FB_IMG_1512305066838.jpgवह छवि जिससे शायद में अनजान हु या शायद जिसे मैं जानना नही चाहता। वह छवि जो शायद कहि खो गयी है या शायद जिसका क़त्ल कर दिया गया है। जो आज भी कहि न कही मेरी रूह के किसी वीरान कब्रिस्तान में कहि दफ़न है। जिसे मैं शायद जिंदा न बचा पाया या शायद खुद ही अपने हाथों से उसका क़त्ल करने को मजबूर हो गया।

वह छवि जो मेरे जिंदा ज़मीर में आज भी शायद जिंदा है मरते हुए। वह छवि या साया है अहसासों से अपने जिंदा तड़पते हुए। सुलगती हुई सासो से दफ़न एक आरज़ू, एक इंतज़ार लिए हुए।

जिंदा है एक उम्मीद कि कभी तो वह छवि या साया साकार को जाएगा। खो गया है जो या मर गया है शायद, कभी तो मिल मिल जाएगा या शायद जिंदा हो जाएगा।

मेरे लहू से जिस दिन यह सारा संसार डुब जाएगा। वह छवि या साया खुद से जब मजबूर हो जाएगा। मिल जाएगा खुद ही खुद से, हट जाएगी धूल, रूह का रूह से तब एक मिलान हो जाएगा।

रुक गया है कहि खो गया है जो साया या छवि, दिखलाती थी अक्स हकीकत का आईना, मुझको जो कभी …आज कई वर्षो के उपरांत भी वह न तो पूरी तरह मिट पाई है और न ही पूरी तरह सामने आ पाई है ।

वह जो धुंधला गया, साए में वक़्त के, वह जो टूट गया हाथ खुद अपने थे, वह छवि वह साया, वह दर्पण था सचाई का…वह जो कई वर्षो अंधकार में सोया रहा। जब जागा वह नींद से ए उजाले, क़त्ल बेदर्दी से उसका, मार के ख़ंजर सरेआम अहसास ए दिल, उसे फिर से क्यों सुला दिया गया।

रचनाकार एव लेखक विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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