FB_IMG_1496980653687देख के आग सीने की तेरे
धहेक सीना मेरा भी गया

सोया था सदियों से, बन्द कब्र में जहा
नाम लैला का सुनते ही जग गया

दिल में लिए खामोशिया नज़रो में एक तूफान
ढूंढ रहा हैं अब भी शायद, इश्क ए निसान

दरिया ए महोबत से हो कर फ़ना
तड़प ए दिल,मरते हुए

छुपाये हुए धड़कनो से,जख्मी दिल के जख्म अपने
पूछती हैं राह ए वफ़ा,अब भी महबूब अपने का नाम

कोई कहे मंजनों, कोई कहे फरियाद
इश्क-महोबत से घायल हैं वो

कर रहा अब भी बड़ी शिदत से हैं जो
सनम-बिछुड़े को अपने याद. ..

लेखन द्वारा✍विक्रांत राजलिवाल।
#Hindi Poetry, Shayari & Story Article’s#

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