आज मैं विक्रान्त राजलीवाल आज सब प्यारे पाठको से अपने जीवन की कुछ एक हक़ीक़त सांझा करने जा रहा हु। उम्मीद है आप मेरे अहसासों को समझ पाएंगे।

आज बहुत से जानने वाले मुझ को देख कर हैरान होते है कि यह वही है जिसे कभी 19 महीने तक जबरन पुनर्वासकेन्द्र में रखना पड़ा था?

जिसका कभी मानसिक चिकित्सालय में इलाज के लिए विचार विमर्श के लिए ले जाया जाता था। और जो कुछ समय पूर्व तक अनपढ़ था-गवार था?

 

आज वही शख्स सब व्यसनों से दूर एक तन्दरुस्त सेहत भरी ज़िन्दगी जीता हुआ। अनपढ़ से ग्रेजुएट हुआ। और एक मानवतापूर्ण भावो से परिपूर्ण अपनी कविताओं की किताब कैसे रची या लिख दी?

तो मैं उन सभी महानुभवों से इतना ही कहना चाहूंगा कि

करे हिम्मत अगर इंसान तो क्या हो नही सकता।
यहाँ बियाबान में गुलाब खिलते देखे है मैंने।

 

आज अपने ब्लॉग साइट्स पर मैंने 260+ रचनाएँ जिनमे से 97% नज़्म शायरी ओर कविताओ के रूप में है। आप सब दिल अज़ीज़ पाठको के लिए लिख चुका हूं।

और यही दुआ करता हु अपने ईष्वर से, ख़ुदा से कि यह सिलसिला अब कभी थमने न पाए।

और इस बियाबान जीवन मे यह मनमोहक पुष्प ऐसे ही खिलते चले जाए।

एक उम्मीद!

अपनी जीवन से प्यार, अपने व्यक्तिव का निखार।
जरूरी है जानना हमको, अपने प्राकृतिक अधिकार।।

निराशा जीवन से जीवन के प्रति, कठोर है खुद से खुद का यह निर्दयी अत्याचार।
आशा जीवन से जीवन के प्रति, उड़ान है खुद से खुद की, उन्मुक्त ये अपनी उड़ान।।

साथ सकूँ का सकूँ से, बाकी है सफर ए जिंदगी, ए जिंदगी अभी, सकूँ जिंदगी का जिंदगी से, जिंदगी को जीने के साथ।
उठा कदम विशवास से, बाकी है नजारा ए मंजिलो का अभी, महकेंगी फ़िज़ाए, मिटा देंगे कदम, निसान ए जख़्म, उठे जो साथ सच्चाई के साथ।।

रचनाकार एव लेखक विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
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शुक्रिया।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल।

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