FB_IMG_1500173888415घिर आई रात फिर से चाँदनी, गुजरे जो साये से उनके दीवाने।
राह ये सुनसान सी कोई, दिख रहे गुलिस्तां भी जाने-पहचाने।।

 

आलम ये रुसवाई का जो, सिने से लगाये, दर्द ए दिल,अश्क-तन्हा, अधूरी सी यादे वो उनकी, अब भी जो उनके दीवाने।

रंग ए लहू ये लाल आसमां, रुकी-धड़कने, उखड़ी सी सासे, गुजरे चौखट से ख़ामोश उनकी, दर्द अब भी जो उनके दीवाने।।

 

कसक ये टूटे दिल, टूट गई जो धड़कने, कदम ख़ामोश से अपने।
सुना रहे हाल ए दीवाना, जख्म दिल के, अब भी जो उनके दीवाने।।

न मरहम लगे, न दुआ कोई, कत्ल-अहसासों पर जख्मी है जो अपने।
नासूर बन जख्म ए दिल, उभरे दर्द अहसासों से उसके, अब भी जो उनके दीवाने।।

लेखन द्वारा विक्रांत राजलीवाल।(नई कृती)

 

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