एक उम्मीद ही काफ़ी थी तिनके की डूबते को सहारे की लिए।
हालात ये सबक मुसाफ़िर तिनका भी न मिले जब सहारे के लिए।।

आ जाओ के नही वीरान ये राह ए हक़ीक़त की जो।
हम भी है दर्द ए ज़िन्दगी, गम  साथ अपने लिए जो।।

रचनाकार, लेखक एव स्वतन्त्र विचारक
श्री विक्रांत राजलीवाल जी द्वारा लिखित।(21 जनवरी रविवार, 11:38 am)
(उनकी कलम से)

#Social Work At Consulting Of Your Addiction & Life’s-Recovery (Facebook)

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