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Posted on August 30, 2017

क़त्ल ए अहसास।

लेती है हर मोड़-ज़िन्दगी, फिर से एक इन्तहां नया।
देती है ज़ख्म अहसासों पर, फिर से एक अहसास नया।।

नही कोई आरज़ू, कोई ख़्वाब ना बाकी रहा।
सितम हर आरज़ू, हर ख़्वाब मेरा टूटता रहा।।

कशमकश अब भी है हर लम्हा जारी, सासो का चलना जारी रहा।
बिसात ए वक़्त, हर बाजी हारी, सिलसिला ये हार का जारी रहा।।

वॉर ख्वाहिशों पर मेरे, हर ज़ख्म-नासूर-ज़िन्दगी ताज़ा रहा।
न दुआ, न मरहम लगी, कत्ल-अहसासों का सितम जारी रहा।।

एक ख़्वाहिश, एक चाह ज़िन्दगी, धड़कनो का ये रुक जाना बाकी रहा।
हर धड़कन, एक कर्ज-ज़िन्दगी, कर्ज़ धड़कनो का धड़कनो पर मेरे बाकी रहा।।

विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।

Poetry, Shayari, Story & Article’s with writer, poet, Vikrant Rajliwal-

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