चरित्र का चरित्र, बहुत ही विचित्र ज्ञान पड़ता है। कभी जान-बूझ कर तो कभी अनजाने ही, वह हमेशा से भृमित करता है। जी साहब, यहाँ ज्ञान का विषय चरित ही है।

कभी-कभी मनुष्य को इस बात का अहसास भी नही हो पाता कि कब बातो ही बातों में, या यूं कहें कि अज्ञान-वश की हुई अठखेलियों के कारण, उसका अनमोल चारीतिक गुण, कब अपने आप ही उसके अज्ञानता या अचेतन मन के कारण पतन की और बढ़ चला है।

फिर भी, अगर कभी, उस मनुष्य पर ईश्वर की कृपा, ज्ञानियों के सानिध्य के कारण, या उसे अपनी सोई हुई ज्ञानिन्द्रियों का ज्ञान हो जाने पर, मनुष्य को इस बात का अहसास हो जाय कि वह जिस राह पर, भूल-वश, या अज्ञानता के कारण, चले जा रहा है, यह राह जो उसे साधारण सी ज्ञान पड़ती थी। असल मे इस राह पर चलते हुए उसका चारित्रिक पतन हुआ है या हो सकता है।

ऐसा लगता है मुझ-को, की आज के इस अत्यंत व्यवस्त समाज मे, आज के मनुष्य के पास अपनो का तो क्या खुद के चरित्र के सुधार हेतु समय शेष नही है। और इस अत्यंत व्यवस्तित समाज मे मनुष्य कब अनजाने ही अपने चरित्र का पतन कर दे, और उसे उस बात का तनिक भी अहसास न हो पाए तो इसमें किंचित मात्र भी हैरत की बात नही है।

फिर भी…घटेगा जब, अंधकार घनघोर, तो दिख जाएगा उसको अपना चरित्र निर्दोष। जब होगा पच्यातप उसे, और निदोष चरित्र कुछ, उसका उदास हो जाएगा।

ऐसा लगता है मुझको, उस मनुष्य का, खोया हुआ चरित्र तब उसे फिर से प्राप्त हो जाएगा।

अगर सभ्य समाज का दर्पण चमकना है
खुद के लिए हि नहीँ, अपनो के लिए भी
सभ्य समाज बनाना है।

तो रोक लो पतन आने-अपने चरित्र का, कि विश है अत्यंत भयंकर जो इसमे, उससे खुद को ही नही, अपनो को भी बचना है।

फिर, खुद का कर निर्माण, तू चरित्र का अपने।
अब तुझे, खुद ही खुद से, जलते जाना है।

ये मान, जल कर भी, मिट न तो पायेगा।
जितना तपेगा, उतना कुंदन बन जायेगा।।

बाकी सब तो बहना है, खुद को बना कर के चरित्रवान, जीवन सुखी बनाना है। कर मिसाल कोई नेक, ऐसी कायम, पीढ़ियों तक, रहे आने वाली पीड़िया, चरित्रवान और खुद भी इस राह पर चलते चले जाना है।

सत्य-अहिंसा और चारित्रिक गुण, तो सदियों से भी पुराना है। इस राह नेकी पर चलना नही आसान है यारो, चारो ओर है भ्र्ष्टाचार! आज-कल यहाँ बेईमानी का ही जमाना है।

फिर भी, जो कर गया, अपने चरित्र जा निर्माण, खुद को ही नही, बदला है उसने यहाँ हर भृष्ट इंसान।

नेक ओर चरित्रवान है जो भी इंसान।
होती है हर समाज मे उसकी अलग एक पहचान।

चाहे लाख करे, उसका कोई विरोध,
नही घटती है उज्जवल शान और उसकी नेक पहचान।

लेखन द्वारा विक्रांत राजलिवाल।
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