Writer & Poet Vikrant Rajliwal

Poetry, Shayari & Article's by Vikrant Rajliwal

Aug 11, 2018
Vikrant Rajliwal (विक्रांत राजलीवाल) -स्वतन्त्र लेखक-

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🇮🇳सत्य है या भृम!

🇮🇳सत्य है या भृम! (एक लघु नाटक आज की भृष्ट होती जा रही राजनीति पर एक प्रहार कि कोशिश मात्र है)

सत्य है या भृम।

एक सुबह  एक चाय की एक दुकान पर सुबह की चाय पीते दो व्यक्ति।

प्रथम व्यक्ति: राम राम जी महोदय।

द्वितीय व्यक्ति : राम राम जी! राम  राम।

प्रथम व्यक्ति: आज वातावरण कुछ गर्म रहेगा।
(मुस्कुराते हुए)

द्वितीय व्यक्ति:  हु! पर क्यों गर्म रहेगा?
(हैरानी से )

प्रथम व्यक्ति: टीवी पर ख़बर में बताया था।

द्वितीय वयक्ति: टीवी की ख़बर और मौसम का विशवास
न करा करे!

प्रथम व्यक्ति:  आज कल वो बात नही है। अब सब सही
सही  बताते  है। जब से मोदी जी ने
सेटेलॉइट उड़ाई है तब से सब ठीक बताते
है।

द्वितीय व्यक्ति: कौन मोदी जी?

प्रथम व्यक्ति: नही, नही, खबरों में! मोदी जी तो बेहद
व्यवस्त रहते है। 2019 जो आने वाला है।

द्वितीय व्यक्ति:  हु! सुना है, हमने भी। अभी से सब युद्ध
स्तर पर तैयारी कर रहे है।
(सब से तातपर्य है सभी पार्टी)

प्रथम व्यक्ति: युद्ध स्तर पर नही! युद्ध (दंगे-फसाद) करते
हुए तैयारी कर रहे है।

द्वितीय व्यक्ति कुछ कहता तभी तृतीय व्यक्ति का आगमन हो जाता है।

तृतीय व्यक्ति: नमस्कार है आप दोनों को मेरी ओर से।

प्रथम एव द्वितीय : नमस्कार जी नमस्कार!
(एक साथ)

तृतीय व्यक्ति: अपने सुना! आज मौसम गर्म रहेगा।

प्रथम एव द्वितीय व्यक्ति : हा आज़ टीवी पर ख़बर में
बताया था।
(दोनों एक साथ।)

तृतीय व्यक्ति :  अच्छा! क्या बताया था टीवी पर?

प्रथम एव द्वितिय :  यही की आज तापमान 40 के
व्यक्ति                    पार चला जाएगा।
(पुनः एक साथ)

तृतीय व्यक्ति: पर किसका?

द्वितिय व्यक्ति:  मौसम का भाई और किसका!

तृतिय व्यक्ति: लगता है आप अभी समझे नही?

इस बार प्रथम व्यक्ति:  क्यों, क्या हो गया! जो हम समझ
नही पारहे!
(हैरानी से)

तृतीय व्यक्ति:  आज मौसम गर्म रहेगा से मेरा तातपर्य था
कि आज शहर में चुनावी रैलियां है। वो भी
एक नही दो दो।

प्रथम एव द्वितीय व्यक्ति : क्या कहा? ये तो गम्भीर समस्या
है। अभी पिछली बार के जख्म
ठीक से भरे नही है और फिर से
दो रैलियां।

तृतिय व्यक्ति:  हु, तुमने ठिक कहा जब से राजनीति एव
धर्म के नाम पर समाज बटता जा रहा है तब
से हम जनता चुनावी एव धार्मिक रैलियों के
नाम से भी भयभीत होने लगी है।

प्रथम एव द्वितीय व्यक्ति : अब क्या करें! शहर छोड़ दे
क्या?
(एक साथ भयभीत होते हुए)

तृतिय व्यक्ति।    : मेरी मानो तो शहर नही, ये देश, फिर ये
दुनिया ही छोड़ दो। और अंत मे
अंतरिक्ष मे कहि एक चूहे वाला बिल
खुद कर उसमें घुस जाओ।

प्रथम एव द्वितीय। : तो अब आप ही बताए क्या करे? क्या
व्यक्ति                    आप पिछली बार के दंगे भूल गए या
आप भी उनमें से ही एक हो? जो
आप ऐसी बात करते हो!
(पुनः एक साथ)

तृतिय व्यक्ति:  न न मैं भी तुम्हारे ही जैसे निःसन्देह
भयभीत हु। मुझ को भी भय है। परन्तु शहर
छोड़ने से क्या होगा? कुछ नही। बल्कि घर
बार से, रोजगार से भी जाएंगे। इससे अच्छा
तो इन रैलियों का सामना करेंगे। और
स्वाभिमान से जिएंगे नही तो स्वाभिमान से
मरेंगे।

प्रथम एव द्वितिय व्यक्ति : हा, हा, हम सामना करेंगे
स्वाभिमान  से, जीएंगे
स्वाभिमान से नही तो
मरेंगे स्वाभिमान से।
(एक साथ स्वाभिमान से)

तीनो व्यक्ति : हम सामना करेंगे स्वाभिमान से, जिएंगे
स्वाभिमान से नही तो मरेंगे स्वाभिमान
से, हा अब हम जिएंगे स्वाभिमान से, नही
तो अब मरेंगे स्वाभिमान से!

इस प्रकार से तीनों व्यक्ति एक आत्मस्वाभिमान के स्वर के साथ विजय का जयकारा लगाते हुए।

🇮🇳ईष्वर न करे हम भारतीयों को फिर से कभी भी किसी भी प्रकार के दंगो का विद्रोह का सामना ना करना पड़े, और इंसानियत को फिर से शर्मसार होना पड़े। एक जमाना था जब देश की आजादी के लिए देश के हित के लिए राजनीतिक एव धार्मिक रेलिया किसी त्यौहार से कम न होती थी, हर तरफ खूशी के ढोल एव भाईचारे की शक्ति देखने को सुनने को मिलती थी।

और एक यह समय है जब आजादी होते हुए भी हर शरीफ व्यक्ति इन चुनावी एव धार्मिक रैलियों के नाम से चाहे वह किसी भी धर्म या राजनीति की क्यों न हु भय से गुस्से से कांप जाता है। क्या इसी दिन के लिए हमारे पूवजो ने अपने जीवन कि कुर्बानी दी थी? क्या इसी दिन के लिए उन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ी थी?
यह सवाल है हर उस मनुष्य के लिए जो यह सोच कर निचिंत है कि…

अपना घर रहे सूरक्षित, दूजे का चाहे जल घर जाए।
जख्म इंसानियत पड़ते रहे, आँख से पर आँसू न आए।।

समाप्त।

स्वतन्त्र लेखक एव रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।🇮🇳🇮🇳🇮🇳

27/04/2018 at 22:54pm
Source
(Repost at 11/08/2018 at 15:33 pm after some editing of spelling mistakes by Author Vikrant Rajliwal)
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