FB_IMG_1502907998094स्वार्थ, जी हां स्वार्थ! कहने को तो एक शब्द है स्वार्थ, पर हर दुख, हर तकलीफ की जड़ है स्वार्थ। आज हर कोई किसी न किसी स्वार्थ से अपनी अनमोल जिंदगी जिए, या यूं कहें कि बर्बाद किए जा रहा है।

किसी को अच्छे-खाने का तो किसी को पीने का(मदिरा-सूरा) का स्वार्थ है। तो किसी को भौतिक-वस्तुओं का स्वार्थ है।
आज कल तो रिश्ते भी स्वार्थ पर कायम है।

आज का मनुष्य इतना स्वार्थी क्यों हो गया है? ईश्वर, आल्हा या जिस किसी को भी आप अपने जीवन की शक्ति मानते है उस शक्ति ने तो आपको स्वार्थी बना कर इस जमीं पर इस धरती पर नही भेजा!

फिर आप मे यह स्वार्थ नामक दोष क्यों और कैसे उत्तपन हो गया? इस बात को जानने की क्या कभी आपने कोई भी एक कोशिश अपने सम्पुर्ण जीवन-काल मे कभी करी है! या इसका उत्तर आपको मिल सका है?

इस स्वार्थ नामक ज़हर के पिच्छे एक महत्वपूर्ण कारण छुपा हुआ है। क्या है वह कारण, क्या आप यह जानते है?

जी हां आप जानते है! पर मानते नही, क्या है वह कारण जो आप स्वार्थी हो गए?

मेरे मित्रो, मनुष्य के हर स्वार्थ के पीछे,या यूं कहें हमारे हर स्वार्थ की उतपत्ति का कारण होता है हमारा एक और स्वार्थ, जो हमारी उन दुर्बल-भावनाओ से जुड़ा होता है जो इस संसार मे हर-दुख और तकलीफ का कारण है।

जी हाँ यह मेरा इशारा हमारी भृमित सोच की तरफ ही है।
हम स्वार्थी है क्यों कि हम भावुक है अपनो के लिए, उनकी खुशी में अपनी खुशी धुन्डने के लिए। चाहे इसके लिए हमे स्वार्थी हि क्यों न बनना पड़े!

यह है हमारी भृमित सोच। क्या कभी अपने उन व्यक्तिओ की सोच, उनकी असली खुशी जानने की कोशिश की है ! जिनकी खुशी के लिए हम स्वार्थी बन गए। और न जाने कितने ही निर्दोषो को अपनी इस स्वार्थ की अग्नि में भस्म कर दिया!

जी हा आपके अपने भी नही चाहते कि आप स्वार्थी हो जाए। क्योंकि कोई भी आपका अपना आपको एक स्वार्थी के रूप नही देखना चाहेगा।

स्वार्थ चाहे कोई भी क्यों न हो उसमें से हमेशा ही किसी अपने के खून की, उसके विशवास के पतन की पतित, घिनोनि बदबू आती है।

और निःस्वार्थ किया गया कर्म, आपको आपके अपनो को एक अलौकिक शांती के मार्ग की ओर आगे ले जाएगा।

और यह निस्वार्थ रूपी किया गया कार्य, एक सच्चा अध्यात्म, एक रूहानी, कार्य बन कर सम्सत्य संसार को एक धागे में पिरोने का कारण बन जायेगा।

जहा कोई भी स्वार्थ किसी गरीब को तकलीफ पहुचने की हिम्मत नहीँ कर पाएगा। और आपको भी भृमित करने की शक्ति उसके पास शेष नही बच पाएगी।

इसीलिए…

😊ए स्वार्थ तू अब हो जा निष्पाप, देख के दर्पण सच्चाई का।।
मिल जा, मिटा जा, हो जा भस्म, कर ले कर्म तू भलाई का।।

सच्च भी जो तुझ को जो दिख न पाए।
तकलीफ गरीब की किसी, झंझोर न तुझ को पाए!

तो जान ये सकूं सासो का, तड़प हर लम्हा धड़कनो में जो तेरी।
आईना ये अक्स, नज़रो की खामोशिया, शर्म खुद पर, जिल्लत जो तेरी।।

तड़पाएगी अपनो को, जान हक़ीक़त, ये बदसलूकी खुद ही खुद से है जो तेरी।
ए स्वार्थ अब तू हो जा निष्पाप, कर ले कर्म सच्चाई का, छुपा है अब भी रूह में जो तेरी।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
m.facebook#Adhayatam Se Mukti Tak With Vikrant Rajliwal-#

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