दर्द जब हद से गुज़र जाए, कोई दवा भी काम न अपने आए,
जख्म कुरेद लेते है अपने, प्याला-ज़हर हलक से उड़ेल लेते है

निशानी है दर्द ये तेरे, इन्तेहाँ की, जनून-ज़िन्दगी ये सब तेरे उत्तर-चढ़ाव की
हर इम्तेहां जान-ज़िन्दगी, से खेलेगा तेरी, मुकदर ये सितम , कशमश सासो में तेरी… लेखन द्वारा विक्रांत राजलिवाल।

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