FB_IMG_1512302872069.jpgअक्सर सितमगर एक हसीना का, दीदार किया करता हूँ

आती है जब वो सामने तो मुह फेर लिया करता हूँ

देखना तो चाहता हूँ उसको मैं जी भर

मगर न जाने उसके हाव भाव से, क्यों डर जाता हूँ

उस सितमगर हसीना की शख्सियत भी कमाल लगती है

उसके चेहरे पे हमेशा आग ग़ुसे की दिखती है

चमक से उस आग की , ठिठर जाता हूँ

ख्यालो में मगर, उससे अक्सर बतियाता हूँ

उस समय हिम्म्त, मुझ में भी कुछ, जाग जाती है

सुनाने को हल-दिल, तबियत मेरी भी मचल जाती है

फिर देख के हाव-भाव वो चहरे के उसके

दम तोड़ महोबत, मेरी जाती है

उसकी उस चेहरे की आग से क्यों जल जाता हूँ

करता हूँ महोबत, जब बेहिंतिया उससे

ये उससे क्यों, कहे नही पाता हूँ

चाल क्या चल जाती है वो, तन्हाई में अक्सर मुझ से

बतियाती हैं वो

आती है सामने जब वो सब के, तो मुझको भूल जाती हैं

जख्मी दिल इस तरह, सरेआम वो मेरा कर जाती है

दिखा के चहरे की आग अपने, इस दिल पे जख्म

दे जाती है…

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

^Writer & Poet Vikrant Rajliwal’s Poetry, Shayari & Article’s-^ view on  tumblr & plus google blogger site

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