FB_IMG_1509257727466दिखलाती है ज़िन्दगी, हर कदम पे, करीब से अपना रंग।

बतलाती है लहू-ज़िगर, वो अधूरी दास्तान, हर रंग से अपने।।

दे देती है, दर्द कोई, बिछुड़ा फिर से,आता है बदल के,रूप

सामने, फिर से वो दर्द।।

दहलीज है बिछुड़ती जवानी की, आगाज है बेदर्द-बुढ़ापे का।

समा है ऐतबार से, महफ़िल है आबाद फिर से, एक दीवाने की।।

हो गया एक रोज़, दीदार ए यार, धड़कने ये खो गयी।

लौट आईं, महोबत दिल में, खोई आरज़ू, जाग गयी।।

किया है मज़ाक, ज़िन्दगी ने, ज़िन्दगी में दिन ये कौन सा आया।

दहलीज़ है बुढ़ापे की, बिछुड़े यार से, ये सितम, जिस-पर मिलाया।।

एक रोज, एक दम से, दीदार ये किस-का हुआ।

देखते ही ये दिल जान गया, हा इसी से तो प्यार हुआ।।

एक ज़माने के बाद, ये किस-ने नज़रो से नज़रो को मिलाया।

करीब दिल के, आकर मेरे, ठहरी ज़िन्दगी से बेजान दिल को

धड़काया।।

सितम इस दिल पर हो रहा, तोड़ कर बिजलिया, धड़कनो पर,

बेदर्द सावन भी रो रहा।।।

इंतेहा, दर्द ए दिल, महोबत जो अब हो गयी, ज़माने की है

रुसवाई।

बरस गए, आँख से आँसू, बात है दिल की, दिल को जो दिल ने बतलाई।।

आई है बन कर, सावन की बहार, बे-मौसम ज़िन्दगी, बंजर-

बियाबान।

मुस्कुराहट है गुलाबी लबो पर उसके, जाग गए देख के,

करीब से दिल के अरमान।।

दर्द है जुदाई का, उसके भी जख्मी सिने में।

कहना चाहती है वो भी कुछ, सुनना चाहता हु में भी कुछ।।

कर रहे दीदार दोनों, बिछुड़े एक ज़माने से।

सदियों से खमोश लब, बेड़िया अब भी ज़माने से।।

लकीर है मिटने लगी, वख्त की यू ही आज अचानक से।

याद है वो दिन, धड़कने बढ़ने लगी, ज़िन्दगी की जब अचानक से।।

बदला-मौसम, समा बदला, बदल गए सन नज़ारे।

आ जाती है याद ज़िन्दगी, तमाम अधूरी वो बहारे।।

नादां उम्र से, नादां धड़कने, नादां थे वो अफ़साने।

हो गए ज़माने से जो, नादां थे वो फ़साने।।

याद है…

याद है अब भी, सावन की वो बात।

नीरस थी ज़िन्दगी, पूरे चाँद की वो रात।।

बेजान मौसम में, एक रोज जान आ गयी।

सुन-सान गली माहौले, की धड़कने जाग गयी।।

तन्हा थे लम्हे,अजीब से जो खामोश

उनसे जो एक अहसास हुआ।

देख कर खुशनुमा मौसम,

फिर मुझे विशवास हुआ।।

चारो ओर एक खामोशी सी छा गयी।

माहौले में मेरे, रहने को एक हूर आ गयी।।

एक इत्तफाक, किस्मत ने मेरे साथ किया।

घर के सामने मेरे, उसने एक घर लिया।।

देख कर उसको, ये दिल धड़क गया।

जाने को करीब उसके, ये मन मचल गया।।

देख कर नज़ारा-हुस्न, मौसम भी मदहोश हो गया।

हर अदा थी कातिल उसकी, दिल-दीवाना कही खो गया।।

गिरती थी हुस्न-शबाब से, बेबस दिल पर बिजलिया।

चलती थी इठला कर, भूल जाता दिल भी धड़कना।।

कतार घर के सामने, मनचलो की, उस-के लगने लगी।

करने को दिदार-हुस्न, जंग उन-में, कोई खूनी मचने लगी।।

देख कर नज़ारा, ये बर्बादी का अपनी, मन मेरा कूछ परेशान

हुआ।

करता हूं, महोबत मैं भी उस-से, जान कर हाल-दिल हैरान

हुआ।।

करता हूँ दिदार-हुस्न, नज़रे बचा खिड़की से अपनी।

जीत हूँ, मरता हूँ, तन्हा, घुट-घुट, किस्मत से अपनी।।

नही आती है, नींद बेदर्द रातो से आज-कल।

सताती है, याद-दिला-रुबा, अब हर-पल।।

दीवाना सारा जहां, लगता है उसका।

हर कोई है, जलने को आतुर

परवान सारा जहां, लगता है उसका।।

सुर्ख गुलाबी लबो पर, निकलती है, लगा कर लाली वो जब।

लग जाती है दीवाने,मनचलो में उसके, कोई होड़ तब।।

एक शोर सा मच जाता है, भरे बाजार में।

छुरिया चल जाती है कत्ल हो जाता है

भरे बाजार में।।

देख कर हुस्न-मदमस्त, वख्त भी ठहर जाता है।

एक दिदार के खातिर, हर कोई मचल जाता है।।

देख लेती है, उठा कर जब भी, मदहोश निगाहें वो अपनी।

बेबस दिल-दीवाने का धड़क जाता है।।

महोबत जताने को अपनी, वो तड़प जाता है।।।

न जाने क्यों, एक रोज महोबत ने रंग अपना दिखलाया।

हुस्न को है, इश्क से काम, नाम-महोबत, दीवाने को बुलाया।।

देख कर नज़दीक से, बदन वो कातिल-हुस्न उसका,

बुरा हाल था।

शराबी निगाहों के वॉर, वो मन-मोहक शारीरिक उभार

जीना अब दुशवार था।।

धधक रहे थे गुलाबी, नाजुक वो लब उसके।

झुलस रहा था दीवाना, तपिश से उसके।।

एक रोज, नज़रे-चार, अनजाने ही, उनसे हो गयी।

कर नज़दीक से हुस्न-दिदार, धड़कने खो गयी।।

वो आए करीब, इस दिल के, वो एक नशा था।

देखा नशीली निगाहों से, उनमे एक नशा था।।

कर रही थी दिदार -हुस्न, जो नज़रे नज़दीक से।

उठा था दर्द-धड़कने, देखा जो उनको नज़दीक से।।

अक्सर होती है, मुलाकात उनसे, मुस्कुरा कर, आता है हुस्न वो

करीब।

जगा कर आरज़ू,खोई कोई तमन्ना, खो जाता है कसम, फिर वो

नसीब।।

अरमान दिल के अब जाग गए, एक ही पल में दीवाना, जहां

सारा पा गए।

खिल उठे महोबत के फूल, रेगिस्तान से दीवाना, गुलिस्तां-

महोबत पा गए।।

मुस्कुराता है देख कर, अदा से, अल्हड़ वो हुस्न जब।

करता है वॉर, घायल-अरमानो, बेबस-दिल पर जब।।

भूल जाता है धड़कना, रुक जाता है दिल वही पर जब।

बेजान सी है जो धड़कने, धड़कना चाहती है वो जब।।

लव है खामोश, एक थरकन सी उनमे, चाहते है कुछ कहना,वो

जब।

आलम है बेबसी, दिल के अरमान, हो जाते है खमोश, दोनों वो

जब।।

आती है दिल-रुबा, वो दीदार ए यार, चलते है तीर-हुस्न, निगाहों

से अक्सर।

धड़कता-दिल, धड़काते है, हुस्न ए यार, और भी, खामोशी से

अक्सर।।

होता है इज़हार ए महोबत, नज़रो से दीवाना, वो अक्सर।

करते है गुफ्त-गु, नज़दीक-यार, साये से उनके, वो अक्सर।।

आलम ए बेबसी, वो इज़हार ए महोबत, तरसता है सुनने को,

दीवाना वो अक्सर।

यकीन ए महोबत, ख़्याल ए तन्हाई, रुक जाता है ख़ौफ़ से,

दीवाना वो अक्सर।।

दीदार ए यार, समा ए ऐतबार, मिलता है तन्हाई से अक्सर।

तीर ए महोबत, जख्म ए दिल, दिखते है रुसवाई से अक्सर।।

न जाने है गहराई-दिल, सितमगर उस सनम की दीवाना।

धड़कते-दिल, धड़कनो को, एक पल भी वो आराम नही देती।।

जो है महोबत, दीवाने से उसे, नाम-महोबत, बन्द लबो से वो,

क्यों बोल नही देती।।।

महक जाता है, बदलता है रंग, शर्म-ह्या से, गुलाबी, वो उसका

मासूम चहेरा।

पुकारता है दर्द-दिल, करीब से , नाम ए महोबत, दिल वो

उसका दीवाना।।

धड़कती जवां धड़कने, उफान एक उनमे आ गया।

यकीन ए दीवाना, सनम के अब वो करीब आ गया।।

किया मज़ाक, ए वख्त, हाल ए दिल, एक रोज़, सनम को

धड़कनो से जब सुनाया।

समझा सनम ने दिल-लगी, ए मुकदर, दिल-चिर दीवाने ने,

फिर अपना दिखलाया।।

बदला रूप, फिज़ाओ ने, हालात जो खिलाफ, हो गए।

पहले झुके पहेलु, में वो, फिर लिप्ट के रो दिए।।

किया इजहार ए दोस्ती, महोबत का उसमे नाम नही।

महोबत तो है ए दोस्त, मग़र, मक्कारी कोई उनमे नही।।

बन कर दोस्त, आती है दिलरुबा, जब भी कोई नज़दीक,

नज़रो के सामने।

एक आरज़ू, लव्ज़ ए महोबत, दब जाते, दिखती है जब वो

नज़रो के सामने।।

रहता है इंतेज़ार, एक अहसास, वो पल है महोबत, जिस पल

उसे भी हो जायगी।

तड़पेगा-दिल, एक रोज़, सितमगर का, ए महोबत, जिस पल

उसे भी महोबत, दीवाने से हो जायगी।।

हुस्न के दीवाने, इंतज़ार ए हुस्न, हाल कई मनचलो का बेहाल

देखा।

दीदार ए हुस्न, बांधे टक-टकी, नज़रो में, अंजाम कइयो का बुरा

देखा।।

चीर दी है सरे-राह, कइयो ने नसें, शरीर की अपने,

हुस्न-शबाब के वास्ते।

फोड़ दिए है सरे-राह, बेमतलब कइयो ने सर अपने

आपसी तकरार के वास्ते।।

हाल दीवाने का भी, बेहाल नज़र आता है।

देख कर दीवाने-सनम, दिल तड़प जाता है।।

मौसम है बिन, दीदार ए सनम, ये कैसी वीरानी।

हालात है खिलाफ ए महोबत, ये कैसी ज़िन्दगानी।।

ज़िन्दगी-उजाड़, ये किस तन्हाई में, खो गयी।

सनम-सितमगर, क्या किसी गैर की हो गयी।।

जख्म ये गहरा, टूटे दिल पर, एक रोज,कैसा पड़ गया।

देखा जो सनम को अपने, न जाने क्यों, वो तड़प गया।।

आ रहे थे सनम कहि से, शायद कहि पे जा रहे थे।

आईना ए महोबत, वो अक्स नज़रो में, किसी गैर का,

महोबत एक दूसरे से, फरमा रहे थे।।

गुजर गए न जाने मौसम कितने, कितने ज़माने बीत गए।

तड़प ए दिल, तन्हाई से दीवाना, जख्म न जाने टूटे दिल

पर कितने पड़ गए।।

तड़प टूटे-दिल की, अब बर्दाश नही होती।

सताता है ख़्याल ए सनम, बिन सनम ये ज़िन्दगी,

आवाज़ दिल के वीराने से कोई ,अब नही होती।।

बदमिजाज जो मौसम, एक रोज हो गया।

अहसास ए ज़माना, हर कोई यहाँ खो गया।।

वख्त की लकीर पे, एक हादसा, जो अब, हो गया।

आशिक-दीवाना कोई सनम का, सनम को, ले गया।।

तन्हा छोड़ दीवाने को, उड़ गए किसी तन्हाई में

पँछी महोबत के वो।

आई-न याद, दीवाने की, तन्हा मार गए, तन्हाई में

एक दीवाने को वो।।

करी है महरबानी, जो, बेबस अपने एक दीवाने पर,

खून ए ज़िगर, छोड़ दिया, चौखट पर, तन्हा एक पैगाम।

पड़ा है जख्मी, तन्हा वही पर , चोखट से मेरी

तन्हा सनम का, आखरी वो एक पैगाम।।

लिपटा है एक गुलाब उसमे, काँटे हज़ारो, रुसवाई के

चुम रहा है बेबसी से, चोखट को मेरी, वो तन्हा एक पैगाम।

टूटे-दिल की टूटी धड़कने, भूल गए जो अपना नाम

ठहर गयीं हर सास, जाम है रगों का उफ़ान।।

काँपते हाथ, थरथराती जुबां, मासूम है वो अरमान।

पढ़ रहे महबूब का अपने, आखरी है वो फरमान।।

चिर दिया इश्क़ ने, दिल अपना निकाल।

नम आँखों से, पढ़ के वो, तन्हा एक पैगाम।।

हर लव्ज़, वो हर अक्षर थे उसके, सुना रहे जो।

हाल ए दिल, सनम की दास्तान।।

नम आंखों से, लिखी है जो, इल्तिज़ा वो आख़री।

कर रहे दर्द-बयां, अश्को के उसपे, वो निसान आखरी।।

दिल के थे अरमान, चले गए साथ,जो उसके, वो आखरी।

झलक रहा, दर्द ए दिल, हर लव्ज़, वो अक्षर थे उसके, आखरी।।

लिखा है खून श्याही से जो, अपने दिल का हाल।

पढ़ रहा है, दीवाना, दिल को अब जरा सम्भाल।।

हो गए जो दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न मुझे तुम याद।।

जा रही हूं छोड़ कर, चौखट पर तुम्हारी एक पैगाम।

पढ़ लेना तुम उसे, लिपटा है जिस-से एक गुलाब।।

याद न करना कभी, समझना कोई ख़्वाब।

टूटेगी नींद जब तुम्हारी, टूट जाएगा यह ख़्वाब।।

अलविदा ए यार, आखरी, रखना अपना ख़्याल।

दिख जाएगा जल्द ही, ज़माने में, तुम को भी,

हसीन कोई ख़्वाब।।

करे महोबत दिल से जो, देना तुम उसका साथ।

भूल जाना मुझ को तुम, दे देना उसे यह गुलाब।।

जा रही हुं, अब दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न मुझे, अब तुम याद।।

तड़प गया दिल, बिखर गई, टूट के हर सांस।

पढ़ कर महबूब का अपने, आखरी वो फरमान।।

टूटा जो दिल दीवाने का, आती है दिल से, एक फ़रियाद।

खड़ा है राह ए सनम, करता है अब भी दीवाना, सनम-याद।।

दिल में है महोबत उसकी, हर धड़कन में, उसका इंतज़ार।

रुकी है ज़िन्दगी, ठहर गयी सास, हर सांस में, उसका प्यार।।

तड़पता दिल, टूटी धड़कने, ले रही है, दीवाने-सनम, अहसास-महोबत, का इम्तेहां ।

आरज़ू एक महोबत, बेताब है हर सांस, दे-देगा दीवाना, अब भी महोबत-हर इम्तेहां।।

जला देगा, सितम ए इश्क, मिटा देगा ए महोबत, खुद को दीवाना।

धड़कता दिल, बन्द सीने से जो, हुस्न-सनम का, अब भी वो दीवाना।।

दास्तान ए महोबत, जख्मी है दिल, जो हो गया।

हुआ दीदार-सनम, दीवाना फिर से है वो खो गया।।

तड़प ए दिल, बेबस है बेहिंतिया, जो एक दीवाना,

अंजाम ए महोबत, दिखती नही।

राह ए सनम, एक रोग है महोबत, जो आशिकाना,

दर्द ए दिल, क्यों मिटता नही।।

दम तोड़ती-महोबत, सुनाती है हर धड़कन, अब भी महोबत का तराना

अहसास ए जुदाई, ये दीदार ए सनम, खिले जो गुल, खो गया वीराना।।

धड़कता है दिल, तो धड़कनो से एक आवाज़ होती है।

हर धड़कन, नाम ए महबूब, दीवाने के साथ होती है।।

इंतज़ार है एक धड़कन, वो राह है सुनी, खड़ा एक ज़माने से जहा सनम-दीवाना।

आरज़ू है एक अधूरी, थामे है हाथो में अपने, अब भी गुलाब वो वर्षो पुराना।।

रचनाकार विक्रांत राजलिवाल द्वारा लिखित।

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