चाँद रात से चाँदनी, सितारों से है जो बात।
आलम है तन्हाई का, रुसवाई की जो बात।।

बैठे है आईना हाथो में, अपना टूटा लिए
दिखता नही, जो अक्स अपना कोई
हैरत की है बात।

ढूंढते है हर एक धड़कन, सकूँ जो अपने लिए
दिखता नही, जो साया साथ अपने कोई
हैरत की है बात।।

छूट गया, जो रही कहि, पता भी अपना भूल गया
चाँद है वही, रात ये चाँदनी,
बदल गए, जो निशां, ये चाँद, हर राह है अंजानी।

बरसा रहा, लहू जो आसमां, ये दिल हर अहसास रो रहा
जुल्म है वही, सितम ये निसानी
बदल गए, जो हालात, ये ज़िन्दगी, हर सुरत है अंजानी।।

लेखन द्वारा विक्रांत राजलिवाल।
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