Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतन्त्र लेखन-

Poetry, Kavya, Shayari, Sings, Satire, drama & Articles Written by Vikrant Rajliwal

June 25, 2018
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

no comments

एक खेल ज़िन्दगी। (सम्पूर्ण दास्तान)(रिपोस्ट)

जीवन के हादसे, कब खेल बन गए।

ये खेल हादसों के, अब सच्चाई बन गए।।

बेहोशी से हो गयी, हार पर हार।

हर बार हो गया, दिल पर वॉर।।

अहसास चेतना का जब हुआ।

बन गया खेल ये फिर हादसों का।।

न जाने कमी क्या हर बार रह जाती है।

रोशनी दिख कर कहि क्यों खो जाती है।।

क्यों यह जमाना मुझ से अब जीत गया।

जल कर भी हर लम्हा, तन्हा जो अब रह गया।।

वो एक कोशिश ज़िन्दगी की क्या एक हादसा था।

बदलना खुद को जो चाहा तो क्या वो एक हादसा था।।

कोशिश अंजाम तक न जो कोई भी पहुच पाई।

बदलना खुद को मुझे दहलीज़ ए मौत पर जो ले आई।।

हार गया है बेगाना (विक्रांत राजलीवाल), टूट गया जो दम खुद से।

हर चाल, वो हर शह, ये बेरुखी है जो खुद से।।

हर कदम, वो हर निसान, ये जख्मो है जो मेरे लहू-लुहान,

खिंची थी लकीरे, जो चंद, आजमाइशे वो जिंदगी अपनी,

मिट चुकी है दम तोड़ती, हर जिंदा ख्वाहिशो से…

एक खेल…ज़िन्दगी।^2^

मिसाल ए हिम्मत, बढ़ता वो कदम,
सख्त है बेहद, वो बेड़िया,
बढ़ते हर कदम से जुड़ जो गई।

टुटता हौसला, सुनी वो निगाह,
दर्द है बेहिंतिया, वो गहराइयां,
झुकती हर पलक से झलक जो गईं।।

ठोकर लगी, तो गिर गया बेगाना।
टूट ऐसा, के बिखर गया बेगाना।।

ठोकर है ज़िन्दगी, बेदर्द ये समा, हर एक अहसास मेरे।
तन्हा है लम्हा, बिखरी ये ज़िन्दगी, हर एक अहसास मेरे।।

हर ठोकर ए ज़िन्दगी, अहसास हर ठोकर से एक हुआ।
गिरा उठा, फिर से जो गिर गया, तो अहसास एक हुआ।।

न जाने था वो क्या, हुआ जो अहसास एक।
अहसास है हुआ था जो अहसास वो एक।।

जल गई थी रस्सी ये ज़िन्दगी, शायद जो उम्मीद पूरी तरह।
बच गया था बल ये सांसे, शायद जो उसमे ज़िन्दगी बुरी तरह।।

अहसास है, दर्द ए बेबसी, आखरी वो निसान,
ज़ख्मी है लम्हा, वो बल आखरी जो टूट गया।

तम्मना है वो जीने की, ख़्वाब एक अधूरा सा ज़िन्दगी,
बेबस है वो अहसास, सरेराह एक दम जो छूट गया।।

ऐसा क्यों लगता है, पँछी अब मर जायेगा।
जीत जाएगा, हर जुल्म ओ सितम,
पँछी पिंजरे में तड़प-तड़प कर अब मर जायेगा।।

खामोश है ज़िन्दगी, हर लम्हा जिसने जलाया।
हर सांस है चाहत मेरी, जिसने काटो पर चलाया।।

दौर-आखरी, ये सफ़र है तन्हा,
बन्द पिजरा जिसमे टूट गया।

राह ए शूल लिपटे है शोले जिसमे अनन्त ज़िन्दगी,
छोर ए उम्मीद, आखरी है जो अब कहि वो छूट गया।।

जख्मी है पंख, हालात ए ज़िन्दगी,
चले जो उठ कर, दम वो अब नही।

रात है काली, ये वख्त-वख्त की बात,
सुहाना कोई ख़्वाब, बाकी अब नही।।

सफ़र ए ज़िन्दगी, यहाँ हर लम्हा है खामोश।
जनून ए ज़िन्दगी, यहाँ हर अरमान है खामोश।।

उम्मीद आखरी, गुम-नाम वो मंजिल।
सुनी ये राह, उखड़ती सांसे,
कर पाएंगी क्या, मंजिल अब हासिल।।

एक एहसास बंजर ये माहौल, सूखता ये कण्ठ।
एक चाह आखरी ये ज़िन्दगी, टुटता ये दम।।

एक खेल…ज़िन्दगी^३^

एक एहसास बंजर ये माहौल, खुखता ये कण्ठ।
एक चाह आखरी ये ज़िन्दगी, टुटता ये दम।।

सफ़र है तन्हा, ये समा वीरान, उड़ रहा तन्हा वो पंछी, जख्मी है उसके जो अरमान।
नाज़ुक है पंख, ये उखड़ती सांसे, छूटते लम्हे जो ज़िन्दगी से उसके, है वो लहूलुहान।।

आग उगलती ये फ़िज़ाय, न कोई दरख़्त, न कोई ओट,
दम अब उसका टूटने लगा है।

प्यासा ये कण्ठ, एक बोल ज़िन्दगी, ये बेदर्द हवाएं,
मोह ज़िन्दगी से अब मुड़ने लगा है।।

होता है नादां-परिंदा, अहसास जो एक।
बदलेगा मौसम, थामे हुए, वो आस जो एक।।

बरसेगी कभी तो कोई बून्द, प्यासे कण्ठ से जो उतरेगी।
रुकी सासे, ठहरी ये ज़िन्दगी कभी तो एहसास जो सम्भलेगी।।

ए वख्त बिछाए है जो जाल, बेदर्दी हर जगह-जगह।
हर लम्हा है लहुलुहान जिनसे मेरा, सितम हर जगह-जगह।।

घायल अरमान, जख्म ए हालात, अब और है गहरे।
तड़पती धड़कने, उखड़ती सांसे, हर ओर है पहरे।।

ये पँछी है ज़िन्दगी, जिसे उड़ना ही है।
हर ठोकर है अहसास, जिसे सम्भलना ही है।।

देखना है ज़ोर-ज़िन्दगी, बाकी है कितना, बेबस परों में अब तेरे।
दम तो पहले ही घुट चुका है, धड़कने ही बाकी है सीने में बस अब तेरे।।

रचनाकार एव लेखक विक्रांत राजलिवाल द्वारा लिखित।

Leave a Reply

Required fields are marked *.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: