ़ना अब जिंदा हु।।

ऐसा लगता है अब तो ये दीवाना सिर्फ उन के ही प्यार से जिंदा है।

ऐसा लगता है अब तो ये दीवाना सिर्फ उन के ही इंतज़ार से जिंदा है।।

तोड़ा है गरूर महोबत का मेरी सनम ने मेरे कई बार।

हर बार लगा दीवाना को कि उन को है सिर्फ उसी से प्यार।।

करते है कोशिश हर बार वो कि मर जाए उन का ये दीवाना।

ना आ पाए नज़दीक उन के कि डर जाए उन से उन का ये दीवाना।।

उनकी इस सँगदिली को भी उन की महोबत कहता है उन का ये दीवाना।

यकीं महोबत का उन को दिलाए कैसे कि महोबत उन से करता है कितनी उनका ये दीवाना।।

दीदार ए सनम करते हुए नज़रो से उनकी मदहोश, क़त्ल हो जाने को जी चाहता है।

रख कर हाथ धड़कते दिल पर अपना, अपनी पाक महोबत उन से जताने को जी चाहता है।।

नही रह सकता दीवाना ये उनका अब उन से दूर, उन को अब अपना बना लेने को जी चाहता है।।।

आती है सामने जब भी वो, ना जाने दर्द ए दिल दीवाने का क्यों बढ़ जाता है।

देख कर हुस्न वो बेबाक़ उसका, बेबस ये दिल ए दीवाना धड़कना क्यों भूल जाता है।।

मदहोश निग़ाहों से अपनी शराबी, कर के क़त्ल ए दीवाना ना जाने वो मुस्कुरा क्यों देती है।

जख़्मी दिल ये दीवाने का कर के सरेराह, ना जाने वो तड़पा क्यों देती है।।

हो गया ये सितम जो दूर अब उन से ये उनका दीवाना, साथ कोई साया अब नज़र मौत का आता है।

करता हु दुआ जब भी हाथ अब अपने उठाए, नाम ए महबूब दीवाने के ख़ामोश लबों पर आता है।।

छूट गया घर बार भी अब जो मेरा, साथ साया भी कोई अब नज़र नही आता।

जी रहा है तन्हा मरते हुए बेदर्द इस ज़माने में अब दीवाना, एक नाम ए सनम के दीवाने को दूसरा कोई नाम अब नही आता।।

कर दे टुकड़े लाख चाहे टूटे इस दिल के अब वो मेरे।

कर दे लाल चाहे लहू से इस जमीं को अब वो मेरे।।

वफ़ा फिर भी उन से दीवाना निभाता रहेगा।

लेते हुए नाम उन का तन्हा जीता और मरता रहेगा।।

आशिक़ इस ज़माने में उन के हजारों दिख जाएंगे।

दीवाना फिर भी सनम मेरे, मुझ सा ढूंढे ना ढूंढ पाएंगे।।

एक रोज़ दिखा देगा दीवाना ये उनका उनको, जलते है परवाने कैसे प्यार में।

एक रोज़ बता देगा दीवाना ये उनका उनको, मरते है दीवाने कैसे इंतज़ार में।।

जला कर खुद को जिंदा ये दीवाना कर देगा रौशन उन का घर आंगन।

जल्द ही बरस पड़ेगा ख़ूनी बूंदों से, वीरान जो महोबत पर, अब यह ख़ूनी सावन।।

रहेगा बेदाग़ फिर भी हमेशा उन का जो पाक दामन, मौत पर एक दीवाने की बरसेगा जब यह ख़ूनी सावन।।।

यकीं है दीवाने का वो लम्हा भी जल्द ज़िन्दगी में आएगा।

हो कर के खुद से मजबूर ये दिल, दीवाना जब नज़दीक सनम के जाएगा।।

तड़पेगी महोबत खुद देख कर अंजाम ए महोबत जो अपनी, कदमो से लिपट कर दीवाने के दीवाने को खुद महोबत जब बुलाएगी।

समझेगी महोबत को जब हो कर वो दिल से अपने मजबूर, आएगी नज़दीक दीवाने के और जान अपनी मुझ पर लुटाएगी।।

हो जाएगी मज़बूर इस कदर वो तड़पते दिल से अपने, तड़पेगी बेहिंतिया और वफ़ा दीवाने से फ़िर निभा पाएगी।।।

💔 महबूब की मदहोश निगाहों से जख़्मी हो जाने में एक नशा है।

चिर दिया सरेराह जो दिल शराबी निगाहों से उन्होंने, उस मे भी एक नशा है।।

महोबत के एक इज़हार के इंतजार में उनकी मर जाने में एक नशा है।

आएंगे मर जाने के बाद भी याद उनको, इस एक एहसास में एक नशा है।।

गुले गुलशन गुले गुलफ़ाम ना सही।

नज़रो में तेरी ख़ास ना तो आम ही सही।।

छीन लिया ए सनम क्यों तूने दीवाने का सकूँ।

माफ़ किया दीवाने ने जा तुझ को मेरा खून।।

ए सनम फिर भी इतना तो रहम करना ही पड़ेगा।

जिंदा धड़कनो को इल्जाम तो कोई देना ही पड़ेगा।।

हुआ कसूर दीवाने से क्या, जो दूर तुम से हो गया।

देने को सकूँ खुद ही खुद से दीवाना तुम को मज़बूर हो गया।।

ख़्वाहिश अब एक ही है बाक़ी जो मेरी मेरे रब से।

ना हो पाए जुदा अब कोई मासूम अपने सनम से।।

ऐसा क्यों लगता है जिंदा सीने में धड़कते दिल पर ख़ंजर कोई ख़ूनी अब मुझ को मार दिया।

प्याला था जो एक ज़हर का, कपकपाते लबो से लगा कर अब हलक से अपने उतार दिया।।

गए जो भूल वो दीवाने को, अब यादों को भी उस की किसी तन्हाई में जो दफना डाला है।

ना भुला पाएगा ये दीवाना उनका उनको कभी, तन्हा इस ज़िन्दगी का एक वही तो सहारा है।।

ऐसा क्यों लगता है तन्हा इस ज़िंदगानी में दीवाने को दीदार ए सनम अब ना हो पाएंगे।

हरे है जो ज़ख्म अभी वो अब कभी भर ना पाएंगे, हरे ही रह जाएंगे।।

हरे हर ज़ख्मो को नासूर अब बना डालूंगा।

गए जो भूल वो मुझ को तो खुद को अब मिटा डालूंगा।।

बेपरवा सनम की बेपरवाही ने एक दीवाने को जो बेहिंतिया तड़पा दिया।

ख़ामोश थी जो धड़कन ए दीवाना उन को एक उफनता तूफान बना दिया।।

दे कर ज़ख्म ए महोबत क़ातिल अदाओं से अपने, हर ज़ख्म ए दिल को फिर क्यों नासूर बना दिया।

जख़्मी दिल के ज़ख्मो पर दे कर हर बार एक ज़ख्म नया, फिर क्यों उसे पागल बना दिया।।

हर फ़ितरत उन की एक ज़हरीली चाल और हर अदा क़ातिल उन की अब नज़र आती है।

हुस्न वो शबाब उनका एक साजिश कोई दिलकश और महोबत उनकी अब एक ख़्वाब नज़र आती है।।

मज़बूर है परवाना भी चाहत से उनकी, आग ए हुस्न वो दहकती लपटे, जलना लपटों से उनकी अब अपनी उसे जिंदगानी नज़र आती है।।।

ना जाने फेर कर अपनी मदहोश नज़रो को क्यों, क़त्ल बेरहमी से एक दीवाने का सरेराह सनम ने मेरे कर दिया।

छोड़ कर तन्हा वीरानियों में एक दीवाने को क्यों, दिल दहकते अंगारो पर उसका बेदर्दी से सुलगा दिया।।

चाँदनी रात में अक्स ए अमावस्या सा काली रात का एक रोज़ दीवाने ने जो देख लिया।

मदहोश निग़ाहों से उन की बरसते अंगार ए जहनुम से दहकते नफरतों के अंगार, तड़पते दिल की हर टूटी धड़कन को लपटों से उनकी दीवाने ने जो सेह लिया।।

ज़ख्मी दिल के हर जख्मो को नासूर अब बना दिया।

बेपरवाही ने सनम की एक दीवाने को अपने जिंदा जो जला दिया।।

ए मेरे मालिक किसी हुस्न वाले को इतना मगरूर यू इस कदर बेपरवाह तो ना बना।

दिया जो धड़कता दिल तूने उन को, उसे कभी तो एहसास ए महोबत से धड़कना भी सीखा।

तोड़ के दिल बेदर्दी से दीवाने का अपने, उन्हें यू बेक़दरी से इठलाना तो ना सीखा।

अक्स ए ख़ुदाई हर दिल कि जो धड़कनो में बसता, दिल को किसी मासूम के उन्हें यू ठुकराना तो ना सीखा।।

ऐसा क्यों लगता है जख़्मी दिल के ज़ख्मो पर मरहम ना कोई अब लग पाएगी।

तड़प ये तन्हाइयां दीवाने की कभी कम ना हो पाएंगी, उसे बेहिंतिया अब रुलाएगी।।

ऐसा क्यों लगता है यह ख़ूनी शायरी भी दीवाने के अब अपने किसी काम ना आ पाएगी।

रंग है बेहिंतिया लहू के इसमें जो मेरे, रंग वो अपना फिर भी अब दिखा ना पाएगी।।

दर्द ए दिल दीवाने का है जो, चाह कर भी उसे मिटा ना पाएगी, उसे बेहिंतिया अब तड़पाएगी।

अंगार ए जहनुम बरसते है जो निगाहों से बेपरवाह उनकी शराबी, तड़प ए जुदाई चाह कर भी बेबसी दीवाने की बयाँ ना कर पाएगी, उसे बेहिंतिया अब रुलाएगी।।

दर्द ए दिल जो दर्द ए महोबत धड़कते दिल की तन्हा धड़कनो में अब दफना दिया।

देखा कुरेद कर जब भी अधूरी चाहतो से ज़ख्मो को अपने तो उन्हें फिर से गहरा बना दिया।।

वक़्त ए ज़माने ने ये सितम फिर उन्हें एक रंग नया कोई बेहूदा दे दिया।

कभी मजनू (कैस) तो कभी दीवाना, जो दिलजलों को फिर एक नया कोई नाम दे दिया।।

पूछा पता जब भी महबूब का अपने तो रास्ता हर किसी ने हमे महखाने का जो दिखा दिया।

दे कर सहारा एतबार से खाली हाथों में भरा प्याला शराब का दीवाने के जो थमा दिया।।

गुज़रती है हर शाम ए दीवाना, मह को पीते हुए पास के अब एक महखाने में।

छीलते है हर जख्म ए दीवाना याद सनम को करते हुए पास के अब एक महखाने में।।

नाम ए सनम से खुलती है बोतल अब जो शराब की, दर्द ए महोबत जो जाम ए लहू, अब भी है साथ मेरे।

रुस्वा ए महोबत से तड़पते है दिल अब जो सरेराह ये सितम ए महोबत जो नाम ए सनम, अब भी है साथ मेरे।।

लेते हुए नाम ए सनम एक दीवाना जो अब जाम ए लहू के जाम बनाया करता है।

याद में उन की ए महोबत चिर कर जख़्मी दिल, तड़पते जाम पर लहू अपना फिर उसमें मिलाया करता है।।

आती है तस्वीर ए यार नज़र भरे जाम की गहराई से।

झलकता है दर्द ए दिल जो दीवाना, ख़्याल ए दिलबर की अपनी रुसवाई से।।

बिखर जाती है हिम्मत ए दीवाना थामे हुए है काँपते हाथों से जो फिर भी अपने वो छलकता जाम।

बिखेर देता है नाम ए महोबत वो लेते हुए नाम ए सनम, सूखते हलक में जो अपने वो छलकता जाम।।

देख जाम ए लहू दीवाने को यू पीते हुए, रो पड़ता है तड़पकर अब जो साकी वो मेरा।

दर्द ए दिल झलकता है उसका, जब भी मिलता है यार ए महखाना वो मुझ से साकी जो मेरा।।

रख कर तड़पते दिल पर हाथ अपना, फरमाता है कुछ अब वो मुझ से साकी वो मेरा।।।

ना कर सितम ये ज़ुल्म खुद पर ए दीवाने, दर्द ए दिल की तेरे इंतेहा जो अब हो गई।

देख हाल ए दीवाना सा हाल, ए दीवाने जो तेरा, तड़पते दिल की हर जिंदा धड़कने हर किसी की यहाँ जो खो गई।।

ना कर ग़म कि तेरा महकता ग़ुलाब जो कहि किसी वीराने में जो खो गया।

दर्द ए दिल चुभा कांटा जो धड़कते दिल पर तेरे, तड़प ए जुदाई वो सनम जो कहि तेरा खो गया।।

ठहर कुछ लम्हा तो, देख दरों दीवार ढहा कर जरा, हर गम ए महोबत जो गम कि तेरे।

साथ ही साकी हर ग़म ए जिंदगानी देने को अब भी साथ सितम जो धड़कनो पर दिल की तेरे।।

लगा ठोकर धड़कनो से यह तन्हाइयां हर जुल्म ए जिंदगानी, अब भी है महकते महोबत के गुलिस्तां कई जो यहाँ, मौजूद है महकते कई गुलाब जो उन में बाकी।

धड़कता दे ये दिल रुकी हर धड़कती धड़कने, कर ले आबाद ये उजड़ा फिर से गुलिस्तां महोबत का अपना, अब भी महक ए महोबत सांसो में कहि जो तेरे बाकी।।

लिख दे खून ए श्याही मौजूद है बहती हर जो रगों में तेरे, हर दर्द ए महोबत से कर दर किनार, कोई फिर एक महोबत की सुनहरी दास्ताँ।

क़लम ए महोबत ये दीवानापन, आरज़ू ये यकीं महोबत का महोबत से अब भी ये महोबत की तेरी जो एक हसीं दास्ताँ।।

करें हिम्मत तो क्या पा नही सकता दीवाना, हिम्मत ए हौसले से है जिंदा ये तेरी महोबत की जो हर एक दास्ताँ।।।

सुन कर दर्द साकी का अपने लिए, दर्द दीवाने का फिर से जो तड़प जाता है।

रख कर टूटे दिल पर हाथ अपने, दर्द टूटे दिल का अब दीवाना जो कुछ फ़रमाता है।।

ना कर जिद ए साकी मेरे ए यार ए महखाने, इस दीवाने ने अब काँटो को ही दिल से अपने लगाना है।

बिछुड़ गया ए महोबत जो महबूब मेरा, इस दीवाने ने अब तन्हाइयों से ही महबूब को अपने गले से लगाना है।।

💗 यार ए महखाना…

ना कर जिद कि जख़्मी दिल के दीवाने सब ज़ख्म तेरे तड़प तड़प कर फट जाए।

देख कर तड़प ये तेरी उखड़ती सांसे, तेरे साकी की धड़कने ना रुक जाए।।

मान ए दोस्त जो मुस्कुराते हुए सर अपना कटवाने को है तैयार।

राह ए महबूब पर खून अपना जो बून्द आखरी भी बहाने को है तैयार।।

ए दोस्त उन को भी नही मिल पाता है महबूब अपना जो सच्चा प्यार।

सितम ये महोबत उन को भी रहता है तहदिल से महबूब अपने का एक आख़री इंतज़ार।।

यकीं है दीवानों को ये क्यों देख कर नज़रो में उनकी वो महोबत पाक।

करेगा उन से जरूर उनका महबूब महोबत का अपनी जो एक इक़रार।।

यकीं है दीवानों को सदियोँ से ये क्यों, जाग जाएगी रूठी तक़दीर करेगी महोबत जब खुद उनका दीदार।।।

यकीं है उन को करेगा उन से भी कभी कोई इज़हार ए प्यार।

लौटेगी एक रोज़ उन के भी बंजर गुलिस्तां में महोबत की बहार।।

मगर ए हुस्न ए दीवाने, हुस्न वालो की हर अदा है निराली।

प्यार-महोबत से हर रक जज़्बात ए दिल उन के है ख़ाली।।

ना कर ए दीवाने इस क़दर किसी हुस्न वाले का इंतज़ार, इस ज़माने में है उनके और भी कई साथी-यार।

ए वक़्त इंतज़ार है उनका अब भी जो तुझे और वो है किसी गैर के साथी-यार।।

ए मेरे यार ए महखाने, ए दीवाने ना कर किसी हुस्न से इस कदर तू प्यार की धड़कती धड़कने टूट जाए और बे-दम सा ये तेरा दम छूट जाए।

जान ये सांसे तो रुकेगी तेरी पर उन से कही कोई तेरा अपना ही ना मर जाए।।

ए दीवाने उस बेपरवाह हुस्न से ना कर तू किसी संगदिल से इस क़दर प्यार।

जान इस ज़माने में और भी है कई तेरे साथी दीवाने जो तेरे यार।।

रहता है हर लम्हा बेबसी से उन्हें तेरा आज भी जो एक इंतज़ार।

आ लौट आ वापस मेरे हम दम मेरे साकी ए दीवाने मेरे यार।।

गुम ना हो जाए कहि तू किसी अँधेरे बियाबान में, कोई चिराग़ भी कही ना रहे बाकी।

आ लौट आ हम प्याला मेरे ए साकी, दे रहे है अवाज़ तुझे तेरे सब संगी-साथी।।

💞 दर्द ए दिल दर्द ए दीवाना…

सुन कर दर्द से भरी साकी की अपनी वो पुकार, दर्द ए दिल तड़प कर कराह उठता है दीवाना।

दफ़न है हर दर्द ए महोबत महफ़ूज जो सीने में, चिर के जख़्मी दिल उनको अब जो दिखलाता है दीवाना।।

ए मेरे हमदर्द मेरे साकी दर्द ए दिल यू ही दिल से मिटाया नही जाता।

कर के वफ़ा सनम से यू ही सरेराह उसे फिर भुलाया नही जाता।।

ना दे बिखरते अरमानों को हवा मेरे ए मेरे साकी।

सुलगते हर अंगार में आग है मेरे अब भी बहुत बाकी।।

ना छेड़ो दम तोड़ती उम्मीदों का मेरी दिया, दिल ये दीवाने का अभी और जलना है बाकी।।।

लहू की हर एक बूंद से आख़री अपने, नाम ए सनम दीवाना लिखते जाएगा।

आख़री कतरा भी लहू का जिस्म से अपने, नाम ए सनम पर दीवाना अपने बहाएगा।

हुआ क्या कसूर दीवाने से जो तूने भुला डाला उसे।

देनी थी हर ग़ुनाह की सज़ा पर जीते जी तूने मार डाला उसे।।

ना छेड़ो ए मेरे साकी, मेरे टूटे दिल की टूटी धड़कनो के अब वो बेजान तार।

ना सुर है उन में कोई अब बाकी और ना ही बच पाई उन में अब कोई जान।।

ना भड़काऊ अधूरे अरमानों को ज़ख्मी मेरे, इस दीवाने को कोई अब आराम नही।

महबूब से वफ़ा के अलावा अब अपने, इस दीवाने को कोई दूसरा अब काम नही।।

ये माना दीवाने ने कि तुम भी उस के नज़र अपने आते हो।

दे रहे हो सहारा और प्यार से दीवाने को जो थाम रहे हो।।

पर ए मेरे साकी दस्तूर ए महोबत दीवाने को जलना ही होगा।

वफ़ा की है जो सनम से तो दीवाने को अब मरना ही होगा।।

काश वो सितमगर भी दर्द ए दिल दीवाने का जान जाते।

काश वो सितमगर भी आरज़ू ए महोबत हमे अपना कह पाते।।

फ़ना हो कर भी ये दीवाना फिर आज मुस्कुराता।

गुनगुनाता नग़मे महोबत के और दामन में उनके कहि गुम हो जाता।।

हर बात से दीवाना जो उनकी अंजान नही।

यकीं है बेवफ़ा वो नही इस बात से अनजान नही।।

मासूम है दिलबर वो मेरा शायद कुछ मदहोश है।

नशा है जवानी का जोर उस पर, शायद इसीलिए हुस्न से कुछ मगरूर है।।

ग़ुनाह ये उस का इस मे तो नही, शायद ये दीवाना और ये वफ़ा ही क़ाबिल उस के नही।

ग़म है महबूब इसी बात का मेरे, क्यों ये दीवाना और ये वफ़ा उसकी क़ाबिल तेरे नही।।

हुआ क्या ग़ुनाह जो दीवाने से जो सनम ने उसे ठुकरा दिया।

दे कर प्याला ए ज़हर सरेराह जो जीते फिर उसे भुला दिया।।

हुआ क्या ग़ुनाह यार से जो ख़ंजर सीने में बेवफ़ाई का सनम ने बेवाफ़ाई से उतार दिया।

क़त्ल बेपरवाह निग़ाहों से धड़कते दिल पर जो दीवाने के वार बेदर्दी से उसने किया।।

एहसास है, नही अंजान ये दीवाना कि तुझ में भी है वफ़ा ए महोबत।

एहसास है, नही बेपरवाह ये परवाना कि तुझ में भी है अरमान ए महोबत।।

दीवाना क्यों वफ़ा के फिर ये तेरी, क़ाबिल तेरे नही।

परवाना क्यों अरमानों के फिर ये तेरे, क़ाबिल महोबत के तेरे नही।।

तोड़ सकती है कैसे दिल एक मासूम का तू अपने दीवाने के।

खेल सकती है कैसे दिल से टूटे तू अपने एक परवाने के।।

सीने में धड़कता दिल क्या पास तेरे नही।

अक्स ए महोबत रूह में तेरे क्या एहसास कोई नही।।

गए नज़दीक जान कर जो दिलबर हम अपना उसे।

क़त्ल ये बेरूखिया छोड़ गए जो बीच मझधार वो मुझे।।

तोड़ कर दिल ए दीवाना सरेराह जा रहे है जो मुस्कुराए।

तोड़ कर दिल वो दिलबर फिर से दीवाने को हैं जो तड़पाए।।

आह! जान एक रोज़ आह ये दिल की टूटे, जख़्मी ना कर दे चिर कर कलेजा तुम्हारा।

जान एक रोज़ बरसाएगा लहू ये जब आसमां, देख कर घबरा ना जाए वक़्त ए कलेजा तब कलेजा तुम्हारा।।

हुआ था एहसास दीवाने को भी कभी एक कि तू भी है महरबान।

हुआ था एहसास दीवाने को भी कभी एक कि तू भी है क़द्रदान।।

क्यों है नसीब अब जिंदगी में मेरे ये जलती श्मशान।

क्यों है नसीब अब गुलिस्तां में मेरे ये बंजर बियाबान।।

खुद ही घायल हु बेबाक़ हुस्न से जो तेरे, इल्जाम अब इसका किस को दु।

खुद ही आशिक़ हु पाक महोबत से जो तेरी, इल्जाम अब इसका किस को दु।।

काश जान सकती हाल ए दिल तू दीवाने का अपने, ख़्याल ए महोबत इस दिल मे दिवाने के ख़्याल ए सनम के तेरे कोई दूसरा ख़्याल नही आया।

हो सकता है फ़ना महोबत के एक इज़हार के इंतजार में तेरे दीवाना तेरा, ए महोबत फिर क्यों देख कर दीवाने को कभी तुझ को दीवाने पर प्यार नही आया।।

अफ़सोस है दीवाने को बहुत तेरे की क्यों प्यार तेरा उसे कभी मिल न पाया।

हाल ए दिल क्यों सनम को अपने वो अपना कभी समझा न पाया।।

🌹 एहसास ए दीवाना ये दीवानापन…

देख कर यू दीवाने को अपने हँसना यू खिलखिलाना ठीक नही।

हंसी ये खिल-ख़िलाहट में तेरी नज़र दीवाने को तेरा प्यार आता है।।

आती है जब भी ख्यालों में तू मेरे, तो ख़्याल ये तेरा हमेशा से ही मुझ को बहुत सताता है।।।

ए सनम अब बता दे तू ही कि किस तरह अपनी पाक महोबत के सच्चे इज़हार का तुझ को यकीं दिला पाएगा अब दीवाना।

ए सनम अब बता दे तू ही कि किस तरह से सोई धड़कनो को तेरी बना कर अपना जगा पाएगा अब दीवाना।।

ऐसा क्यों लगता है दीवाने को अब वो मर कर भी महोबत तुझ में वो दिल मे तेरे प्यार ना अपना जगा पाएगा।

अरमान एक दीवाने का आखरी एक ही है अब बाकी, लेकर नाम ए महोबत, नाम ए सनम वो नाम तेरा, चौखट पर तेरी दम अपना तोड़ जाएगा।।

ना होना खफ़ा इस बात से ए रूठे सनम, ये दीवाना तो ख़ामोश नज़रो से करते हुए एक दीदार तेरा खामोशी से दम अपना छोड़ जाएगा।

ले कर नाम ए सनम, नाम तेरा ए महोबत वो सरेराह तेरा दीवाना, भरे इस ज़माने में चाह कर भी बदनाम ना तुझे अब कर पाएगा।।

🥀 दर्द ए दिल एक हक़ीक़त…

हो रही है लाल ग़ुलाब पर मेरे लहू की बहते आज जो बरसात।

हो रही है महबूब की मेरे किसी और से आज पहली जो मुलाक़ात।।

देख कर मंजर ये बर्बादी का अपनी, जिंदा जिस्म में मेरे क्यों मेरी रूह रो रही है।

वो समा वो वक़्त भी अब आ गया, ज़िन्दगी जब मुझ से मेरी बेवफ़ा हो रही है।।

मर भी गया जो आज तो ग़म नही कोई दीवाने को, नही जी सकता दीवाना रुस्वा अब बेदर्द इस ज़माने में।

मरना तो चाहता है कौन इस ज़माने में ए दीवाने, मगर कुछ भी नही बाकी बिन सनम के बेदर्द इस ज़माने में।।

दीवाने को अब भी क्यों सनम का रहता है इंतज़ार।

दीवाने को अब भी क्यों लगता है सनम से उस का होता है इज़हार।।

मासूम है सनम मेरा, बेवाफ़ाई उस मे कोई नही।

घड़ी है शायद ये आखरी उस के अब जो फैसले की।।

खड़े है दरिया ए महोबत के अब भी उस पार जो अब।

उठेगा उफ़ान ए सैलाब जब तो डूब जाएंगे मुसाफ़िर वो तब।।

दे रहे जो साथ एक फ़रेबी का आज जो अब।

देखना एक रोज़ देख बेवफ़ाई एक काफ़िर की बहुत पछताएंगे वो तब।।

दे देगा दग़ा महोबत का सनम को जब भी फ़रेबी कोई, दिख रहा जो सनम को अपना दीवाना अपने क़रीब।

कूद जाएगा नाम ए सनम से आग ए जहनुम में जो, महोबत से सनम की जो ये महोबत का उन की दीवाना उनके क़रीब।।

निभाएगा सितमगर सनम से अपने ये दीवाना उन का फिर भी हर लम्हा साथ।

एहसास ए बेवफ़ाई ले आएगा खिंच कर हर बेवफ़ाई से उन को बाहर या डूब जाएगा साथ उनके ये दीवाना निभाते हुए सनम का अपने साथ।।

खा कर दग़ा किसी मक्कार से आएगी वापस यही पर वो।

तोड़ कर दिल एक दीवाने का एक रोज़ बहुत पछताएंगी वो।।

टूटे दिल को अपने नही जोड़ पाएगी फिर वो।

फ़रेबी महबूब की बेवफ़ाई से तड़पते ही जाएगी फिर वो।।

वफ़ा दीवाने से अपने शायद कर पाएगी तब वो।

साथ दीवाने का अपने शायद निभा पाएगी तब वो।।

टूटेगा दिल जब उस का तो आएगी मेरी याद।

नही बेवफ़ा ये दीवाना दे देगा तब भी वो उसका साथ।।

राह ए सनम पर आख़री दम तक दीवाने को वही है खड़े रहना।

सितमगर पलट भी जाए चाहे देख कर मुझ को मेरे वो, राह ए सनम दीवाने को मगर राह पर उनकी वही है खड़े रहना।।

चिर जर जख़्मी दिल दीवाने ने लहू अपना बहा दिया।

भर कर प्याला लहू से फिर अपने लबो से जो लगा लिया।।

लेते हुए नाम ए सनम हलक से फिर अपने उसे जो उतार दिया।

ज़हर ए महोबत रग रग से फिर जिस्म में अपने जो फैला दिया।।

महोबत ए सनम के अलावा वीरान ज़िंदगानी में ना रहा अब कुछ बाकी।

दीदार ए सनम के अलावा, ख़ामोश नज़रो में नज़ारा ना रहा अब कुछ बाकी।।

नही हिम्मत देने की दर्द दीवाने में सनम को जो अपने।

चाहता है हर दर्द से मर जाने को दीवाना, सनम के जो अपने।।

टुकड़े टुकड़े कर दे चाहे बेबस दिल के अब वो मेरे।

रोक भी दे धड़कने चाहे जिंदा दिल की अब वो मेरे।।

हर टुकड़े पर दीवाने ने दिल के नाम ए महोबत जो नाम ए सनम लिख दिया अपने।

दम तोड़ती महोबत पर दीवाने ने इंतज़ार ए महोबत जो इंतज़ार ए सनम लिख दिया अपने।।

चाहे दीवाना अब मर भी जाएगा।

खुले ज़ख्मो को अब दिल के सील ना पाएगा।।

फट गया खुद ही ज़ख्म मेरा नासूर नासूर बन के।

फट गया खुद ही ज़ख्म मेरा बेअसर हर मरहम को कर के।।

बना लिया पत्थर अब खुद इस दिल को पत्थर होते एहसासों से अपने, इल्जाम इस का अब दु किसे।

जला दिया जिंदा अब खुद जिस्म को जलते एहसासों से अपने, इल्जाम इस का अब दु किसे।।

कहते है आशिक़ वो दीवाने सदियोँ से भी पुराने, होते है एहसास ए महोबत इस ज़माने में अरमान ए पत्थर भी।

कहते ये आशिक़ वो दीवाने सदियोँ से भी पुराने, होते है एहसास ए वफ़ा इस ज़माने में असूल ए पत्थर भी।।

हो गए एहसास जो दीवाने के पत्थर से एहसास, कुछ अरमान उसके उन में एहसास अब भी है जो बाकी।

दम तोड़ते का दामन में सनम के अपने, फ़रमान जो आख़री दीवाने का एक अरमान अब भी है जो बाकी।।

आख़री दम तक राह ए सनम पर इंतज़ार ए सनम से एक इंतज़ार आखरी अब भी है जो बाकी।।।

उम्मीद है इंतज़ार को दीवाने के अब उस के, नही करना होगा अब उस का और इंतज़ार।

करना होगा एक रोज़ महबूब को भी बिछुड़े, दीवाने का अपने एक आखरी दीदार।।

उस लम्हा, उस रोज उस को भी शायद महोबत का एक इज़हार अपने दीवाने से हो जाएगा।

चौखट से दीवाने का जब उस की, बेदर्दी से सरेराह जनाज़ा जब रुस्वा हो जाएगा।।

हुस्न और इश्क़ का नही है दूर अब मेल।

या तो पा लेगा दीवाना अब उस को,

नही तो कर देगा ख़त्म यह खेल।।

पड़ा है चौखट पर तन्हा महबूब की दीवाना एक, रख कर सर अपना जो लहू-लुहान।

जख़्मी है दिल उसका और ख़त्म होने को है धड़कती हर धड़कनो में धड़कती जो जान।।

दम तोड़ते दीवाने की एक यही आख़री जो तमन्ना है अब बाकी।

सर है चौखट पर उनके और उनके एक आख़री दीदार की तमन्ना है अब बाकी।।

जिस्म है जख़्मी मेरा, लहू उस का जो अब भी बह रहा।

नाम ए सनम लेते हुए वो लम्हा जो मौत का अपनी ढूंढ रहा।।

ये दम तोड़ती सांसे कर रही है इंतज़ार जो अब भी एक आख़री अपने सनम का।

ये पत्थराई सी नज़रे ढूंढ रही है दीदार जो अब भी एक आखरी अपने सनम का।।

हो पाएगा छूटता दम छूटने से पहले क्या, दीदार ए यार उस को।

मिल पाएगा टूटती धड़कने टूटने से पहले क्या, इज़हार ए यार उस को।।

उम्मीद ए दीवाना अब भी है कायम जो, आएंगे जरूर सनम उसके, टूटता दम उसका छूटने से पहले।

उम्मीद ए दीवाना अब भी कायम जो, थाम लेंगे जरूर सनम उसके उसको उसकी टूटती सांसो के टूटने से पहले।।

क्या आ पाएंगे करीब दीवाने के वो दीवाने के गुजर (मृत्यु) जाने से पहले।

क्या दम तोड़ने दिल को धड़का पाएँगे वो दीवाने के दम तोड़ जाने से पहले।।

देखना है दीवाने को अब करीब आती है वो कब।

दीदार ए सनम से दिल दीवाने का धड़काती है वो कब।।

करता है ये दीवाना अब भी उन से इज़हार ए महोबत जो अपनी, है जो उस के सनम।

करता है ये दीवाना अब भी हर फ़साने से दीदार ए सनम, टूटती धड़कनो में अपने लिए तस्वीर ए सनम।।

वक़्त की चाल पर हम से जो सनम हमारे बेवफ़ा हो गए।

ढूंढता है फिर भी ये दिल उन्हें जो सनम हमारे हमसे बेवफ़ा हो गए।।

मार के जख़्मी दिल पर ख़ंजर ख़ूनी, सनम हमारे जो हम से रूठ गए।।।

टूटे दिल में लिए एक तस्वीर ए यार, पड़ा है चौखट पर सनम के एक दीवाना।

आती है याद जब उसकी, चिर कर दिल, कर लेता है दीदार ए यार उसका दीवाना।।

जख़्मी है दिल ये मेरा, रग रग में उफनता एक तूफान।

खाया है धोखा प्यार का, ना खेलों मुझ से अब तुम मेरी जान।।

सितम ये तेरा देख कर जलजला ज़िन्दगी में दीवाने की जो आ गया।

हो गया जो दूर तुझ से दीवाना, तो चौखट पर तेरी ये जनाजा मेरा जीते जी ही जो आ गया।।

एक आरजू आखरी चौखट पर उस की दम ये अपना तोड़ दूंगा।

आएगी जब वो सामने तो टूटती सांसो ये अपनी छोड़ दूँगा।।

💦 पहली महोबत का अपनी, ये अंजाम ना सोचा था।

चौखट पर महबूब की अपने, ये अंजाम ना अपना सोचा था।।

दीदार ए सनम की एक चाह जो आख़री, बदल गई कब इंतज़ार ए सनम में यह मालूम भी ना हो पाया।

भरे संसार मे कब बन गया तमाशा ये दीवाना, एहसास इस बात का उसे एहसास भी न हो पाया।।

आए नही जो सनम वो मेरे, जरूर उन की भी कुछ मजबूरी होगी।

ऐसा क्यों लगता है अब ख़त्म नही उन से कभी, यह दूरी होगी।।

उन को इतना भी नही मुझ से है वास्ता जो… जरूर।

दीवाना शुरू से ही उन का और अब भी देख रहा है रास्ता जो… जरूर।।

नज़रो में अपनी उनका अब भी एक आख़री दीदार लिए बैठे है।

दम तोड़ती धड़कनो ये अपनी अब भी एक आखरी उनका इंतज़ार लिए बेठे है।।

कहता है दिल ए दीवाना जो, जल्द ही वो आएंगे जरूर।

लगता है ऐसा, दम तोड़ते अरमानों को वो थाम लेंगे जरूर।।

हो गई है धड़कने भी बेवफ़ा रुकने का जो नाम नही लेती।

इंतज़ार है उनको भी सनम का और वो आराम नही लेती।।

याद है दिलबर का अब भी जो दीवाने को, मासूम वो चेहरा हसीं, उसका जो फ़रेबी।

ज़ख्मी है दिल ये दीवाने का जो उसके, एहसास है हाल ए दीवाने का धड़कनो को क्या उसकी जो फ़रेबी।।

लग गई है भीड़ चारो ओर अब जो मेरे, कोई कहता है मजनूं (कैस) तो कोई फ़रियाद।

पड़ा है ये दीवाना क्यों यहाँ, और कर रहा है शायद किसी संगदिल सनम को अपने याद।।

एक आख़री दीदार ए सनम की चाह से, बन गया है तमाशा अब दीवाना।

कहा है सनम मेरा, एक आख़री सांस से पुकारा है जो अब दीवाना।।

आह! धड़कने दीवाने की सरेराह जो अब तड़पने लगी।

हो कर दूर सनम से अपने बिछुड़े, जो अब टूटने लगी।।

हो गया लाल लहू से दीवाने के चौखट का उसकी वो फ़र्श जो काला।

ले रहा इम्तेहां ए दीवाना, ए महोबत ये वक़्त चौखट पर सर जिस का फ़र्श जो काला।।

आंगन से उस के भी जो तेज़ शोर एक आ रहा।

उस को भी है मालूम शायद, टुटता दम तोड़ने से पहले उसे उसका दीवाना बुला रहा।।

कर दी देर आने में उन्होंने जो बेहिंतिया।
पंछी तो कब का उड़ गया महोबत का
अब तो खाली रह गया है जो पिंजरा।।

🎻 तड़पते एहसास…

महोबत की बिसात पर सनम अब कहि जो खो गया।

टूट गई धड़कन ए दीवाना और अब कहि वो जो सो गया।।

आए नही सनम जो मेरे और दम मेरा जो वही छूट गया।

खुली रह गई आंखे मेरी और पंछी महोबत का जो कहि उड़ गया।।

एक उम्मीद दीदार ए सनम आख़री साथ अपने ले गया।

माट्टी का पुतला था जो माट्टी में ही कहि वो घुल गया।।

एक एहसास जो ख़ामोशी अब चारो ओर छा गई।

देखने को ये हाल ए दीवाना घर से बाहर अब वो क्यों अपने आ गई।।

सच्ची महोबत को दीवाने की अपने क्यों ये हुस्न वाले जान नही पाते।

सच्चे हम दम को वो दीवाने को अपने क्यों ये हुस्न वाले पहचान नही पाते।।

चाहे दम अपना तोड़ भी दे वो सांसे अपनी जो आख़री, महोबत में उनकी महोबत के एक इज़हार के इंतज़ार में,

फिर भी क्यों दीवाने को अपने अपना वो कह नही पाते।

मिलते है तक़दीर से दीवाने ऐसे बेदर्द इस ज़माने में, एहसास ए महोबत वो महोबत दीवाने की अपने,

फिर भी क्यों इस एहसास को ये हुस्न वाले पहचान नही पाते।।

🕯️यारों के लबों से…

बिन तेरे ए मेरे यार रो रहा दिल यारो का तेरे, तड़प ए एहसास जो तुझ से कर रहे है अब भी फ़रियाद।

रुकते नही आंखों से पथराई जो उनके बहते हुए ऑंसू, पुकारते है ए रूठे यार वो तुझ को करते हुए अब भी याद।।

ना करना कभी किसी बेपरवाह हुस्न से इस क़दर प्यार कि दिल से मजबूर हो जाओ।

छोड़ कर साथ जिंदगानी का अपनी, अपने यारो से इस क़दर जो दूर हो जाओ।।

मिलती है सच्ची महोबत इस ज़िंदगानी में नसीब से।

मिलता है सच्चा दीदार ए सनम इस ज़िंदगानी में नसीब से।।

ए मेरे यार और भी थे कई मुक़ाम, महोबत के अलावा इस ज़माने में।

एक वो नही था तेरा यार जो बेवफ़ा सनम, तेरे और भी थे कई यार सच्चे इस जमाने मे।।

खो गया ए दीवाने बेपरवाह महोबत के किस अंधेरे बियाबान में अब तू।

रूठ के यारो से अपने ए दीवाने कहा चला गया अब तू।।

काश इस एक एहसास को हमारे तू जान जाता।

काश इस ज़माने में हमे भी तू अपना समझ पाता।।

अब भी है हम जो तेरे यार।

करते है तुझ से जो बेहिंतिया प्यार।।

👥 रूह ए दीवाना…

तड़प के रो रही रूह ए दीवाना, कर रही किस से अब फ़रियाद।

माना था सनम अपना जिसे, अब भी है किसी गैर के वो साथ।।

होता है एहसास आज ये दर्द ए दीवाना जो एहसास ए रूह ए दीवाने को एक कि पी कर भी हर सैलाब आँसुओ का खारें अनन्त अपने वो प्यासा जो रह गया।

होता है एहसास आज ये एहसास ए रूह ए दीवाना को एहसास एक कि हो कर फ़ना एक बेवफ़ा सनम पर कही कुछ अधूरा सा वो कहि जो रह गया।।

एक बेपरवाह सनम के सितम से गुजर (मर) गया जो ये दीवाना।

गुजर (मर) कर यारो से अपने बहुत दूर हो गया जो ये दीवाना।।

काश वक़्त को बदल सकता जो मैं।

काश जिंदा फिर से हो सकता जो मैं।।

याद है दम दीवाने का छुटा था जब।

आह! भी ना निकल पाई थी उसकी तब।।

डर था दीवाने को यह एहसास शायद, आह से उसकी कहि आह ना सनम की निकल जाए।

भरे ज़माने में सरेराह कहि यू ही बदनाम ना वो हो जाए।।

काश ज़िन्दगी में अपनी ए महोबत उन्हें, एतबार महोबत का पाक अपनी दिला पाता।

काश ज़िन्दगी में अपनी ए महोबत उन्हें, यकीं महोबत का एक एहसास अपना करा पाता।।

तो तक़दीर आज कुछ और होती प्यार की मेरे।

हर हार में जीत फिर आज होती प्यार की मेरे।।

🕊️ एहसास…

ए वक़्त मगर दम अपना अब तोड़ चुका जो दीवाना।

चौखट पर उनकी हर सांस आखरी अब छोड़ चुका जो दीवाना।।

चाह कर भी जिंदा ना अब हो पाएगा ये दीवाना।

चाह कर भी इज़हार ए महोबत सनम से ना अब कर पाएगा ये दीवाना।।

दास्ताँ ए महोबत में अपनी दम तोड़ गया अपना दीवाना।

दास्ताँ ए महोबत में अपनी लूट गया अपना दीवाना।।

चाह कर भी कुछ ना कर पाएगा अब दीवाना।

अधूरी महोबत कि इस दास्ताँ को अब पूरा ना कर पाएगा दीवाना।।

🍂 पैगाम ए महोबत एक पैगाम आखरी…

” दास्ताँ ए महोबत कभी भी इस ज़माने से ख़त्म ना हो पाएगी।

मौत दीवाने की भी यह दास्ताँ मिटा ना पाएगी।।

हर जन्म में दीदार ए सनम एक ख़्वाहिश आख़री दीवाने की रहेगी।

हर जन्म में चाहत ए सनम एक आरज़ू उसे पा लेने की रहेगी।।

अधूरी महोबत की यह दास्ताँ एक रोज़, अंजाम को आखरी अपने, हा अधूरे प्यार को अपने, पा ही लेगी, पा ही लेगी, पा ही लेगी…”

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

09/04/2019 at 10.40 am

(वैसे तो मैने बहुत सतर्कता बरती है टाइप करते वख्त फिर भी अगर कहि भूल वश टाइपिंग में कोई त्रुटि ही गई ही तो आपसे क्षमा प्रार्थि हु। एव यकीन रखिएगा उसको जल्द ही सुधार दिया जाएगा)

Apr 3, 2019
Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal -स्वतंत्र लेखक-

no comments

🌹 दास्ताँ

💗 एक इंतज़ार… महोबत।

मेरी आगामी अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म श्रंखला के अंतर्गत मेरी प्रथम दर्दभरी नज़्म दास्ताँ एक इंतज़ार… महोबत। एक ऐसी दर्दभरी महोबत की दास्ताँ है जो यक़ीनन आपके ह्रदय पर अपने दर्द की पीड़ा से दस्तक़ देगी।
और जिसका प्रत्येक शेर एव कलाम आपके धड़कते दिल को बेहिंतिया धड़कातें हुए आपकी हर धड़कती धड़कन से चिर कर रख देगा।

एक जिसका आगाज़ एव अंजाम शायद आप जीवन भर ना भूल सके। एव इस दर्दभरी रचना के माध्यम द्वारा मैने आज की युवा पीड़ी और आने वाली समस्त पीढ़ियों को एक ह्रदय स्पर्शी संदेश देने का एक प्रयत्न किया है। अगर आप वहाँ तक पहुच सके तो मैं स्वम् को अत्यंत ही भाग्यशाली समझूंगा।

अंत मे मैं आपका अपना मित्र विक्रांत राजलीवाल इतना ही कहना चाहूंगा कि मेरी या अब यह कहना अधिक उचित होगा कि आपकी अपनी इस दर्दभरी महोबत की दास्तां के प्रकाशन का कार्य प्रगति पर है जिसे समस्त प्रक्रियाओं से गुजरने के उपरांत अवश्य प्रकाशित कर दिया जाएगा। जिससे आप सभी ह्रदय अज़ीज़ इस अतिविस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ के पाठन का एक आनन्द प्राप्त कर सके।

शुक्रिया।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
03/04/2019 at 8:35 amLogopit_1554260488170

(यहाँ आपसे अपनी इस आगामी दर्दभरी अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ की श्रंखला दास्ताँ के फ़ेसबुक पृष्ठ दास्ताँ विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित का link सांझा कर रहा हु। जिसके द्वारा आप फेसबुक से भी मेरी आगामी नज़्म श्रंखला का आनन्द प्राप्त कर सकते है।

Link नीचे अंकित है

https://www.facebook.com/poetvikrantrajliwal/ )