देखता हूँ, जब भी निसान, झुकी कमर,
चेहरे की वो झुर्रिया, बेसुमार जो उनकी।

देते है अक्सर तज़ुर्बा, वख्त पे जो मुझको
दिखती नही कमी, किसी बात में जो उनकी।।

दिया है धोखा, जब भी ज़माने ने जो मुझको
सम्भाला वख्त, देकर प्यार-दुलार ने जो उनकी।

हर मोड़ है ज़िन्दगी, आशीष माता-पिता मुझको
दुत्कार हर ठोकर, बैठी जो छुपाए महोबत उनकी।।

किया है तिरस्कार, एक नही कई बार,जो उनका
दिल ही नही, धड़कनो को भी, मजबूर किया है।

किया है वॉर सरेआम, मासूम जज्बातो पर ऐसा
बुढ़ा शरीर, वो रूह उनकी, जख्म अंदर दिया है।।

टूटे दिल से, हर बार, दुआ फिर भी उनके निकलती है
खुश रहे आबाद रहे, सकूँ-दिल, रोशन ये चिराग हमारा।

हर दुख तकलीफ़ से उसकी जान हमारी जो निकलती है
एक आह-ज़िन्दगी,भूलने न पाए, हिस्सा वो तन का हमारा।।

भूल जाए बूढे मां-बाप को चाहे औलाद मतलबी उनकी।
नही भूलते, नही टूटते, छुपे है रिश्ते, सासो में जो उनकी।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(re-post)

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