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देश के किसी शहर में हो या देश के किसी गाँव में,
पीड़ा से हैं जो भी पीड़ित, पड़े हैं छाले जिसके पाव में!

जी रहा हैं घुट घुट के जो, किसी अपने की तलाश में,
खड़ा हैं अब भी जो बदलाव के उस धुंधलाते साये के इंतज़ार में!

मिट-मिट के भी, मिटने नही दी हैं जिसने, धुंधलाती हर एक आशा, धुन्धलाते अपने मन में!

ठग जाता है बेशक से हर बार वो, देख के आईना सचाई का
लिप्टा हैं तंगहाली से, भरता हैं फिर भी दम अच्छाई का!

जी हाँ, मैं भी हूँ वही, एक आम आदमी, जूझता हैं हर रोज़ ही जो,
खुद अपने से, बदलने को तक़दीर रूठी है अपनी जो!

जी हाँ, करता हूँ बगावत मै भी खुद ही खुद से,
मरता हू हर रोज ही जो,
जीने को, दम तोड़ती उम्मीद से, अभी शायद जिंदा है जो…पर!

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

#Poetry, Shayari, Story & Article’s with writer poet vikrant rajliwal-#

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