FB_IMG_1508984652763जीवन के हादसे, कब खेल बन गए।

ये खेल हादसों के, अब सच्चाई बन गए।।

बेहोशी से हो गयी, हार पर हार।

हर बार हो गया, दिल पर वॉर।।

अहसास चेतना का जब हुआ।

बन गया खेल, ये फिर हादसों का।।

न जाने कमी क्या, हर बार रह जाती है।

रोशनी दिख कर, कहि क्यों खो जाती है।।

क्यों यह जमाना, मुझ से जीत गया।

जल कर भी, तन्हा जो अब रह गया।।

वो एक कोशिश, एक हादसा था।

बदलना खुद को, एक हादसा था।।

कोशिश भी अंजाम तक न पहुच पाई।

बदलना खुद को, दहलीज़-मौत ले आई।।

हार गया है बेगाना,टूट गया जो दम खुद से।

हर चाल, वो शह, ये बेरुखी है खुद से।।

हर कदम, वो निसान, जख्मो से मेरे है लहू-लुहान

खिंची थी लकीरे, जो चंद, आजमाइशे अपनी

मिट चुकी है दम तोड़ती, हर ख्वाहिशो से…

रचनाकार विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।

एक खेल…ज़िन्दगी।^2^

मिसाल ए हिम्मत, बढ़ता वो कदम
सख्त है बेहद, वो बेड़िया
बढ़ते हर कदम से जो जुड़ गई।

टुटता हौसला, सुनी वो निगाह
दर्द है बेहद, वो गहराइयां
झुकती हर पलक से जो झलक गईं।।

ठोकर लगी, तो गिर गया।
टूट ऐसा, के बिखर गया।।

ठोकर है ज़िन्दगी, बेदर्द-समा, हर एक अहसास।
तन्हा है लम्हा, बिखरी ज़िन्दगी, हर एक अहसास।।

हर ठोकर-ज़िन्दगी, अहसास एक हुआ।
गिरा उठा, फिर से जो गिर गया
तो अहसास एक हुआ।।

न जाने, था वो क्या, हुआ जो अहसास एक।
अहसास है, हुआ था जो, अहसास वो एक।।

जल गई थी रस्सी, ज़िन्दगी, जो शायद पूरी तरह।
बच गया था बल, उसका कोई, शायद उसमे बुरी तरह।।

अहसास है, दर्द-बेबसी, आखरी वो निसान
घायल है, लम्हा, वो बल आखरी, जो टूट गया।

तम्मना वो जीने की, एक सपना अधूरा
बेबस वो अहसास, एकदम जो छूट गया।।

ऐसा क्यों लगता है, पँछी मर जायेगा।
जीत जाएगा, हर जुल्मो-सितम
पँछी तड़प-तड़प कर मर जायेगा।।

खामोश है ज़िन्दगी, हर लम्हा जिसने जलाया।
हर सास ज़िन्दगी, जिसने काटो पर चलाया।।

दौर-आखरी, ये सफ़र है तन्हा
बन्द पिजरा, जिसमे टूट गया।

राह-शूल, लिपटे है अनन्त
छोर जिसका, जो छूट गया।।

जख्मी है पंख, हालात ए ज़िन्दगी
चले जो उठ कर, दम वो अब नही।

रात है काली, ये वख्त की बात
सुहाना कोई ख़्वाब, अब नही।।

सफ़र ए ज़िन्दगी, यहाँ हर लम्हा है खामोश।
जनून ए ज़िन्दगी, यहाँ हर अरमान है खामोश।।

उम्मीद आखरी, गुम-नाम वो मंजिल।
सुनी ये राह, उखड़ती सासे
कर पाएंगी क्या, उसे अब हासिल।।

बंजर-माहौल, सूखता है कण्ठ।
एक चाह आखरी, टुटता है दम।।

रचनाकार विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।

एक खेल…ज़िन्दगी^३^

बंजर माहौल, खुखता है कण्ठ।
एक चाह ज़िन्दगी, टुटता है दम।।

सफ़र है तन्हा, ये समा वीरान, उड़ रहा वो पँछी।
जख्मी है अरमान, पंख, वो सासे है उसकी लहूलुहान।।

आग उगलती ये फ़िज़ाय, न कोई दरख़्त, न कोई ओट,
दम अब उसका टूटने लगा है।

प्यासा ये कण्ठ, एक बोल ज़िन्दगी, ये बेदर्द हवाएं,
मुँह ज़िन्दगी से मुड़ने लगा है।।

होता है नादां-परिंदा, अहसास जो एक
बदलेगा मौसम, थामे हुए,वो आस जो एक

बरसेगी कोई बून्द, प्यासे कण्ठ से उतरेगी।
रुकी सासे, ठहरी ज़िन्दगी कभी तो सम्भलेगी।।

ए वख्त बिछाए है जो जाल, बेदर्दी से जगह-जगह।
हर लम्हा है जिनसे, लहुलुहान मेरा जगह-जगह।।

घायल अरमान, जख्म ए हालात,अब और है गहरे।
तड़पती धड़कने, उखड़ती सासे, हर ओर है पहरे।।

ये पँछी है ज़िन्दगी, जिसे उड़ना ही है।
हर ठोकर है अहसास, जिसे सम्भलना ही है।।

देखना है ज़ोर-ज़िन्दगी, बाकी है कितना, बेबस पँखो में अब तेरे।
दम तो पहले ही घुट चुका है धड़कने ही बाकी है सीने में बस तेरे।।

रचनाकार विक्रांत राजलिवाल द्वारा लिखित।

One thought on “एक खेल… ज़िन्दगी। (सम्पूर्ण दास्तां)

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