न दौलत से, न शोहरत से, न किसी जुल्मो सितम से।

बिक जाता है फिर भी, दिवाना एक नज़र महोबत से।।

 

अदाएं हुस्न है कातिल, कत्ल हर लम्हा बेदर्दी से, दीवाने का जो उनसे।

हर अदा है ख़ंजर, कोई ज़हरीला, गुजरता है बेदर्द जो धड़कनो से।।

 

जलता है हर लम्हा, तड़पता दिल, ये दिवाने का जो।

जख़्म है दिल पर, नासूर से उसके, सी गए सरे-राह जो।।

 

पुकारा आ कर करीब से, ए दिल, दिल के, दिल से जब उन्होंने अपने, वो नाम ए महोबत।

धड़क गया दिल करीब से, सुन सुर्ख गुलाबी लबो से, महबूब के अपने, वो नाम ए महोबत।।

 

उठती है कसक, रग रग में, अक्स ए हक़ीकत, ए वक़्त, आईना हक़ीकत का नज़दीक से जब दिखलाता है।

फट जाते है जख़्म, जख्मी इस दिल के नासूर बन कर,
अक्स ए यार, नज़र आईने में अधूरा जब महोबत का आता है।।

 

दर्द ए दिल, हाल ए दिल, धड़कनो से अपना बताता है।

रग-रग में सीसा कोई, पिघला फिर दौड़ जाता है।।

 

खो जाते है साय एक पल में, कायम सदियो से महोबत के क्यों।

राह ए महोबत, ये वीरान गुलिस्तां, टूटे दिल को तड़पता है क्यों।।

 

रंजिशें नही कोई मलाल ये, महोबत का महोबत से नही कोई सवाल ये दीवाने।

तड़प ए रूह, दिखता नही साया-महोबत, देखता हूं जब भी मै पलट के दीवाने।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

#Hindi Poetry, Shayari & Story Article’swriterpoetvikrantrajliwal-#

(10 august time 1:25 am)

 

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