छिल जाते है जख्म, ख़ामोश इस दिल के तमाम,

देख लहू, टूटा वो पुष्प, ढाली से किसी के सरेआम।

ये सभ्य-समाज, ये निर्दय भावनाएं, भाव-असुरक्षा के तमाम,
देख लज्जित-मर्यादाएं, क़त्ल इंसानियत का सरेआम।।

टूट गया जो आइना, अक्स मासूम का जिसमें लहूलुहान,
तड़प गई आत्मा, देख कृत्य गुनहगार का सरेआम।

मंदिर कहूं या विद्यालय, या कहूं मौत का उसको द्वार,
कुचला गया हर धर्म यहा, कत्ल इंसानियत का सरेआम।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित हमारे सभ्य समाज से इंसानियत की भावना के पतन की पीड़ा से उत्पन्न एक दर्द, एक अहसास! जिसे शायद शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

फिर भी जब भी कभी ऐसी कोई खबर जिसका सम्बन्ध एक बेगुनाह मासूम के लहू से, उसके जीवन से जुड़ा होता है तो हृदय को बेहद आहात या चोट पहुंचती है।

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