जो ये ख़ामोश है आसमां, उफनते बदलो से यहाँ, अहसास कोई उठते तूफ़ान का है।

जो ये इंतजार सा है हर लम्हा, हर आहत से छिलते निसान, सवाल ये सकूं सासो का है।।

नादानियां ये कशमकश, उलझी सी जिंदगी, यक़ीन ये खुद पे खुद के ऐतबार का है।

टूटते साए, ये तड़पती धड़कने, दम तोड़ती आरज़ू, फ़रमान ये जख्मो पर मेरे, ज़हर सा है।।

ख़्वाहिश ये ज़िन्दगी, जिंदा सी है जो अभी,
हर सास एक दुआ, पैगाम कोई मौत सा है ।

टूटते ये आईने, अक्स बेजान सा है जो अभी,
हर खरोच ए जज़्बात, जख़्म-ज़िन्दगी ताज़ा सा है।।

ज़हर है जख़्म,जो धड़कनो पे नासूर मेरे
जुल्म ये दम तोड़ती जिंदगी।

ख्वाहिशे है जिंदा, जो हर सास में कायम मेरे
सितम ये अहसास ए ज़िन्दगी।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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