भोंडा न जाने क्यों आज़माइश ए जोर दिखा रहा है।

खफ़ा है शायद खुद से और रूठे चाहने वालो से अपने हुए जा रहा है।।

हार गया है बाजी वो दिल से धड़कनो कि अपने, न जाने क्यों फिर भी जिए जा रहा है।

मुकदर को झुठला कर भी अपने खुशी न मिल पाई जो कभी,
दोष हार का अब अपनी, अपने मुकदर को दिए जा रहा है।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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