Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतन्त्र लेखन-

Poetry, Kavya, Shayari, Sings, Satire, drama & Articles Written by Vikrant Rajliwal

May 24, 2018
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

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सत्य है या भृम!(एक लघु नाटक आज की भृष्ट होती राजनीति पर एक प्रहार) ^repost^

एक सुबह चाय की एक दुकान पर सुबह की चाय पीते दो व्यक्ति।

प्रथम व्यक्ति: राम राम जी महोदय!

द्वितीय व्यक्ति : राम राम जी! राम
राम।

प्रथम व्यक्ति: आज वातावरण कुछ गर्म रहेगा। (मुस्कुराते
हुए)

द्वितीय व्यक्ति: हु! पर क्यों गर्म रहेगा?(हैरानी से)

प्रथम व्यक्ति: टीवी पर ख़बर में बताया था।

द्वितीय वयक्ति: टीवी की ख़बर और मौसम का विशवास
न करा करे!

प्रथम व्यक्ति: आज कल वो बात नही है! अब सही बताते
है। जब से मोदी जी ने सेटेलॉइट उड़ाई है
तब से सब ठीक बताते है।

द्वितीय व्यक्ति: कौन मोदी जी!

प्रथम व्यक्ति: नही नही! खबरों में! मोदी जी तो बेहद
व्यवस्त रहते है। 2019 जो आने वाला है!

द्वितीय व्यक्ति: हु! सुना है, हमने भी! अभी से सब (सब
पार्टी) युद्ध स्तर पर तैयारी कर रहे है!

प्रथम व्यक्ति: युद्ध स्तर पर नही! युद्ध (दंगे-फसाद)करते
हुए तैयारी कर रहे है।

द्वितीय व्यक्ति कुछ कहता तभी तृतीय व्यक्ति का आगमन हो जाता है।

तृतीय व्यक्ति: नमस्कार है आप दोनों को मेरी ओर से!

प्रथम एव द्वितीय व्यक्ति एक साथ: नमस्कार!

तृतीय व्यक्ति: अपने सुना आज मौसम गर्म रहेगा!

प्रथम एव द्वितीय : हा आज़ टीवी पर ख़बर में बताया था।
व्यक्ति एक साथ।

तृतीय व्यक्ति : अच्छा! क्या बताया था टीवी पर?

प्रथम एव द्वितिय : यही की आज तापमान 40 के
व्यक्ति पुनः एक पार चला जाएगा।
साथ।

तृतीय व्यक्ति: पर किसका!

द्वितिय व्यक्ति: मौसम का भाई! और किसका?

तृतिय व्यक्ति: लगता है आप समझे नही!

इस बार प्रथम: क्यों, क्या हो गया! जो हम समझ नही पा
व्यक्ति: रहे!(हैरानी से)

तृतीय व्यक्ति: आज मौसम गर्म रहेगा से मेरा तातपर्य था
कि आज शहर में चुनावी रैलियों है। वो भी
एक नही दो दो।

प्रथम एव द्वितीय : क्या कहा? ये तो गम्भीर समस्या
व्यक्ति है। अभी पिछली बार के जख्म
ठीक से भरे नही है और फिर से दो
रैलियां!

तृतिय व्यक्ति: हु, तुमने ठिक कहा जब से राजनीति एव
धर्म के नाम पर समाज बटता जा रहा है तब
से हम जनता चुनावी एव धार्मिक रैलियों से
भी भयभीत होने लगी है!

प्रथम एव द्वितीय : अब क्या करें! शहर छोड़ दे क्या?
व्यक्ति एक साथ।

तृतिय व्यक्ति: मेरी मानो तो शहर नही, ये देश, फिर ये
दुनिया ही छोड़ दो। और अंतरिक्ष मे कहि
एक चूहे वाला बिल खुद कर उसमें घुस
जाओ!

प्रथम एव द्वितीय : तो अब आप ही बताए क्या करे! क्या
व्यक्ति पुनः एक आप पिछली बार के दंगे भूल गए या
साथ। आप भी उनमें से ही एक हो? जो आप
ऐसी बात करते हो।

तृतिय व्यक्ति: न न मैं भी तुम्हारे ही जैसे निःसन्देह
भयभीत हु। मुझ को भी भय है! परन्तु शहर
छोड़ने से क्या होगा? कुछ नही। बल्कि घर
बार से रोजगार से भी जाएंगे। इससे अच्छा
तो इन रैलियों का सामना करेंगे। और
स्वाभिमान से जिएंगे नही तो स्वाभिमान से
मरेंगे।
प्रथम एव द्वितिय : हा, हा, हम सामना करेंगे स्वाभिमान से
व्यक्ति एक साथ। जीएंगे स्वाभिमान से नही तो
स्वाभिमान से मरेंगे।

 

👉ईष्वर न करे हम भारतीय को फिर से दंगो का सामना करना पड़े, और इंसानियत को फिर से शर्मसार होना पड़े। एक जमाना था जब राजनीतिक एव धार्मिक रेलिया किसी त्यौहार से कम न होती थी, हर तरफ खूशी के ढोल एव भाईचारे की शक्ति देखने को सुनने को मिलती थी। और एक यह समय है जब हर शरीफ व्यक्ति इन रैलियों के नाम से चाहे वह किसी भी धर्म या राजनीति की क्यों न हु भय से गुस्से से कांप जाता है! क्या इसी दिन के लिए हमारे पूवजो ने कुर्बानी दी थी, क्या इसी दिन के लिए उन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ी थी! यह सवाल है हर उस मनुष्य के लिए जो यह सोच कर निचिंत है कि…

अपना घर रहे सूरक्षित, दूजे का चाहे जल घर जाए।
जख्म इंसानियत पड़ते रहे, आँख से पर आँसू न आए।।

समाप्त।

स्वतन्त्र लेखक विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।

27/04/2018 at 22:54pm

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