FB_IMG_1498448201100.jpgयह अद्धभुत संसार, यह सुंदर प्रकृति हमारी।

चाहती है एक बदलाव।

छुपा है सदियों से, हर कण-कण में, यहाँ

कही न कही, कोई न कोई, एक बदलाव

पहले बचपन, फिर जवानी, अंतिम रूप बुढापा

बदल जाता है यह शरीर भी हमारा

बचम की दुलार, जवानी की तकरार, फिर है बुढापा मोहताज

झेल कर सब हालात-जिंदगी के, चला जाता है, छोड़ कर

नष्वर-संसार, देह फिर हमारा

मोसम बदला, समा बदला, बदल गया ये सारा संसार

पहले था मोसम जहा, सुहाना, अब है सिर्फ काली रात

रात भी काली ठहर न पाई, हो गया जब आत्म-साक्षात्कार

यह है अंतिम ज्ञान, चेतन है यह आत्मा हमारी

कर लो अब तुम यह ज्ञान…

लेखन द्वारा विक्रांत राजलीवाल।

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