Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतन्त्र लेखन-

काव्य-नज़्म, ग़ज़ल-गीत, व्यंग्य-किस्से, नाटक-कहानी-विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित। -स्वतंत्र लेखन-

Mar 24, 2018
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal (स्वतँत्र लेखन)

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एक भाव निष्पाप!

आज का मनुष्य जैसा आज दिखता है या जिस व्यक्तित्व का परिचय अधिकतर मनुष्य उपलब्ध करवाते है वो व्यक्तित उनके जीवन के आरम्भ से उनके व्यक्तिव से सम्बंधित नही था।

व्यक्तिक अगर उज्ज्वल हो स्वार्थ रहित हो तभी उत्तम कहलाता है। एव ऐसे व्यक्तित्व का परिचय एक विशवास से उत्तपन होता है। और यह विशवास उतपन होता है एक सार्थक कार्य से, अपने से निम्न या कमज़ोर व्यक्तिव के व्यक्तिओ को अपना एक स्नेह से पूर्ण सानिध्य उपलब्ध करवाने से, उनको अपना अनमोल मार्गदर्शन उपलब्ध करवाने से!

इसके विपरीत अगर मनुष्य का व्यक्तिव मलिन हो उससे अश्लीलता की दुर्गंध अति हु। तो ऐसा व्यक्तिव अपनी दुरन्ध से सम्पूर्ण संसार को एक विनाश की ओर अग्रसर करने को उतारू रहता है।

ऐसा मलिन व्यक्तिव का व्यक्तिव आरम्भ में एक बार को जरूर हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। परंतु ऐसे मलिन व्यक्तिव का अंत अति दयनीय एव भयंकर होता है। ऐसे मलिन व्यक्तिव का व्यक्ति जब तक जीवित रहता है तब तक उसका मन अशांत ही रहता है।

मित्रों यहाँ सार यही है कि कोई भी व्यक्ति जन्म से उज्ज्वल या मलिन व्यक्तिव के साथ जन्म नही लेता। बल्कि जन्म के समय एक नवजात शिशु के कण कण में एक अलौकिक प्रकाश विराजमान रहता है। जिसके प्रभाव से शायद ही कोई मनुष्य अछूता रह पाया हूं!

अब सवाल यह उत्तपन होता है कि फिर कमी कहा रह जाती है कि जो एक दिव्य प्रकाश से प्रकाशित नवजात के रूप जन्मे व्यक्ति के व्यक्त्वि या भाव व्यवहार पर समय के साथ एक मलिनता की परत क्यों स्थापित हो जाती है या वह अश्लीलता की और न चाहते हुए भी आकर्षित हो कर अपने दिव्य व्यक्तिव का पतन कर अपना विनाश तक क्यों कर देता है।

इसका जवाब भी हमारे अपने व्यक्तिव में ही कहि छिपा हुआ है…शेष अगले क्रम में

स्वतन्त्र लेखक विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित उनका जीवन अनुभव।

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