चंद लाइन अर्ज करना चाहूंगा कि…

देख कर साए दुख और तकलीफों के ए ज़िन्दगी के मुसाफ़िर राह ए ज़िन्दगी में अपने कही।

बदल न देना राह मंज़िलो की हो कर के मजबूर ज़िन्दगी से छोड़ न देना साथ ज़िन्दगी का जिंदगी से अपने कहि।।

छूटता है तो छूट जाए चाहे करवा महफ़िलो का ए ज़िन्दगी के मुसाफ़िर पीछे तेरे कहि।

फ़क्त छूटने न पाए चाह ज़िन्दगी कि जिंदगी से ज़िन्दगी को जीने कि कही।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

08/07/2018 at 10:15 am

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