टूट गया, थक कर चूर हो गया जो राही, अनहोनिया ये टूटती सासे, क्या अब वो थाम पायेगा।

काफिला खो गया, चाहतो का जो, टूटे कदमो से क्या अपने, मन्ज़िल तक अब पहुँच पायेगा।।

निसान सीने पर अपने, अब भी जख्म वो ताज़ा है जो
नासूर हर जख्म-अहसासों को, क्या कभी भर पायेगा।

हालात ये बेरुखिया,फरमान कोई ये आसमानी है जो
अक्स ये टूटा आईना अपना, क्या कभी जोड़ पायेगा।।

दुआ ये रूह से, ए-ज़िन्दगी-ज़िन्दगी के लिए।
जी जाए ये ज़िन्दगी, ज़िन्दगी अपनो के लिए।।

मिटा कर, हर निसान, हर आरज़ू वो, अनचाही सी है जो।
खिल जाए, गुल चाहतो के, चाहतो से, दिल मे दबे है जो।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

Rahi oar raasta

Tut gya, thak kar chur ho gya jo rahi, anhoniya ye tutti sase, kya ab wo tham payega

Kaafila kho gya, chahto ka jo, tute kadamon se kya apane, manzil tak ab pahunch payega

Nisaan seene par apane, ab bhi jakham wo taza hai jo
Nasoor har jakham-ahsaaso ko, kya kabhi bhar payega

Haalat ye berukhiya, farmaan koi ye aasamani hai jo
Akas ye tuta aaina apana, kya kabhi jod payega

Dua ye ruh se, ae-zindagi-zindagi ke liye
Jee jaye ye zindagi, zindagi apano ke liye

Mitakar har nisaan, har aarzoo wo, anchaahi si hai jo
Khil jaye gul-chahaton ke chahato se, dil me dabe hai jo

Vikrant Rajliwal dwara likhit.
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