FB_IMG_1508943896492.jpgयह अद्धभुत संसार, यह सुंदर प्रकृति हमारी

चाहती है एक बदलाव।

छुपा है सदियों से, हर कण-कण में यहाँ

कही न कही, कोई न कोई, एक बदलाव।।

पहले बचपन, फिर जवानी, अंतिम रूप बुढापा

बदल जाता है यह देह भी हमारा।

बचपन की दुलार, जवानी की तकरार,

फिर है बुढापा मोहताज,

झेल कर सब सबक-जिंदगी के, चला जाता है,

छोड़ कर नष्वर ये संसार, देह फिर हमारा।।

मौसम बदला, समा बदला, बदल गया ये सारा

संसार।

पहले था मौसम जहा, सुहाना, अब है सिर्फ

काली रात।।

रात भी काली ठहर न पाई, हो गया जब आत्म-

साक्षात्कार।

यही है अंतिम ज्ञान, चेतन है यह आत्मा हमारी

कर लो अब तुम यह ज्ञान।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

 

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