कभी कभी मनुष्य न चाहते हुये भी शक्तिहीन और विवश हो

FB_IMG_1498197398239जाता है।जिसका अफ़सोस उसे उम्र भर सताता है।

वह न चाहते हुये भी अपनी उन तमाम इछाओ का खुद अपने

ही हाथों दम घोट देता है जो उसके लिए उसकी ज़िन्दगी थी।

इसका तातपर्य यह भी निकलता है कि कभी कभी मनुष्य न

चाहते हुए भी खुद अपनी ज़िंदगी का अपने ही हाथों अंत करने

पर विवश हो जाता है।

टूटना तो चाहा, कभी न था । हौसला भी कुछ कम तो न था।

टूट गयी जो मीनार वो, चाहतो में कमी से, किसी के

लगा था खंज़र कमर पे जब, हाथ ख़ंजर वो, निशान अपनों के, पहेचान न पाया. ..

लेखन द्वारा ✍ विक्रांत राजलीवाल।

#Hindi Poetry, Shayari & Story Article’s#

Advertisements

Leave a Reply