मिलते है कुछ लोग, ज़िन्दगी अनजाने ही।
बिछुड़ जाते है फिर एक रोज़ अनजाने ही।।

 

ढूंढता है दिल धड़कनो से धड़कने फिर साया उनका,
नही मिलते खो गए, जो साथी बन के साया अनजाने ही।

वो यादे, कोई ख्वाब, चाहत है दिल की, दिल से जो उनसे,
हक़ीकत कहो या अफ़साना उन्हें, भूल गए जो अनजाने ही।।

 

तड़प ये कैसी, बेचैनी है अब, दिल-धड़कनो मे ये जो अक्सर,
ये ख़ामोशीया, बुलाती है उनको, दफ़न है साय,जो अनजाने ही।

जख्म ये नासूर, हालात है अब, जख्मी दिल के ये जो अक्सर।
ये अश्क, ढूंढते है कफ़न, वीरान अहसासों से जो अनजाने ही।।

लेखन द्वारा विक्रांत राजलीवाल।

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