इस ज़माने में सदियों से है कायम जो।
नाम यक़ीन अहसास से है जख़्मी जो।।

अक्स है यार की यारी का इस दिल मे जो।
इन्तेहाँ है जिंदगी, यार पर अपने निछावर जो।।

एक खेल जज़्बात का, जज़्बात से है जज़्बाती जो।
उम्र, तजुर्बा, ये अपनापन, अपनेपन से है झलकता जो।।

रखना महफ़ूज, इस दिल मे हमेशा, धड़कनो से अपने, ऐतबार ए यार, ज़िन्दगी से अपने लगाकर।

न करना यक़ीन, दगा ये ज़िन्दगी, जिंदा है ज़िन्दगी, ए यार, हर गम ए ज़िन्दगी, साय से यार अपने हराकर।।

लेखन द्वारा विक्रांत राजलीवाल।

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