Writer & Poet Vikrant Rajliwal

Poetry, Shayari & Article's by Vikrant Rajliwal

May 10, 2018
Vikrant Rajliwal (विक्रांत राजलीवाल) -स्वतन्त्र लेखक-

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एक एहसास! सत्य से प्रेरित है जो।

FB_IMG_1525941478386.jpgअक्सर कई बार कई परिचित एव अलग अलग व्यक्तित्व के व्यक्ति अक्सर मुझ से पूछते है कि विक्रांत राजलीवाल जी आप अभी कुछ समय पूर्व तक अनपढ़ 2008 तक(10th pass) की श्रेणी में थे। और आपको 2004 मार्च मे लगभग 19 महीने तक पुनर्वासकेन्द्र(नशामुक्ति केंद्र)में रहना पड़ा था।
आपको 2004 से 2005 तक मानसिक चिकित्सालय शाहदरा भी ले जाया जाता था। विचारविमर्श करने को। इसी दौरान आपने एक साल का कम्प्यूटर कोर्स पूर्ण किया। एव आप के अनुसार आप आगे शिक्षा प्राप्त करने का अवसर भी प्राप्त करने की कोशिश में सक्रिय थे।  ऐसे में दिसम्बर 2007 में आपका विवाह  भी सम्पन हो गया।

इन सब के बाबजूद जब आपको आगे शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया गया या प्राप्त हुआ शादी के उपरांत तो आप देखते ही देखते पढ़ लिख गए  2009 में 12th इंदिरागांधी ओपन यूनिवर्सिटी से और 2013 में  दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक पास।

अपने एक बेहद संवेदनशील समाजिक मुदो पर अपने प्रथम प्रयास से अपनी समाजिक एव मानवता की भावनाओ से पूर्ण कविताओं के द्वारा जो समाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया वो भी बेहद सराहनीय एव गर्व का विषय है।
जहाँ 2016 जुलाई तक आप मोबाइल तक का इस्तमाल या उपयोग करना पसंद नही करते थे वही आज आप कई ब्लॉग वेबसाइ केवल चला ही नही रहे बल्कि अपने 6 से 7महीने में ही 270 +से ज्यादा जनवरी2018 तक नज्म-कविताए एव कुछ एक लेख भी लिखे दिए।

आप की नज़्म शायरी के रूप में दर्द से भरपूर महोबत की दास्ताने भी प्रकाशन के लिए लगभग पूरी तरह तैयार है। आपका विस्तृत उपन्यास सम्वाद के साथ भी अपने अंजाम तक पहुचने वाला है।

❤और सबसे अहम बात यह है कि आज आप अपने परिवार  के सदस्यों के साथ एक सम्पन और शान्ति से परिपूर्ण जिंदगी व्यतीत कर रहे है। यह सब देखते ही देखते आप ने  कैसे कर दिखाया

क्या यह कोई चमत्कार है या कोई जादू टोना है?

👉तो मै उन सभी महानुभवों से यही कहना चाहूंगा कि जो कार्य आपको अकस्मात ही घटित हो गया हूं के जैसा प्रतीत हो रहा है या जिस कार्य की अवधि आपको अति पल भर की या चन्द वर्षो की प्रतीत हो रही है!

मित्रों यह पल भर या चन्द वर्षो की अवधि का कार्य सम्पन्न करने के लिए मुझ को लगभग 14 से 15 वर्ष का समय लगा है। यह सब इतना सरल नही था जितना कि आपको प्रतीत हो रहा है।

वर्ष 2004 में जब मुझको ज्ञान की प्राप्ति या ज्ञान का एहसास हुआ था पुनर्वासकेन्द्र में दर्द ए जिंदगी की हकीकत से झूझते हुए, जीवन के हर एहसास को महसूस करते हुए उन्हें बेहद समीप से समझते हुए!

अंत मे हुआ एक साक्षात्कार स्वम् से स्वम् का, अपने असली अस्तित्व का मेरे मित्रो। उस समय से निरन्तर चलते हुए जलते हुए आज मै यह तक पहुच पाया हु और अब भी मैं निरन्तर ही जलता/चलता जा रहा हु। वर्ष 2008 में इंद्रा गांधी यूनिवर्सिटी से 12 कक्षा का फार्म भरा और वर्ष 2013 में दिल्ली विश्विद्यालय से स्नातक की डिग्री पास करि। अवसर की कमी के बाबजूद स्नातक की शिक्षा के उपरांत 2013 में upsc की कोचीन ली।

एक आध स्नातक स्तरीय सरकारी परीक्षा का लिखित परीक्षा भी पास किया। 2016 में अपने शोषित समाज के मासूम व्यक्तिओ को कुछ राहत पहुचने की लिए अपनी अति संवेदनशील कविताओ की पुस्तक प्रकाशित करवाई। जिसका नाम एहसास है संजोग प्रकाशन शहादरा द्वारा प्रकाशित जनवरी 2016 दिल्ली विश्व पुस्तकमेला।

2016 जुलाई में प्रथम मोबाइल के साथ कम्प्यूटर पर कार्य करना आरम्भ किया।
मई 2017 में ब्लॉग बनाए और 3 से 4 महीने में ही 200 +विषय लिखे यह सिलसिला चलता रहा आज लगभग 300 +नज़्म, जिसमे 90 +विस्तृत(बड़ी है) एव बहुत सी कविताए जिसमे से 30+ विस्तृत काव्य कविताए है दर्ज़नो विस्तृत लेख एव बहुत से लघु लेख एव एक आध गीत एव व्यंग्य किस्सा। ऑनलाइन ब्लॉग पर लिख चुका हूं।
💖एव हस्तलेख के रूप में ऑडिट भी कर चुका हूं जो जल्द ही अपनी खुद की वेबसाइट बना कर उस पर प्रकाशित कर दूंगा।

👉यह सब कैसे सम्पन हो पाया मित्रो इसके पीछे एक महान भावना छुपी है और वह है मेरे माता और पिता का असीम प्रेम और अनुशाशन।

💖इस कार्य के पीछे छुपी है एक महान भावना और वह है ईष्वर की असीम कृपया एव आप सब मित्रो और गुरुजनों का असीम प्रेम एव आशीर्वाद।

अंत मे मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि…

🌻यह जो चन्द पलो का सफर है न जो, किया है तय कई वर्षों में।
जलना पड़ा था जलना पड़ेगा, जलता ही जा रहा हु मैं।।

हर दर्द एक सबक बन जाता है न जो, सीखा देता है मुस्कुराना हर दर्द ओ सितम में।
बहती है जो धारा ये जीवन की, देता है सुनाई एक संगीत फिर उस मे।।

टूट जाते है छुप जाते है जब सहारे उम्मीद के सब। निकलता है सूर्य पुकार एक सत्य से तब।।

यह जो चन्द पलो का सफर है न जो, किया है तय कई वर्षो में।
जलना पड़ा था जलना पड़ेगा जलता ही जा रहा हुमें…

💥रचनाकार एव स्वतन्त्र लेखक विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित उनके जीवन से सम्बंधित एक सत्य अनुभव।🖋

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