अक्सर कई बार कई परिचित एव अलग अलग व्यक्तित्व के व्यक्ति अक्सर मुझ से पूछते है कि विक्रांत राजलीवाल जी आप अभी कुछ समय पूर्व तक अनपढ़(10th pass) थे आपको लगभग 2 वर्षो(19 महीने) तक पुनर्वासकेन्द्र में रहना पड़ा था। ऐसे में आपका विवाह भी सम्पन हो गया।

इन सब के बाबजूद आज आप देखते ही देखते पढ़ लिख गए (दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक)। अपने एक बेहद संवेदनशील समाजिक मुदो पर अपनी कविताओं के द्वारा जो प्रहार किया वो भी बेहद सराहनीय एव गर्व का विषय है। जहाँ 2016 जुलाई तक आप मोबाइल तक का इस्तमाल या उपयोग करना पसंद नही करते थे वही आज आप 4 से 5ब्लॉग वेबसाइ केवल चला ही नही रहे बल्कि अपने 6 से 7महीने में ही 270 +से ज्यादा नज्म-कविताए एव कुछ एक लेख भी लिखे दिए।

आप की नज़्म शायरी के रूप में दर्द से भरपूर महोबत की दास्ताने भी प्रकाशन के लिए लगभग पूरी तरह तैयार है। आपका विस्तृत उपन्यास सम्वाद के साथ भी अपने अंजाम तक पहुचने वाला है।

और सबसे अहम बात यह है कि आज आप अपने परिवार के सदस्यों के साथ एक सम्पन और शान्ति से परिपूर्ण जिंदगी व्यतीत कर रहे है। यह सब देखते ही देखते आप ने कैसे कर दिखाया
क्या यह कोई चमत्कार है या कोई जादू टोना है?

👉तो मै उन सभी महानुभवों से यही कहना चाहूंगा जो कार्य आपको अकस्मात ही घटित हो गया हूं के जैसा प्रतीत हो रहा है या जिस कार्य की अवधि आपको अति पल भर की प्रतीत हो रही है या चन्द वर्षो की!

यह पल भर या चन्द वर्षो की अवधि का कार्य सम्पन्न करने के लिए मित्रो मुझ को लगभग 14 से 15 वर्ष का समय लगा है। यह सब इतना सरल नही था जितना कि आपको प्रतीत हो रहा है।

वर्ष 2004FB_IMG_1513826285495 में जब मुझको ज्ञान की प्राप्ति हुई थी उस समय से निरन्तर चलते हुए जलते हुए आज मै यह तक पहुच पाया हु। वर्ष 2008 में इंद्रा गांधी यूनिवर्सिटी से 12 कक्षा का फार्म भरा और वर्ष 2013 में दिल्ली विश्विद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल करि।

एक आध स्नातक स्तरीय सरकारी परीक्षा का फार्म भी पास किया। 2016 में अपने शोषित समाज के मासूम व्यक्तिओ को कुछ राहत पहुचने की लिए अपनी अति संवेदनशील कविताओ की पुस्तक प्रकाशित करवाई। 2016 जुलाई में प्रथम मोबाइल के साथ कम्प्यूटर पर कार्य करना आरम्भ किया।

मई 2017 में ब्लॉग बनाए और 3 से 4 महीने में ही 200 +विषय लिखे यह सिलसिला चलता रहा आज 270 +विषय हो गए है।

👉यह सब कैसे सम्पन हो पाया मित्रो इसके पीछे एक महान भावना छुपी है और वह है मेरे माता और पिता का असीम प्रेम और अनुशाशन।

इस कार्य के पीछे छुपी है एक महान भावना और वह है ईष्वर की असीम कृपया एव आप सब मित्रो और गुरुजनों का असीम प्रेम एव आशीर्वाद।

🌻यह जो चन्द पलो का सफर है न जो, किया है तय कई वर्षों में,
जलना पड़ा था जलना पड़ेगा, जलता ही जा रहा हु मैं,

हर दर्द एक सबक बन जाता है न जो, सीखा देता है मुस्कुराना हर दर्द ओ सितम में,
बहती है जो धारा ये जीवन की, देता है सुनाई एक संगीत फिर उस मे

टूट जाते है छुप जाते है जब सहारे उम्मीद के सब, निकलता है सूर्य पुकार एक सत्य से तब

यह जो चन्द पलो का सफर है न जो, किया है तय कई वर्षो में,
जलना पड़ा था जलना पड़ेगा जलता ही जा रहा हु में…

रचनाकार एव स्वतन्त्र लेखक विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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