होती है हर पहचान मुसाफ़िर, वक़्त नसीब से जिंदगी में अपने।
हर कदम है मन्ज़िल, सफ़र सदियों से तन्हा, साथ अब भी जो अपने।।

जिद है जनून ये जिंदगी, ये दौड़ता लहू, फड़कती रगों में अपने।
हर बून्द है श्याही, बग़ावत ये लहू, अब भी रगों में जो अपने।।

विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।FB_IMG_1506966591895

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