अक्सर हम अपने मानव जीवन मे कई बार, कई जगह काफी मजबूर और बेबस हो जाते है। चाह कर भी कुछ कर पाने की स्थिति हमे प्राप्त नही हो पाती। उस समय हम कुछ टूट से जाते है। आखिर हम मनुष्य ही तो है जिसके मानव ह्रदय में इंसानियत के हर भाव-व्यवहार ईष्वर-अलाह और इस प्रकृति ने कूट कूट कर भर दिए है।

हम साधारण मानवो की यही एक बेहद जटिल समस्या, अक्सर खुद हमको कई बार बेहद विचलित कर देती है कि क्यों हमारी उच्च शक्ति या प्रकृति ने हमे इतना अधिक भावुक बनाया है। मनुष्य अपने मानव जीवन से बहुत सी आशाए रखता है वह बहुत कुछ करना चाहता है पर जीवन की कठोर परिस्थितियों के आगे कई बार वह इस कदर से विवश हो जाता है कि अपने अंदर मौजूद तमाम गुणों को नज़रअंदाज़ कर वह भावुकतापूर्ण उन जीवन जटिल परिस्थितियों के समक्ष झुक जाता है।

और उस दिव्य मार्ग को नही स्वीकार कर पाता जो नीति ने उसके कठोर परीश्रम के फल स्वरूप उसे सहज ही प्रदान कर दिया है। यही स्तय है यही हकीकत है कि…

💥चलते है राह मार्ग के शूलों पर जो वीर महान, पा जाते है एक दिन वो खुद को, हर मंजिल करती है झुक कर उन्हें फिर सलाम।

ले सिख भूलों से जो अपनी, करते है सत्यापित आदर्श जीवन का अपने जो महान, हर घाव जीवन पर लग जाती है मरहम, छोटे पड़ जाते है हर मुकाम।।

स्वतन्त्र लेखन विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित उनका एक जीवन अहसास, जो सत्य की कसौटी से प्रेरित है।

2/03/2018 at 23:51 pm

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