अक्सर सुनता हूं मैं कई जगह, कई तरह से, एक गूंज कि हिंदी को बचाओ, हिंदी को बचाना है!
फिर चिंतन, फिर मनन, एक एहसास कि हमे हिंदी को बचाना है या हिंदी ने हमे बचाया है।

जी हाँ हिंदी मेरे देश की मात्र भाषा, दर्ज मिला है जिसे सविधान से, क्या वह इतनी कमज़ोर हो गयी है और हम इतने अधिक शक्तिशाली, कि आज वह कई महानुभवों को कमजोर और असहाय प्रतीत होने लगी है!

हिंदी है हम वतन है हिंदुस्तान हमारा!

हम क्या बचाएंगे, हमे ख़ुद बचाया है हिंदी ने, मां की तरह अपनी गोद में सम्भाला है हमे हिंदी ने!

फिर भी इस दिल को ठंडक पहुचती है यह गूंज कि हिंदी को बचाना है!

FB_IMG_1509881597610रचनाकार एवं लेखक विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।

Advertisements

Leave a Reply