युवा, जी हा युवा!!!
युवा जो हर सभ्य समाज का भविष्य कहलाते है। युवा जिसकी शक्ति का लोहा हर ज़माने ने माना है। वही युवा आज हताश और निराश क्यों नज़र आता है। योग्य और योग्यता से परिपूर्ण होते हुए भी वह क्यों मज़बूर है। क्या यह हमारी थरथर हो चुकी या कई दशको से भृष्ट व्यवस्ता की देन है।

आज हर युवा प्रतिभा को तलाश है एक ऐसी व्यवस्ता की यहाँ उसे भी उसकी योग्यता के अनुरूप उचित स्तान प्राप्त हो सके। जहाँ उसके भी कर्म साकार हो सके।

इस जर्जर व्यवस्ता को चलाने वाले ये नही जानते कि आने वाले कल में खुद वह भी और उनके ही कारण खुद उनकी भी नस्ले इस भृष्ट व्यवस्ता का शिकार हो हताश और निराश हो जाएंगी।

आज के युवा की हताशा का सबसे बड़ा कारण है कि आज ऐसे कई तरह के प्रलोभन बाज़ार में मौजूद है जो उनको भृमित कर उनके भविष्य से खिलवाड़ करते हुए नज़र आते है।
और जब हकीकत से उन तमाम युवाओ का सामना होता है तो वह एक दम हताश ओर निराश हो जाते है। कई युवा तो अपने अनमोल जीवन को समाप्त तक करने का विचार बना लेते है और कई अपना जीवन समाप्त भी कर देते है।

आज ज्यादातर लोग केवल मुनाफा कमाने के लिए ही जीवन जी रहे है और इसके लिए वह हर अनैतिक उपाय अपनाने को ततपर नज़र आते है। इस तरह से वह अपने जीवन से ही नही बल्कि सम्पूर्ण सभ्य समाज के भविष्य से खेल रहे है।

इस समस्या का समाधान आज के युवाओं को अपने बुजुर्गों के साथ मिल कर खुद तलाशना है। या फिर वह भी इस प्रकार के भ्र्ष्टाचार से जुड़ कर भ्र्ष्टाचार को बढ़ावा देने। और अपनी आने वाली नस्लो को मजबूर और बेबसी में धकेल देंगे। अगर ऐसा हुआ तो यह वही मिसाल बन जाएगी, जिस डाली पर बैठे थे वही काट दी। फल तो मिल पर ज़हरीला।

यह लड़ाई है कई दशको से कमजोर व्यवस्ता से, यह लड़ाई है खुद से, खुद के लिए, यह लड़ाई है अपनी आने वाली नस्लो के लिए।

जय हिंद।

लेखन द्वारा विक्रांत राजलीवाल।

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