बढ़ा कर हाथ, झुक जाना पीछे को
चलन हैं आज-कल, ये नए जमाने का

मुस्कुरा कर चरित्र-उछालना यारो का
दौर हैं आज कल,ये नये ज़माने का

जता कर यारी, दिखा के अपना-पन
असूल हैं देना जख्म बगल से उनका

भरी हैं रग-रग में मकारी जिनकी
शान हैं रंग बदलना,चलन ये नये ज़माने का…👤

✍रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।(शेयर करे)

एक वर्ष पूर्व की एक रचना।

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