Author, Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal

Poetry, Shayari, Gazal, Satire, drama & Articles Written by Vikrant Rajliwal

February 5, 2018
Author, Writer, Poet And Dramatist Vikrant Rajliwal

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बेपरवा-सनम।(reblog after some corrections)

देखा था ख़्वाब कभी दीवाने ने एक।

जगमगाते सितारो से हसीन

वो था चेहरा एक।।

परवान थी महोबत, चाँद की रात में एक।
छा गए फिर क्यों उन पर वो बादल काले,
हो गए जुदा वर्षो से मिले पल में एक।।

हुस्न की बहार से, इश्क मेरा जो छली हुआ।
खाया खंज़र सिने पे, इश्क मेरा ये नीलाम हुआ।।

महोबत के बज़ार में , बिकती नही जो महोबत।
वफ़ा-ऐतबार से, ज़िंदा हैं वही महोबत।।
बिक जाती हैं फिर भी सरे-राह वफ़ा
करती हैं बेवफ़ा कोई जब महोबत।।।

सकूँ ए दिल जो मेरा अब लूट गया।
दाग धड़कनो पे ये कैसा पड़ गया।।
चला तीर निगाहों से कही
छली ये दिल मेरा अब हो गया।।।

भरी हैं जो इस दिल में वफ़ा।
मिलते हैं अक्सर फिर भी बेवफ़ा।।

ज़ख्म दिल के जो दिख गये।
नासूर बन के फिर उभर गये।।

सकून ए दिल जो हसीना ने एक
सरेआम मेरा अब लूट लिया।
धड़कनो पर दे कर निशान ए जुदाई
तन्हा जो जमाने मे मुझ को छोड़ दिया।।

महोबत दिलरुबा की,चिर के दिल जख़्मी करे।
दिखा के आईना ए महोबत,
ऐतबार से फिर बेवफाई करे।।

खाया धोखा प्यार से, तन्हा जो अब रह गया।
रोशनी हैं बहुत, फिर भी,
जुदा साये से अपने हो गया।।

हुस्न की सुराई से, अमृत कलश ,चुरा लेंगे।
कदमो में ऐ दिल-कश हसीना
चिर के दिल अपना हम बिछा देंगे।।

रचनाकार विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।
(5 february 17:06 Pm)

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