FB_IMG_1508031125201होती है मुलाकात, ख्वाबो में ख्वाबो से अपने ए गुलाब, रंगीन तुझ से जो ख्वाब अपने आजकल।
हर ख्वाब है जिंदा, ख्वाबो में अब भी ख्वाब जख्मी कई, हर जख़्म-नासूर है ख्वाब जो अपने आजकल।।

गर कर गए है जो तन्हा, धड़कने-लहू-जिगर से नाम ए महोबत, जुल्म वो जालिम अदाओ से अपने आजकल।
हर जख़्म है एक जुल्म-हक़ीक़त का टूटा-आईना, दर्द ए दिल, लहूलुहान जो ख्वाब अपने आजकल।।

दफ़न है तम्मना, एक फ़रियाद बाकी, नूर ए नज़र, दीदार ए हुस्न वो तेरा, ख्वाबो में अब भी अपने आजकल।
परत है खरोच कोई, धड़कनो पर मेरे, बदल गयी जो सूरत ए यार, ख्वाब फ़रेबी जो अपने आजकल।।

ये इश्क है महोबत, फड़कती हर नब्ज से, झलकती आरज़ू, महक सासो में सासो की, ख्वाब अब भी कई अधूरे बाकी, जो अपने आजकल।

एक तड़प है महोबत, महोबत का महोबत से, इज़हार ए महोबत, निसान धड़कनो से धड़कनो का अधूरा एक, ए हुस्न ए गुलाब, ख्वाबो में जो अपने आजकल।।

रचनाकार विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।

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