ग़ुलाब!

हुस्न ए गुलाब, हर पंखुड़ी को दीवाने ने तेरी, बेदर्दी से कुचलना है।
महक को तेरी, सासो से जिस्म-रूह में अपनी अंदर तक उतारना है।।

कलिया गुलाब की तोड़ कर, गुलिस्तां उजाड़ कर दिया दीवाना।
हर ज़ख्म-टूटी वो मासूम कलिया, जख़्म ए दिल, खुद दिल पर अपने दे गया दीवाना

रचनाकार विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।FB_IMG_1508169980042.jpgFB_IMG_1508170809511.jpg

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