यह रात भी बीत जाएगी, यह अंधकार भी छट जाएगा।
दिखेगा जल्द ही नया सवेरा, नया उजाला छा जाऐगा।।

आवश्यकता ये दिप ज्ञान न बुझने पाए।
जोत उमंग श्वासों से कम न होने पाए।।

रण छेत्र ये कर्म भूमि है हमारी, धरा ये ब्रह्मांड तमाम।
न कोई संगी, न कोई साथी, कर्म से कर्म का ये संज्ञान।।

रचनाकार एव लेखक विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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