एक सोच जो आज भी लहूलुहान है। हैरान है ज़ख्मो पर अपने, हर जख़्म एक विश्वासघात से है, खामोश है जो साया अब भी वो सत्य है वो स्तय है…स्तय है

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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