20180430_092501.jpgहिंसा! हिंसा का स्वरूप चाहे कोई भी क्यों न हो। उसके समर्थन में जुड़े हर एक व्यक्ति के जीवन मे एक बदलाव! एक नकरात्मक बदलाव अवश्य आ जाता है। हिंसा करने वाला हु या हिंसा को सहने वाला! हिंसा से खुद को न रुक पाना या हिंसा का विरोध करने में खुद को विवश समझना! दोनों ही परिस्थिति अति विनाशक होती है।

कई बार हम सामान्य मनुष्य हिंसा की आशंका से या जीवन के अंत की आशंका से, या अपनी जीवन को खतरे में महसूस कर के खुद ही टूट जाते है एव जिन विचारो एव विषयों का हम पुरजोर विरोध कर रहे होते है अज्ञानवश विपरीत परिस्थितियों के वश, मजबूर हो कर उनके समक्ष झुकने को मजबूर भी हो जाते है। जिसकी पीड़ा से फिर हम ताउम्र व्यकुल रहते है और खुद की नज़रों में खुद के व्यक्तित्व में खुद को दोषी भी मान लेते है!

मैं खुद की बात करूं तो मै खुद को खुद के व्यक्त्वि को इतना दृढ़ समझता था कि चाहे मुझे कितनी भी विपरीत परिस्थितियों एव हिंसात्मक व्यवहारों का सामना क्यों न करना पड़े परन्तु में हर विपरीति परिस्तिथियों एव हिंसा का दृढ़ता से सामना करूंगा। एव किसी भी विपरित परिस्थिति के समक्ष कभी भी नही झुकूंगा एव उनसे कदापि समझौता नही करूँगा।

अक्सर हम छिट पुट हिंसा एव विपरीत परिस्थितयो का सामना बहुत दृढ़ता से करते है। परन्तु जीवन मे कई बार परिस्थितिया हमारे नियंत्रण में नही होती एव कई बार हम उन परिस्थितियों के समक्ष खुद को बेबस एव लाचार महसूस करते हुए उनसे समझौता करने को मजबूर हो जाते है।

ऐसा क्यों? इस एक प्रशन का उत्तर मैं आज तक खोज रहा हु! एव अपने जीवन अनुभवो से गुजरते हुए, नित्य नई विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए भी, अभी तक किसी एक निचित निष्कर्ष तक नही पहुच सका हु।

जीवन मे परिस्थियां कभी भी एक समान नही रहती कभी जिन जीवन परिस्थितियों या अवसरों की हम क़दर नही करते या जिनके अनमोल मूल्य को समझ सकने का हममे ज्ञान नही होता! एक समय उपरांत उन्ही परिस्थितियों एव अवसरों की तलाश के लिए हमे एक लम्बा संघर्ष एक युद्ध भी करना पड़ सकता है। इस बात का शायद मुझ को कभी भी अहसास नही था।

और जब अहसास हुआ तो मैंने खुद को एक दो राह पर खड़ा हुआ महसूस किया! अब यह मुझ को निच्छित करना था कि मुझ को इन दो राह में से कौन सी राह चुननी है! इनमे से एक मार्ग था कि मै खुद को न बदलते हुए जैसा चल रहा है उसे वैसा ही चलने दु! और उचित समय या उचित परिस्थिति के इंतज़ार में खुद को, खुद के व्यक्त्वि का खुद अपने ही हाथों क़त्ल कर के एक बेबसी से पूर्ण जीवन जीने पर विशश हो जाऊ!

तदुपरांत काफी सोच विचार कर मैने इस जीवन संघर्ष का दृढ़ता से सामना करते हुए वह मार्ग चुना जिस पर अनन्त दहकते शूल बिखरे हुए थे।

आज से लगभग 13 वर्ष पूर्व मुझ को भी ऐसे ही एक अनुभव से गुजरना पड़ा था!

उस समय मै एक संस्था के साथ जुड़ कर कार्य कर रहा था। और एक दिन…शेष अगले ब्लॉग में

विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित एक जीवन अनुभव।

30/04/2018 at 09:47 Am

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