एक विचार काफी समय से कुछ परेशान कर रहा था आज सोचा कि आप सभी प्रिय पाठकों, काव्य नज़्म प्रेमियो एव दिलज़ीज मित्रों से सांझा कर दु!

आप सोच रहे होंगे कि मेने कई बार आप सभी प्रियजनों से अपनी अप्रकाशित पुस्तकों जो कि नज़्म शायरी के रूप में दर्द से पूर्ण महोबत की विस्तृत दस्ताने है एव अपना प्रथम दर्द भरा उपन्यास, एव अब कुछ समय पूर्व मेरे द्वारा अपनी ब्लॉग काव्य नज़्म गीत किस्सा लेखों को ऑडिट कर तैयार करने के बाद पुस्तक के रूप में आप तक पहुचाने की बात कहि थी। जो मेरी आत्मा की एक ख़्वाहिश भी है।

अभी कुछ दिन पूर्व तक मेने अपनी अप्रकाशित महोबत की दर्द भरी दस्ताने एव अपनी ब्लॉग की तमाम लघु से लघु एव विस्तृत से विस्तृत काव्य नज़्म गीत किस्सा लेखों का ऑडिट कर फोटो कॉपी के उपरांत एक निजी तौर पर जानने वाले प्रकाशन से अपनी इन पुस्तकों के प्रकाशन सम्भन्धित सब बातें तय करने के उपरांत उन्हें अपनी रचनाओ की कापी देने के लिए बुला भी लिया था।

परन्तु आखरी समय मे मेने स्वम उनको मना कर दिया।
आप सोच रहे होने जब सब बाते तय हो गयी थी तो मैने स्वम् क्यों उनको मना कर दिया। इसका एक महत्वपूर्ण कारण है मित्रों जिस समय मेरी प्रथम पुस्तक एहसास प्रकाशित हुई थी उस समय मेरे पिता जी के लगभग 25,000 से 30,000 रुपए खर्च हो गए। उनको इस रकम से कोई फर्क नही पडता और वह मेरी आगामी तमाम पुस्तकें भी स्वम् प्रकाशित करवाने को तैयार है।

परन्तु इस बात से मेरे खुद के स्वाभिमान को बेहद ठेस पहुचती है। और मैंने निर्णय किया कि मै अपनी तमाम पुस्तके एव उपन्यास को स्वम् अपने दम पर खुद कि रकम से प्रकाशित करवाउंगा। इसीलिए मैंने अपने उन जानने वाले प्रकाशक को आखरी समय पर अपनी तमाम रचनाओ की कापी देने से मना करते हुए उन से भी यही बात कही।

मेरे इस भाव को शायद वह और मेरे पिताजी पूरी तरह नही समझ सके क्योंकि पुस्तक प्रकाशन सम्बन्धित खर्च उनके लिए एक कप चाय पीने के समान है परन्तु मेरे लिए नही!

इसलिए एक बार पुनः मै आप सभी प्रियजनों से कहता हूं कि मैने अपनी अप्रकाशित पुस्तके जो नज़्म रूपी अधूरी महोबत की बेहद विस्तृत दर्द भरी दास्ताने है एव मेरा प्रथम समाजिक पारिवारिक दर्द से पूर्ण उपन्यास एव मेरी ब्लॉग रचनाए जिनको मेने स्वम् ऑडिट कर तैयार कर लिया है को मै जरूर प्रकाशित करवा कर एक पुस्तक के रूप में आप सभी प्रियजनों तक अवशय पहुचाने की कोशिश करूंगा। परन्तु स्वम् के दम से, जिस दिन भी मेरी क्षमता बिना किसी के सहारे के खुद इतनी हो जाएगी कि मै अपनी तमाम पुस्तको को खुद से खुद के खर्च प्रकाशित करवा सकू उसी दिन में अपनी तमाम पुस्तकों को प्रकाशित करवा कर आप सभी प्रियजनों तक एक उपहार स्वरूप में जरूर पहुचा दूंगा।

उम्मीद करता हु शायद आप मेरी इस भावना को समझ सके!

धन्यवाद।

स्वतँत्र लेखक एव कवि नज़्मकार विक्रांत राजलीवाल।

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