जल रहा समाज, झुलस रही भावना।
घायल पड़ा विशवास भी, झेल रहा वेदना।।

मायूस खड़ा, जो देख रहा, राह विकास से अंजान।
पड़ गए है छाले-पैरो तले, जीने की रही न अब चाह।।

विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।

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