कर गए नज़र-अंदाज़ वो, फेर के मदहोश-नज़रे जो अपनी
ज़ला दिया दिल ए दीवाना, कातिल हर अदा से जो अपनी

कत्ल कर के मदहोश निगाहों से, मुस्कुराता हैं हुस्न वो बेबाक
छोड़ तन्हा बेपरवाई से,ज़ख्म -दिल पे दे जाता हैं हुस्न वो बेबाक

दिखती नही राह कोई, बच के निकल जाये जो दीवाना
हर राह हैं सनम से मेरी, बच के कैसे गुज़र ,जाये दीवाना

आशिक है महोबत से उनकी, घायल ये मेरे अरमान
देखा हैं नूर ए हुस्न का जलवा, कातिल उनकी हर चाल

जख्मी हैं अरमान मेरे, अधूरे कई ख़्वाब,
हर ख्वाब में रहती हैं वो, एक मेरी जान

हर अदा होती हैं हुस्न की संगीन,
करता हैं मुलाकाते दीवाना
ख्यालो में अक्सर अपने रंगीन

कहते हैं आशिक पुराने हैं रोग ए महोबत ये सदियों पुराना
चलता हैं तीर निगाहों से, बेबस हो जाता हैं दीवाना

कर के नज़र-अंदाज़ ज़माने जी रुस्वाइया
खड़ा हैं राह ए सनम, सनम का दीवाना

थाम के धड़कता-दिल, काँपते हाथो से अपने
ले रहा हैं नाम ए महोबत, चोखट से उनका दिवाना

 

रुख से पर्दा अपने हटा दे, चाल ये कोई नही
मरता हैं तेरे नाम से, अब भी तेरा दीवाना. ..

👤लेखन द्वारा ✍ विक्रान्त राजलीवाल।

(After some editing)
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