छलक गया है ऐ साकी, प्याला जो ये भरा हुआ,
झलक गए है जख़्म इस दिल के, छलकते हर पैमाने के साथ।

छूट गया जो साथ ऐ साकी, दर्द कहि तेरे मयख़ाने के पास,
दिख गया है अक्स ऐ यार, ये छीलते जख़्म, छलकते हर पैमाने के साथ।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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