FB_IMG_1502907984388कत्ल बेदर्दी से कर के एक बेगाने का, जुल्म ओ सितम मुस्कुरा रहे है जो।
हर ज़ख्म पर, खुद ही न जाने क्यों उसके, फक्र-इतरा रहे है जो।।

असां नही धड़कनो को रोक कर, जख्मो को अपने, खुद ही नासूर बनाना।
एक प्याला जो ज़हर का, न चाहते हुए भी हलक से अपने, खुद ही उतार जाना।।

जिंदगी का जिंदगी को, जिंदगी से अब भी है सवाल एक।
जख्मो पर सकूं-मरहम अपने, इंतेज़ार अब भी है निशां एक।।

कत्ल अहसासों का, बेदर्दी से है खुद अहसासो से जो अपने
हर अहसास, ख़ामोश सा है खुद अहसास हक़ीकत से जो अपने।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

#Hindi Poetry, Shayari & Story Article’swriterpoetvikrantrajliwal-#

 

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