FB_IMG_1498402445529.jpgदेखा था ख़्वाब कभी दीवाने ने एक
जगमगाते सितारो से हसीन
था वो चेहरा एक

थी परवान-महोबत, चाँद की रात में एक
छा गए फिर क्यों उनपे वो
बदल काले, हो गए जुदा वर्षो से मिले
पल में एक

हुस्न की बहार से,इश्क मेरा छली हुआ
खाया खंज़र सिने पे,इश्क मेरा नीलाम हुआ

महोबत के बज़ार में , बिकती नही महोबत
वफ़ा-ऐतबार से, ज़िंदा हैं महोबत

बिक जाती हैं फिर भी वफ़ा
करती हैं बेवफ़ा कोई जब महोबत

सकूँ दिल का जो अब लूट गया
दाग धड़कनो पे ये कैसा पड़ गया

चला तीर निगाहों से कही
छली ये दिल मेरा हो गया

भरी हैं जो इस दिल में वफ़ा
मिलते हैं अक्सर बेवफ़ा

ज़ख्म दिल के दिख गये
नासूर बन के उभर गये

सकून ए दिल जो हसीना ने एक
सरेआम मेरा लूट लिया

धड़कनो पे दे के निशान-जुदाई
तन्हा जो मुझ को छोड़ दिया

महोबत दिलरुबा की,चिर के दिल घायल करे
दिखा के आईना-महोबत,ऐतबार से फिर बेवफाई करे

खाया धोखा प्यार से, तन्हा जो अब हो गया
रोशनी हैं बहुत,फिर भी, जुदा साये से अपने हो गया

हुस्न की सुराई से, अमृत कलश ,चुरा लेंगे,
कदमो में ऐ दिल-कश हसीना
चिर के दिल अपना हम बिछा देंगे…

लेखन द्वारा विक्रान्त राजलीवाल।

*my second ready to published book is based on shayri-najam*(count…next post)^view on tumblr site^

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